युद्ध के समय इंटरनेशनल वॉटर में कहीं भी डुबाया जा सकता है दुश्मन का जहाज़, युद्ध का मैदान कहीं भी बन सकता है
ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है. United States Navy ने 4 मार्च 2026 को इंडियन ओशन में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को डुबोया था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने किसी दुश्मन जहाज़ को डुबोया. इस घटना ने लीगल, मोरल सभी तरह के सवाल खड़े किए, क्यूंकि कई सालों के बाद ऐसी घटना हुई, जो हमारे लिए चौकाने वाली थी. सवाल खड़े हुए तो जवाब भी मिले. जैसे क्या इस घटना में भारत की कोई जिम्मेदारी बनती है? क्या किसी विदेशी युद्धपोत पर हमला होने से पहले भारत को बताना चाहिए था? अगर ये भारतीय जलक्षेत्र में होता तो रिएक्शन क्या होता? अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून ऐसे मामलों में क्या कहते हैं?
इन सभी महत्वपूर्ण सवालों पर News18 ने भारतीय नौसेना के कोमोडोर श्रीकांत केसनूर (रिटायर्ड) से विशेष चर्चा की. इस चर्चा में उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत भारत का कोई लीगल या मोरल दायित्व नहीं, क्योंकि ये इंटरनेशनल वॉटर्स में हुआ और दो देशों के बीच वॉर है, जिसमे हम न्यूट्रल हैं. जिस ईरानी जहाज ‘IRIS देना’ को निशाना बनाया गया वह भारत के क्षेत्रीय जल में नहीं था, बल्कि सात दिन पहले विशाखापत्तनम से निकल गया था, जो लगभग 1200 किलोमीटर दूर अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में था और उसने भारत से किसी प्रकार की सहायता भी नहीं मांगी थी. ऐसे में भारत की किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि जो ईरानी जहाज़ अपने देश के लिए कर रहा था वही अमेरिकी सबमरीन कर रही थी, कि किसी भी देश के नाविक युद्ध के दौरान अपनी जान गंवाते हैं, मानवीय दृष्टिकोण से यह निश्चित रूप से दुखद है. लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में ऐसे परिणाम अक्सर देखने को मिलते हैं.
कोमोडोर केसनूर ने यह भी स्पष्ट किया कि United States Navy पर इस तरह की सैन्य कार्रवाई से पहले भारत या भारतीय नौसेना को सूचित करने की कोई बाध्यता नहीं होती. उनके अनुसार शांति काल में समुद्री सुरक्षा, पायरेसी, आतंकवाद या अन्य गैर-राज्यीय खतरों से निपटने के लिए देशों के बीच सूचना साझा की जाती है, लेकिन जब दो देशों के बीच सशस्त्र संघर्ष चल रहा हो तो सैन्य ऑपरेशन पूरी तरह गोपनीयता के दायरे में आते हैं. यदि अमेरिका पहले से किसी तीसरे देश को इस तरह की कार्रवाई की जानकारी देता तो इससे उसके सैन्य अभियान की गोपनीयता प्रभावित हो सकती थी और अनावश्यक रूप से भारत को भी उस संघर्ष में खींचा जा सकता था. उन्होंने कहा कि भारत का आधिकारिक रुख इस पूरे संघर्ष में तटस्थ रहने का है और भारतीय नौसेना सरकार की नीति के अनुरूप ही काम करती है. भारत के अमेरिका, इज़राइल, ईरान और खाड़ी देशों – सभी के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं, इसलिए इस स्थिति में संतुलित और सावधान रुख ही भारत के हित में है. जब ईरानी जहाज़ IRIS Lavan ने हमसे शरण मांगी हमने कोच्ची, केरला में शरण दे दी.
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के संदर्भ में कोमोडोर केसनूर ने बताया कि किसी भी देश के तट से 12 समुद्री मील तक का क्षेत्र उसके टेरिटोरियल वाटर्स माना जाता है, जो उस देश की संप्रभु सीमा के बराबर होता है. यदि किसी विदेशी सैन्य कार्रवाई को ऐसे क्षेत्र में अंजाम दिया जाता तो वह सीधे तौर पर उस देश की संप्रभुता का उल्लंघन माना जाता और भारत निश्चित रूप से इसका विरोध करता. हालांकि 12 समुद्री मील के बाद का क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र माना जाता है, भले ही वह किसी देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) के भीतर क्यों न हो. ऐसे में यदि दो देश युद्ध की स्थिति में हैं तो अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में वे एक-दूसरे के सैन्य जहाजों को निशाना बना सकते हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में वैध माना जाता है. जहाँ IRIS Dena डूबा था वो श्रीलंका का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) था, जो अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में आता है.
