कम लागत में बंपर कमाई! तोरई की ये किस्में देंगी 220 क्विंटल तक उत्पादन, जानें पूरी डिटेल

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सिर्फ 50 दिन में तैयार! पूसा सुप्रिया किस्म से किसान ले सकते हैं बंपर पैदावार

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गर्मियों के मौसम में खाली खेतों से बंपर कमाई करने के लिए तोरई की खेती एक बेहतरीन विकल्प मानी जाती है. मार्च में बुवाई करने पर यह फसल मात्र 50 से 60 दिनों में तैयार होकर बाजार में अच्छे दामों पर बिकती है. उन्नत किस्मों के चयन और सही प्रबंधन से किसान कम लागत में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) की ओर से विकसित पूसा सुप्रिया किस्म उन किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है जो कम समय में जल्दी उत्पादन चाहते हैं. यह किस्म मात्र 50 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. इसके फल मध्यम आकार के, चिकने और आकर्षक हरे रंग के होते हैं. यह किस्म रोगों के प्रति काफी प्रतिरोधी मानी जाती है और 25 से 37 डिग्री सेल्सियस तापमान में बेहतरीन परिणाम देती है. इससे किसान प्रति हेक्टेयर 130 से 140 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.

जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के अनुसार, गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से विकसित पंत चिकनी तोरई-1 किस्म अपनी लंबाई और बेलनाकार आकार के कारण बाजार में काफी मशहूर है. इसकी बुवाई के लगभग 50 से 55 दिनों बाद पहली तुड़ाई शुरू की जा सकती है. इस किस्म की खेती से किसान प्रति हेक्टेयर 140 से 170 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग और फलों की एकसमान गुणवत्ता है.

अगर आप ज्यादा उत्पादन चाहते हैं, तो पूसा चिकनी एक बेहतरीन विकल्प मानी जाती है. IARI की ओर से विकसित इस किस्म के फल चिकने और मध्यम आकार के होते हैं. हालांकि इसे तैयार होने में 60 से 70 दिन का समय लगता है, लेकिन इसकी उत्पादन क्षमता 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है. यह किस्म उन क्षेत्रों के लिए खास तौर पर उपयुक्त है, जहां गर्मियों में उच्च कार्बनिक पदार्थों वाली उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध होती है.

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भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी द्वारा विकसित काशी दिव्या किस्म अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है. इसके फल पतले और गूदेदार होते हैं, जो ग्राहकों को काफी पसंद आते हैं. यह किस्म विशेष रूप से डाउनी मिल्ड्यू रोग के प्रति सहनशील है, जिससे किसानों की कीटनाशकों पर होने वाली लागत कम हो जाती है. करीब 60 दिनों में तैयार होने वाली यह किस्म प्रति हेक्टेयर 130 से 160 क्विंटल तक उत्पादन देने में सक्षम है.

चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर की ओर से विकसित कल्याणपुर हरी चिकनी किस्म अपनी उच्च उपज के लिए जानी जाती है. इसके फल पतले और बेहतरीन स्वाद वाले होते हैं. इस किस्म की पहली तुड़ाई 60 से 70 दिनों में की जा सकती है. इसकी सबसे खास बात इसकी पैदावार है, जो 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है. अधिक मुनाफा चाहने वाले किसानों के बीच यह किस्म अपनी गुणवत्ता और भारी उत्पादन के कारण काफी लोकप्रिय है.

तोरई की सफल खेती के लिए जलवायु और मिट्टी का सही तालमेल होना जरूरी है. यह फसल गर्म और आर्द्र मौसम में तेजी से बढ़ती है. खेती के लिए ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए, जिसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था हो. मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना उपयुक्त माना जाता है. बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद डालने से न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि फलों की चमक और स्वाद में भी सुधार होता है.

मार्च का महीना तोरई की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस समय गन्ने की कटाई के बाद खेत खाली हो जाते हैं. इस समय लगाई गई फसल मई-जून की भीषण गर्मी में बाजार में पहुंचती है, जब हरी सब्जियों की मांग अधिक होती है और उपलब्धता कम रहती है. कम समय में तैयार होने के कारण किसानों की निवेश लागत जल्दी वापस आ जाती है और वे बाजार के ऊंचे भावों का लाभ उठाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

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