Strait of Hormuz | Oil Tankers cost | होर्मुज के रास्ते से भारत आ रहे तेल टैंकर सरकारी हैं या प्राइवेट? जानें एक चक्कर में कितना आता है खर्चा?

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नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल के बीच छिड़े भीषण युद्ध के बीच भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कूटनीति और सैन्य शक्ति दोनों का इस्तेमाल कर रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जिसे जलडमरूमध्य भी कहते हैं, वहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है. लेकिन हॉर्मुज इस समय सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्र बना हुआ है. ईरान के अनुमति के बिना वहां से कोई भी देश का तेल टैंकर नहीं गुजर रहा है. जो गुजरने की कोशिश करता है उसको ईरान आग के हवाले कर देता है. लेकिन भारत के तेल टैंकर को ईरान ने हॉर्मुज से गुजरने की इजाजत दे दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि जो टैंकर अपनी जान जोखिम में डालकर भारत कच्चा तेल और गैस ला रहे हैं, वे किसके हैं और उन पर कितना खर्च आता है? क्या ये तेल टैंकर भारत सरकार के हैं या फिर प्राइवेट कंपनियों के टैंकर हैं? कौन से तेल टैंकर सरकारी हैं और कौन प्राइवेट कंपनियों के हैं?

तेल टैंकर सरकारी या प्राइवेट?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल सरकारी और निजी दोनों तरह के टैंकरों के जरिए मंगवाता है. नंदा देवी (Nanda Devi) और शिवालिक (Shivalik) दोनों विशालकाय एलपीजी (LPG) टैंकर भारत सरकार की कंपनी भारतीय नौवहन निगम (Shipping Corporation of India) के स्वामित्व में हैं. हाल ही में इन दोनों जहाजों ने भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की सुरक्षा में होर्मुज पार किया है. वहीं तेल के खेल में कुछ प्राइवेट प्लेयर्स भी हैं. सरकारी जहाजों के अलावा, भारत का बड़ा आयात निजी कंपनियों के जहाजों
से भी होता है. उदाहरण के लिए जग लाडकी (Jag Laadki) और जग प्रकाश जैसे टैंकर निजी क्षेत्र की ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग कंपनी (Great Eastern Shipping Company) के हैं.

टैंकर का नाम   प्रकार मालिक कौन क्या है स्थिति  कार्गो (लगभग)
नंदा देवी LPG सरकारी (SCI) कांडला पहुंचने वाला है 46,000 MT
शिवालिक LPG सरकारी (SCI) मुंद्रा पहुंचने वाला है 46,000 MT
जग लाडकी Crude प्राइवेट (GE Shipping) रास्ते में (सुरक्षित) 80,800 MT
स्मर्नी Crude विदेशी (लाइबेरिया फ्लैग) मुंबई पहुंचा 10 लाख बैरल
शेनलॉन्ग Crude विदेशी (लाइबेरिया फ्लैग) मुंबई पहुंचा 1.35 लाख MT

विदेशी झंडे वाले जहाज

भारत केवल अपने जहाजों पर निर्भर नहीं है. कई बार इंडियन ऑयल (IOCL) और रिलायंस जैसी कंपनियां विदेशी कंपनियों (जैसे ग्रीस या लाइबेरिया के झंडे वाले जहाज) को भी किराये पर लेती हैं. हाल ही में लाइबेरिया का ‘स्मर्नी’ (Smyrni) नामक टैंकर सऊदी तेल लेकर मुंबई पहुंचा है.

एक तेल टैंकर को खाड़ी देशों जैसे इराक, सऊदी अरब, यूएई से भारत के किसी बंदरगाह जैसे जामनगर या मुंबई तक लाने का खर्च कई कारकों पर निर्भर करता है.

ईंधन (Bunker Fuel): एक बहुत बड़ा कच्चा तेल टैंकर (VLCC) एक दिन में लगभग 50-80 टन ईंधन की खपत करता है. खाड़ी से भारत तक की 4-6 दिनों की यात्रा में केवल ईंधन पर ही 1.5 करोड़ से 2 करोड़ रुपये तक खर्च हो जाते हैं.

डेली रेंटल (Daily Charter Rate): अगर जहाज किराये पर लिया गया है तो सामान्य दिनों में इसका किराया 30,000 डॉलर से 50,000 डॉलर करीब अगर रुपये में बात करें तो 25-40 लाख प्रतिदिन होता है. युद्ध के समय यह बढ़कर 1,00,000 डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है.

वॉर रिस्क इंश्योरेंस (War Risk Insurance): यह सबसे बड़ा खर्चा है. युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों का बीमा प्रीमियम 500% तक बढ़ गया है. एक ही चक्कर के लिए अब कंपनियों को करोड़ों रुपये अतिरिक्त बीमा देना पड़ रहा है.

क्रू और अन्य खर्च: चालक दल का वेतन, बंदरगाह शुल्क (Port Charges) और रखरखाव मिलाकर एक औसत यात्रा का कुल खर्च 5 करोड़ से 10 करोड़ रुपये के बीच बैठता है.

सामान्य परिस्थितियों में हर रोज औसतन 3 से 5 बड़े टैंकर होर्मुज पार कर भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचते हैं. हालांकि, 28 फरवरी 2026 को युद्ध शुरू होने के बाद यह संख्या घटकर शून्य पर आ गई थी. पिछले एक हफ्ते में भारत की ‘ऑपरेशन संकल्प’ और कूटनीतिक जीत के बाद अब तक 4-5 टैंकर नंदा देवी, शिवालिक, जग लाडकी, स्मर्नी और शेनलॉन्ग सुएज़मैक्स ही सफलतापूर्वक निकल पाए हैं. अभी भी 22 भारतीय टैंकर होर्मुज के पश्चिम में फंसे हुए हैं और अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.

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