रोचक है LPG के आविष्कार की कहानी, कार से पेट्रोल उड़ा तो साइंटिस्ट कर डाली खोज
देश में एलपीजी सिलिंडर की किल्लत को लेकर खबरों का बाजार गर्म है. जनता हलकान है. लंबी लंबी लाइनें लग रही हैं. अपने देश में 30 करोड़ से ज्यादा एलपीजी का इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. ऐसा लगने लगा है कि बिना एलपीजी जीवन ही नहीं है. क्या आपको मालूम है कि जिस एलपीजी सिलिंडर्स का हम धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, उसके खोज की कहानी बहुत रोचक है. ये किस्सा एक शिकायत से शुरू हुआ था. उसके बाद जो कुछ सामने आया, उसने दुनिया ही बदलकर रख दी.
एलपीजी की खोज का क्रेडिट अमेरिकी रसायन वैज्ञानिक वाल्टर ओ स्नेलिंग को जाता है. एलपीजी की खोज की कहानी विज्ञान की दुनिया की सबसे दिलचस्प घटनाओं में गिनी जाती है.
इसकी शुरुआत एक शिकायत से शुरू हुई थी. साल 1910 के आसपास अमेरिका में पेट्रोल कारों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था. उस समय पेट्रोल को स्टोर करना मुश्किल होता था क्योंकि उसका कुछ हिस्सा जल्दी उड़ जाता था. एक दिन वाल्टर स्नेलिंग के पास एक कार मालिक आया. उसने शिकायत की कि उसकी कार में भरा पेट्रोल कुछ दिनों में ही गायब हो जाता है. स्नेलिंग को यह बात अजीब लगी उन्होंने सोचा कि पेट्रोल आखिर कहां जा रहा है.
शुरू में जब कंपनियां क्रूड आयल से पेट्रोल बनाती थीं तो बहुत सी गैस भी निकलती थी, जिसे वो बेकार मानते थे और कुछ गैसें पेट्रोल में ही घुली मिली होती थीं, इसी से एलपीजी की खोज की गई. (AI News18 Image)
कुछ लोग एक किस्सा और भी कहते हैं. वाल्टर ने अपनी कार में एक गैलन तेल डलवाया. जब वह घर पहुंचे तो देखा कि आधा से ज्यादा पेट्रोल उड़ चुका है. वह चकित रह गए. आखिर ये पेट्रोल गया कहां – बस इसी सवाल के साथ एक ऐसी चीज की खोज शुरू हुई, जिसने पूरी दुनिया में खाने बनाने के तौरतरीकों को ही बदल दिया.
फिर लैब में ये बात पता चली
उन्होंने अपने प्रयोगशाल में प्रयोग शुरू किया. पेट्रोल एक जार में रखा तो वहां भी पेट्रोल कम हो रहा है. तब उनकी समझ में आया कि पेट्रोल पूरी तरह तरल नहीं होता, उसमें कुछ ऐसे बहुत हल्के गैस तत्व होते हैं जो आसानी से उड़ जाते हैं. अब उन्होंने और ज्यादा गंभीरता के साथ प्रयोग शुरू किये. स्नेलिंग ने पेट्रोल को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर उसका अध्ययन किया.
ये हैं साइंटिस्ट वाल्टर स्नेलिंग, जिन्होंने 1910 के आसपास एलपीजी की खोज अपनी प्रयोगशाला में पेट्रोल से की. उसके बाद तो उन्होंने पूरी दुनिया में किचन में खाना बनाने के तरीके को ही बदल डाला. (फाइल फोटो)
उन्होंने पाया कि पेट्रोल में प्रोपेन, ब्यूटेन जैसी गैसें होती हैं, जो सामान्य तापमान पर उड़ जाती हैं. साथ ही एक बात उन्हें और पता लगी कि अगर इन गैसों को दबाव में रखा जाए तो ये फिर से तरल रूप में बदल जाती हैं. यही वह सिद्धांत था जिसने बाद में एलपीजी को संभव बनाया.
20वीं सदी की शुरुआत तक पेट्रोलियम कंपनियां प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल के साथ निकलने वाली हल्की गैसों जैसे प्रोपेन और ब्यूटेन को लेकर बहुत परेशान रहती थीं. उस समय इन गैसों का कोई उपयोग नहीं था इसलिए इन्हें बेकार समझकर पाइपों के जरिए हवा में जला दिया जाता था.