उन्होंने यह भी कहा कि यह धारणा गलत है कि भारतीय नौसेना या किसी भी अन्य देश की नौसेना समुद्र में मौजूद हर पनडुब्बी की गतिविधियों को लगातार ट्रैक कर सकती है. कोमोडोर केसनूर के अनुसार समुद्र पृथ्वी का सबसे जटिल और अपारदर्शी क्षेत्र है, जहां निगरानी करना बेहद कठिन होता है. दुनिया की कोई भी नौसेना—यहां तक कि अमेरिका भी—सभी पनडुब्बियों को हर समय ट्रैक करने की क्षमता नहीं रखती. हम शांतिकाल में थ्रेट परसेप्शन के अनुसार दुश्मन के नवल एसेट को ट्रैक कर सकते हैं. पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए समुद्र की तलहटी में लगे सेंसर, सोनाबॉय, हेलीकॉप्टर, फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट और विशेष युद्धपोतों जैसे कई संसाधनों की जरूरत होती है. और अगर आपने ट्रैक भी कर लिया तो क्या आपको उसके इंटेंशन्स के बारे में पता होगा? नहीं. भारतीय नौसेना ने कहा है कि इंडियन ओशन में लगभग 50 देशों की नेवी ऑपरेट करती हैं. जो लोग ये कह रहे हैं की भारत को पता होना चाहिए था उन्होंने कभी भी समुद्र या महासागर नहीं देखा है. यह संभव नहीं है कि हर समय हर पनडुब्बी की गतिविधि पर नजर रखी जा सके.
कोमोडोर केसनूर ने ये भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ने किसी भी प्रकार का कोई मेरीटाइम लॉ नहीं तोड़ा है. इंटरनेशनल लॉ दो तरह के होते हैं, UN Charter के Article 2(4) के तहत युद्ध या बल का उपयोग निषिद्ध है, लेकिन Article 51 के अंतर्गत आत्मरक्षा का अधिकार सुरक्षित है. युद्ध लीगल है या नहीं ये ऊपर की बात है, लेकिन अगर युद्ध शुरू हुआ, तो ऑपरेशन्स कैसे कंडक्ट किये जाते हैं, वो “Law of Armed Conflict” में आता है. जो अमेरिका ने किया है वो लगली करेक्ट है. सबमरीन के लिए अमेरिकी नौसेना के लिए IRIS Dena एक वैध टारगेट था.
कोमोडोर केसनूर ने आधुनिक समुद्री युद्ध में पनडुब्बियों की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्टील्थ क्षमता होती है, यानी वे समुद्र के भीतर छिपकर दुश्मन पर अचानक हमला कर सकती हैं. अक्सर जब तक उनका पता चलता है, तब तक हमला हो चुका होता है. पनडुब्बियां आमतौर पर टॉरपीडो से जहाज के निचले हिस्से को निशाना बनाती हैं, जिससे विस्फोट का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. उन्होंने बताया कि परमाणु पनडुब्बियों की क्षमता और भी अधिक होती है, क्योंकि उन्हें बार-बार सतह पर आने या बैटरी चार्ज करने की जरूरत नहीं होती और वे लंबे समय तक समुद्र की गहराई में रहकर घात लगाकर हमला कर सकती हैं. यही कारण है कि जिन देशों के पास बड़ी संख्या में उन्नत पनडुब्बियां होती हैं, उन्हें समुद्री युद्ध में महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त मिलती है.
कोमोडोर केसनूर ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि युद्ध की स्थिति में कोई दुश्मन जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मौजूद हो, तो उसे निशाना बनाना कानूनन संभव है. उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध का भी संदर्भ दिया और याद दिलाया कि INS Khukhri को Indo-Pakistani War of 1971 के दौरान पाकिस्तानी पनडुब्बी ने डुबो दिया था, जिसमें कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए जहाज के साथ ही शहादत दी थी. उस घटना से भारतीय नौसेना ने कई महत्वपूर्ण सबक सीखे और उसके बाद अपनी पनडुब्बी रोधी क्षमताओं, सोनार सिस्टम और युद्ध रणनीतियों को और मजबूत किया. उनके अनुसार आज के दौर में परमाणु पनडुब्बियों के कारण समुद्री युद्ध की प्रकृति और भी जटिल और खतरनाक हो गई है, और यही कारण है कि आधुनिक नौसेनाओं में सबमरीन शक्ति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है.