अब जुलाई नहीं अगस्त में टूटेगा बारिश का रिकॉर्ड, डूब जाएंगे शहर! क्या 30 लाख साल पुराना इतिहास दोहराने वाला है?
नई दिल्ली: एनआईटी राउरकेला की एक स्टडी के अनुसार, भारत में मानसून का मिजाज पूरी तरह बदलने वाला है. वैज्ञानिकों ने पाया है कि लगभग 30 लाख साल पहले भारत में मानसूनी बारिश आज की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक थी. उस समय धरती का तापमान बहुत अधिक था. अब ठीक वैसा ही माहौल फिर से बन रहा है. रिसर्च बताती है कि भविष्य में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से भारत में बारिश की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मानसून का पीक समय बदल जाएगा. अब तक जुलाई को सबसे ज्यादा बारिश वाला महीना माना जाता था. मगर आने वाले सालों में अगस्त सबसे अधिक वर्षा वाला महीना बन सकता है. यह बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए बहुत बड़े संकेत दे रहा है.
क्यों बदल रहा है मानसून का सबसे ज्यादा बारिश वाला महीना?
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलोजी में प्रकाशित यह रिपोर्ट बताती है कि तापमान बढ़ने से हवा की नमी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है. एनआईटी के असिस्टेंट प्रोफेसर नागराजु चिलुकोटी और उनकी टीम ने इस पर गहरा एनालिसिस किया है.
उन्होंने मध्य-प्लायोसीन काल की तुलना आज के समय से की है. उस दौर में धरती का तापमान औद्योगिक स्तर से 4 डिग्री ज्यादा था. आज हम फिर से उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं.
रिसर्च के अनुसार, गर्म वायुमंडल अब ज्यादा नमी होल्ड कर पा रहा है. इसी वजह से मानसून के महीनों में शिफ्ट देखने को मिल रहा है. टीम ने पाया कि भारतीय महासागर और जमीनी इलाकों के ऊपर नमी का फ्लो बहुत मजबूत हो रहा है.
यही कारण है कि अब जुलाई की जगह अगस्त में बादलों के फटने और भारी बारिश की घटनाएं ज्यादा देखने को मिल सकती हैं. यह शिफ्टिंग मानसून के पारंपरिक चक्र को पूरी तरह तहस-नहस कर सकती है.
क्या बढ़ती गर्मी से मानसून कमजोर होगा या और ज्यादा खतरनाक?
दुनिया भर के वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर हमेशा बहस रही है. कुछ का मानना है कि गर्मी से बारिश कम होगी, तो कुछ इसे मजबूती का संकेत मानते हैं. एनआईटी राउरकेला के अध्ययन ने इस विरोधाभास को काफी हद तक साफ कर दिया है.
- रिसर्च कहती है कि अतीत में तेज हवाओं की वजह से मानसून मजबूत था. लेकिन भविष्य में बारिश बढ़ने की वजह हवा में मौजूद ‘एक्स्ट्रा नमी’ होगी.
- भारत की 80 परसेंट बारिश मानसून से ही आती है. करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और खेती इसी पर टिकी है. अगर बारिश का पैटर्न बदलता है, तो दक्षिण एशिया की आर्थिक स्थिरता खतरे में पड़ सकती है.
- गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ सकता है. इससे न केवल बाढ़ का खतरा बढ़ेगा, बल्कि शहरी इलाकों में ड्रेनेज सिस्टम भी फेल हो सकते हैं.
कैसे बदल जाएगी किसानों की जिंदगी और देश का जल प्रबंधन?
इस रिसर्च के निष्कर्ष केवल कागजी नहीं हैं, बल्कि इनके जमीनी प्रभाव बहुत गहरे होंगे. अगर बारिश का समय बदलता है, तो किसानों को अपना फसल चक्र भी बदलना पड़ेगा. अभी तक किसान जुलाई की बारिश के भरोसे बुवाई करते आए हैं. लेकिन अगर अगस्त में सबसे ज्यादा पानी बरसता है, तो सिंचाई की पूरी योजना फेल हो सकती है. भारी बारिश से खड़ी फसलें बर्बाद होने का डर भी रहेगा.
वैज्ञानिकों का कहना है कि सरकार को अब अपनी जल प्रबंधन नीतियों को फिर से देखना होगा. बाढ़ और सूखे की चेतावनी देने वाली प्रणालियों को और भी एडवांस बनाना पड़ेगा. शहरी योजनाकारों को भी अब अगस्त की भारी बारिश को ध्यान में रखकर नालों और पुलों का निर्माण करना होगा. नीति-निर्माताओं के लिए यह रिपोर्ट एक अलार्म की तरह है ताकि वे समय रहते आपदा प्रबंधन को मजबूत कर सकें.
भविष्य की चुनौतियों के लिए हम कितने तैयार हैं?
प्रोफेसर नागराजु चिलुकोटी का कहना है कि ‘अतीत ही भविष्य को समझने की असली चाबी है’. हमने देखा है कि कैसे मध्य-प्लायोसीन काल में अधिक गर्मी ने बारिश को प्रचंड बना दिया था. अब हम उसी रास्ते पर हैं. यह अध्ययन केवल चेतावनी नहीं है, बल्कि एक मौका है. अगर हम अभी से क्लाइमेट तैयारी शुरू कर दें, तो बड़े नुकसान से बच सकते हैं.
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मानसून का एक-एक दिन कीमती होता है. अगस्त में होने वाली अत्यधिक वर्षा मिट्टी के कटाव को भी बढ़ा सकती है. हमें अपनी नदियों के बांधों और जलाशयों की क्षमता को फिर से आंकना होगा.