यानि जिस गैस को कंपनियां बेकार बाईप्रोडक्ट मानकर जला देती थीं, वह डॉ. स्नेलिंग की जिज्ञासा की वजह से दुनिया का सबसे साफ और सुलभ घरेलू ईंधन बन गया.
पहला ग्राहक
1912 में पहली बार एक घर में एलपीजी का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए किया गया. शुरुआत में इसे “बोटल्ड गैस” कहा जाता था. फ्रैंक फिलिप्स ने खरीदा। बताते हैं कि पहला सिलिंडर इस्तेमाल करने वाले शख्स स्नेलिंग के ससुर थे, जिन्होंने पेनसिल्वेनिया में एक फार्महाउस में पहला प्रोपेन सिलेंडर इंस्टॉल किया, जो खाना पकाने और हीटिंग के लिए इस्तेमाल हुआ.
ये हैं फ्रेंड फिलिप्स, आज हम जिस तरह एलपीजी सिलिंडर का इस्तेमाल और इसके डिस्ट्रीब्यूशन के तरीकों को देखते हैं, वो काम अपनी फैक्ट्रियों के जरिए अमेरिकी उद्योगपति फ्रेंक फिलिप्स ने शुरू किया. (फाइल फोटो)
पहला सिलेंडर कैसे बना
1911 में स्नेलिंग ने इन गैसों को दबाव में तरल रूप में रखने का तरीका विकसित किया. उन्होंने एक स्टील कंटेनर बनाया, जिसमें गैस को दबाव में भरकर सुरक्षित रखा जा सकता था. यही आधुनिक लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस सिलिंडर का शुरुआती रूप था. 1912 में स्नेलिंग ने इस तकनीक का पेटेंट कराया. फिर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एलपीजी उत्पादन की शुरुआत की. फिर इसके पेटेंट को अमेरिकी उद्योगपति फ्रेंक फिलिप्स ने खरीदा और इसे बड़े पैमाने पर बनाना शुरू किया.
एलपीजी का घरेलू इस्तेमाल कैसे शुरू हुआ
1920 के दशक में अमेरिका में एलपीजी को घरों में इस्तेमाल करने के लिए सिलेंडर सिस्टम विकसित किया गया. ग्रामीण इलाकों में जहां पाइप गैस नहीं पहुंचती थी, वहां यह बहुत लोकप्रिय हो गया. धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गया. भारत में बाद में आया. भारत में एलपीजी की पहली एजेंसी कोलकाता में खुली.
क्या आपको मालूम है कि एलपीजी में कोई गंध नहीं होती बल्कि इसमें तीखी गंध मिलाई जाती है. (AI News18 Image)
क्यों लोकप्रिय हुआ
एलपीजी लोकप्रिय इसलिए हुआ क्योंकि इसमें कई फायदे थे. जलने पर कम धुआं. उच्च ऊर्जा क्षमता. आसानी से स्टोर और ट्रांसपोर्ट. इसके अलावा कोयले और लकड़ी से ज्यादा साफ ईंधन. इसी वजह से ये दुनिया का सबसे बड़ा घरेलू ईंधन बन गया.
इसमें गंध क्यों मिलाई जाती है
आप हैरान हो सकते हैं कि एलपीजी मूल रूप से पूरी तरह गंधहीन होती है. 1937 में अमेरिका के टेक्सास में एक स्कूल में गैस लीक होने से बड़ा धमाका हुआ था. उस घटना के बाद यह अनिवार्य कर दिया गया. तब से एलपीजी में इथाइल मरकैप्टन नामक रसायन मिलाया जाने लगा, जिससे एलपीजी की गंध कुछ तीखी बदबूदार जैसी होने लगी.
भारत में कहां था पहला कारखाना
भारत में पहला स्वदेशी एलपीजी सिलेंडर 1967 में हैदराबाद के आल्विन कारखाने में लांच हुआ, जिसने सिलेंडर की कमी दूर की.
आविष्कर्ता स्नेलिंग के बारे में
वाल्टर ओ. स्नेलिंग एक अमेरिकी रसायनशास्त्री थे, उन्होंने हार्वर्ड, येल और जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की. 1907 में उन्होंने पानी के नीचे डेटोनेटर का आविष्कार किया, जो पनामा नहर निर्माण में अमेरिकी सरकार को सालाना 5 लाख डॉलर बचाने में सहायक रहा. 1910 में यूएस ब्यूरो ऑफ माइंस के विस्फोटक प्रयोगशाला के प्रमुख बने. उन्होंने विस्फोटकों पर 179 पेटेंट कराए.