अमेरिकी गलती से सीखा भारत, S-400 से ड्रोन मारना बेवकूफी, फिर रूस की शरण में IAF!

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S-400 News and Iran War With Israel-America: पश्चिम एशिया में चल रही जंग ने दुनिया के सुपर पावर्स को कई सबक सिखाया है. ईरान ने अमेरिका और इजारयल के बेहद महंगे और विनाशक हथियारों की ऐसी हवा निकाली है जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी. दुनिया के तमाम रणनीतिकार यह मानते थे कि ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद शिया मुल्क कुछ घंटों या दिनों में सरेंडर कर देगा और युद्ध विराम की गुहार लगाने लगेगा. लेकिन, ईरान की रणनीति और सैन्य तैयारियों ने दुनिया को चौंका दिया है. इस जंग से दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों को बड़ी सीख मिली है. इसमें भारत भी शामिल है.

दरअसल, ईरान के साथ जंग में एक सबसे बड़ी सीख यह मिली है कि मौजूदा वक्त के युद्ध को केवल घातक और विनाशक हथियारों के दम पर नहीं जीता जा सकता. अमेरिका और इजरायल के पास पांचवीं पीढ़ी के सबसे आधुनिक फाइटर जेट एफ-35 और एफ-22, पैट्रियट मिसाइल सिस्टम, थाड डिफेंस सिस्टम, बी-2 बॉम्बर जैसे कई बार घातक हथियार हैं. लेकिन, ईरान की रणनीति के आगे ये हथियार पूरी तरह बेकार साबित हुए हैं. इनको ऑपरेटर करने की लागत इतनी है कि यह किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकते हैं.

अमेरिकी लगती

अमेरिका ने ईरान के साथ जंग में यही लगती की है. ईरान ने इस जंग में पहले बेहद सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से वार किए और अमेरिका ने इन ड्रोन्स को मारने के लिए बेहद महंगी मिसाइलों और डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया. इससे अमेरिका-इजरायल के लिए इन सस्ते ड्रोन्स को मारना बहुत महंगा साबित हुआ. इतना ही नहीं ईरान ने इजरायल और मीडिय ईस्ट के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन से हमलों की बारिश कर दी. इससे इनको व्यापक स्तर पर मिसाइलों और डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल करना पड़ा. ऐसे में रिपोर्ट आ रही है कि अमेरिका-इजरायल के पास अब अपनी डिफेंस के लिए मिसाइलें कम पड़ने लगी हैं. पूरी दुनिया के सामरिक मामलों के एक्सपर्ट ईरान की इस रणनीति को जबर्दस्त बता रहे हैं.

भारत के पास इस वक्त एस-400 के तीन स्क्वाड्रन है. फोटो- रायटर

यूक्रेन जंग में भी कुछ ऐसा ही हुआ था

यूक्रेन के साथ रूस के जंग में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी. यूक्रेन ने सस्ते ड्रोन्स के दम पर रूस को भारी सैन्य नुकसान पहुंचाया है. उसने इन सस्ते ड्रोन्स के जरिए भारी भरकम रूसी फाइटर जेट्स और टैंकरों को तबाह कर दिया. ऐसे में भारत भी हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठा है. बीते साल करीब 72 घंटे तक चले ऑपरेशन सिंदूर में भी भारत को ऐसी ही चुनौती का सामना करना पड़ा था. उस वक्त पाकिस्तान ने तुर्की निर्मित सैकड़ों ड्रोन्स भारत में भेजने की कोशिश की थी. लेकिन, भारत के मजबूत डिफेंस सिस्टम ने इन सभी को समय रहते खत्म कर दिया था. भारत में ये ड्रोन्स कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा पाए थे.

