ग्रामीण क्षेत्रों में LPG गैस की किल्लत का कोई असर नहीं! गांव की महिला ने बताया कैसे झटपट होता है खाना तैयार

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Bahraich News: ईरान-इजरायल युद्ध का असर भारत के गैस एजेंसियों में देखने को मिल रहा है, जहां एलपीजी गैस लेने के लिए लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं. लेकिन ग्रामीण इलाकों में बिना गैस के लोग कैसे जीवन यापन करते होंगे, आइए आपको बताते हैं कि गांव में इन समस्याओं से लड़ने के लिए लोग क्या कर रहे हैं.

बहराइच: ईरान-इजरायल युद्ध के बीच गैस सिलेंडर को लेकर तरह-तरह की बातें उठ रही हैं. इन बातों में खासकर गैस की बुकिंग के बाद देर से गैस मिलने व 25 दिन के बाद अगली गैस की बुकिंग होना, कमर्शियल सिलेंडर पर रोक का होना. लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में इसका कोई भी असर देखने को नहीं मिल रहा है. ग्रामीण इलाकों में गाय और भैंस के गोबर का कंडा लोगों की मुसीबत को हल कर रहा है और आसानी से खाना बनाने में मदद कर रहा है,

ग्रामीण इलाकों के लोग गोबर के कंडे पर निर्भर
सदियों से चली आ रही लकड़ी और गोबर के उपले की परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कायम है. लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों में भी लकड़ी गोबर के कंडे समेत गैस का भी उपयोग किया जाने लगा है, लेकिन गैस की बढ़ती कीमत और कमी को लेकर ग्रामीण इलाकों के रसोईयों में अब फिर से कंडे ने अपनी जगह बना ली है. अब ग्रामीण इलाकों की महिलाएं कंडे से ही भोजन बना रही हैं.

कितना लगता है खर्च
दरअसल ग्रामीण इलाकों में लगभग घरों में लोग पशुपालन करते हैं, जिससे दूध, दही तो मिल ही जाता है. साथ-साथ इससे निकलने वाला गोबर भी काम में आ जाता है. पशुओं से निकलने वाले गोबर में धान, गेहूं से निकलने वाले अवशेषों को महिलाएं गोबर में मिलाकर गोल आकार की तरह मोटा कंडा हाथ से बना लेती हैं और फिर इसको धूप में सूखने के लिए छोड़ देती हैं. 8 से 10 दिन में यह सूखकर पूरी तरीके से जलने के लिए तैयार हो जाता है और फिर चूल्हे में इसको डालकर एक से दो लकड़ी लगाकर खाना आसानी से बनाकर तैयार कर लिया जाता है.

एक वक्त का खाना बनाने के लिए बस 10 कंड़े और 1 से 2 लकड़ी की जरूरत होती है. इसके बाद खाना आसानी से बनकर तैयार हो जाता है. कंडा बनाने में भी बहुत ज्यादा कोई मेहनत नहीं होती है. बस गोबर को हाथ से घुमाया जाता है और कंड़ा तैयार हो जाता है. इस तरह से ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को गैस की कमी होने के बावजूद भी कोई परेशानी नहीं झेलनी पड़ती है.

कंडे को लेकर रीना देवी से खास बातचीत
बहराइच जिले के मुकेरिया गांव में रहने वाली महिला रीना देवी ने लोकल 18 टीम से खास बातचीत में बताया कि वह कभी गैस-सिलेंडर का उपयोग नहीं करती हैं, हमेशा कंडे पर ही खाना बनाती हैं और अगर इनसे कोई कंडा लेना चाहे, तो दो ढाई रुपए पीस के हिसाब से यह कंडा को सेल भी कर देती हैं. एक दिन में जितना गोबर निकलता है, उसका कंडा आसानी से बनकर तैयार कर देती हैं और फिर सूख जाने के बाद खाना आसानी से बनकर तैयार हो जाता है.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

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