कुल मिलाकर हम यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि एस-400 जैसे बेहद आधुनिक डिफेंस सिस्टम से हर हवाई खतरे पर वार करना समझदारी नहीं है. एस-400 दुनिया का एक सबसे आधुनिक डिफेंस सिस्टम है और यह 400 किमी दूर के खतरों पर वार कर सकता है. इस डिफेंस सिस्टम को मुख्य रूस से फाइटर जेट्स और खतरनाक मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया है. ऐसे में इसको ऑपरेट करने का खर्च भी बहुत ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक एस-400 से एक बार मिसाइल दागने में 2.5 करोड़ से 16 करोड़ रुपये का खर्च आता है. यह इस सिस्मट में लगी तरह-तरह की मिसाइलों के हिसाब से तय होता है. ऐसे में ड्रोन जैसे नन्हे एरियल खतरों को मारने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल करना वाकई बेवकूफी है.
भारत रूस से 13 पैंटसर-एस सिस्टम खरीदने की तैयारी में है. फोटो- रायटर

एयरफोर्स को मिली सबक

लेकिन, इंडियन एयरफोर्स इन जंगों से काफी कुछ सीख चुकी है. ऐसे में वह एक बार फिर अपने सबसे भरोसेमंद दोस्त रूस के पास पहुंची है. एयरफोर्स इमरजेंसी खरीद नीति के तहत रूस से पैंटसर-एस1 (Pantsir- S1) सिस्टम खरीदने का फैसला किया है. ऐसे 13 सिस्टम खरीदे जाएंगे. ये एस-400 डिफेंस सिस्टम को सुरक्षित रखने और अन्य सैन्य प्रतिष्ठानों को ड्रोन हमलों से बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे. दरअसल, पैंटसर-एस1 भी एक तरह का डिफेंस सिस्टम है, जो एस-400 की तुलना में कम दूरी और हल्के खतरों को मारने में समक्ष है. कहने का मतलब है कि जहां बंदूक से काम हो जाए वहां तोप का गोला दागने की क्या जरूरत है. इन दोनों सिस्टम में यही बेसिक अंतर है.
  • लागत- हमने ऊपर बताया है कि एस-400 से एक बार मिसाइल दागने में 16 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है वहीं पैंटसर-एस1 से यह लागत 90 लाख से 1.30 करोड़ के बीच आती है.
  • रेंज- एस-400 सिस्टम 400 किमी दूर तक के भारी-भरकम सिस्टम को तबाह कर सकता है. वहीं पैंटसर-एस1 की क्षमता केवल 20 किमी है.
  • टार्गेट- एस-400 सिस्टम दुश्मन के बैलेस्टिक मिसाइलें, बेहद एडवांस फाइटर जेट्स और अवाक्स सिस्टम (AWACS) मारने के लिए हैं जबकि पैंटसर-एस1 का टार्गेट ड्रोन्स, क्रूज मिसाइलें और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले एयरक्राफ्ट हैं.

ड्रोन्स को मारने के लिए एस-400 का इस्तेमाल?

ऐसे में कोई समझदार व्यक्ति 20 हजार डॉलर के ड्रोन्स को मारने के लिए एस-400 जैसे सिस्टम के इस्तेमाल को समझदारी नहीं बता सकता. ऐसे में पैंटसर-एस1 को खरीदने का मुख्य मकसद एस-400 को गार्ड करने और उसको सपोर्ट करना है.

6000 करोड़ की डील

रिपोर्ट के मुताबिक इन 13 पैंटसर-एस1 सिस्टम की खरीद पर करीब 6 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे. इन्हें इमरजेंसी प्रावधान के तरह खरीदे जाएंगे. यानी इसकी खरीद में कई प्रक्रियाओं को साइडलाइन किया गया है. इससे इसकी डिलिवरी कुछ महीनों के भीतर शुरू हो जाएगी. इसके साथ ही भारत रूस से और पांच एस-400 सिस्टम की खरीद की तैयारी में है. पहले ही पांच एस-400 सिस्टम खरीदे जा चुके हैं. इसमें से तीन की डिलिवरी हुई है. दो की डिलिवरी रूस के यूक्रेन जंग में उलझे होने के कारण बाधित हुई है.

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