CJI Suryakant News | Supreme Court On NCERT Book Case: ‘सत्‍य को क‍िसी की मंजूरी नहीं चाह‍िए’, सुप्रीम कोर्ट के जजों की क्‍यों होने लगी आलोचना

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लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक माना जाता है. भारत में सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और सम्मान सर्वोच्च है. लेकिन बुधवार को एनसीईआरटी की एक किताब और उसके लेखक से जुड़े एक मामले में जजों के सख्त रुख ने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है. सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने जाने-माने शिक्षाविद और पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर मिशेल डैनिनो के खिलाफ कुछ ऐसी ट‍िप्‍पण‍ियां कीं, ज‍िसकी सोशल मीडिया में आलोचना की जाने लगी. इंटरनेट पर शिक्षाविदों, लेखकों और आम नागरिकों का एक वर्ग कहने लगा- “सत्य को किसी की मंजूरी नहीं चाहिए.” आख‍िर पूरा व‍िवाद है क्‍या?

दरअसल, यह पूरा विवाद NCERT की कक्षा 8 की किताब के एक ड्राफ्ट से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ की बातें ल‍िखी गई थीं. इस ड्राफ्ट को तैयार करने वाली कमेटी में आईआईटी गांधीनगर के विजिटिंग प्रोफेसर और प्रख्यात इतिहासकार मिशेल डैनिनो भी थे. जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया, तो सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस पर बेहद कड़ी आपत्ति जताई. अदालत का तर्क यह था कि स्कूली बच्चों के कोमल मन पर न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संस्था के बारे में इस तरह के नकारात्मक और अपुष्ट विचार थोपना ठीक नहीं है. अदालत का मानना है कि इससे देश की भावी पीढ़ी के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है, जो लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उस किताब पर रोक लगा द‍िया, बल्कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उन्हें भविष्य में सरकार के किसी भी शैक्षणिक या अन्य प्रोजेक्ट्स से बाहर यानी ब्लैकलिस्ट करने का आदेश दे दिया.

सोशल मीडिया पर झलकी लोगों की नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश जैसे ही सार्वजनिक हुआ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’पर आलोचनाओं की बाढ़ आ गई. बुद्धिजीवियों, लेखकों और आम नागरिकों ने अदालत के इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अकादमिक शोध पर प्रहार माना. न्यायपालिका का सम्मान करते हुए भी, लोगों का स्पष्ट रूप से मानना है कि रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है.

आनंद रंगनाथन ने ल‍िखा- ‘अघोषित आपातकाल’

मशहूर लेखक और साइंट‍िस्‍ट आनंद रंगनाथन ने अदालत के इस फैसले की तीखी आलोचना करते हुए इसे अधिकारों का खुला अतिक्रमण बताया. उन्होंने लिखा, यह एक खुला अतिक्रमण (blatant overreach) है जो न्याय के सिद्धांतों का ही मजाक उड़ाता है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा आपातकाल दिखता है, सिवाय इसके कि इस बार बिना चुने गए लोगों ने इसकी घोषणा की है. भारतीय न्यायपालिका के इतिहास के इस सबसे काले दिनों में से एक पर, मैं मिशेल डैनिनो के साथ खड़ा हूं. हमेशा खड़ा रहूंगा.

‘गंभीर न‍िराशाजनक द‍िन’

राजीव सूद नाम के एक यूजर ने ल‍िखा, एक समय था जब आपातकाल चुने हुए प्रतिनिधियों की तरफ से आया था. आज ऐसा लगता है कि यह बिना चुने गए लोगों की ओर से आ रहा है. हमारी न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए यह एक गंभीर और निराशाजनक दिन है. मैं मिशेल डैनिनो के साथ खड़ा हूं. सत्य को कभी किसी की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.

‘अभिव्यक्ति की आजादी के लिए दुखद दिन’

लेखिका शेफाली वैद्य ने ल‍िखा, मिशेल डैनिनो के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला देखकर स्तब्ध हूं. यह किसी भी तरह से मिशेल की विद्वता को कम नहीं करता है या उनके कद को नहीं घटाता है, लेकिन यह बताता है कि हमारे ‘माईलॉर्ड्स’ कितने संवेदनशील हैं! लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए यह एक दुखद दिन है.

‘उन्‍हें अधिकांश भारतीयों से ज्‍यादा जानकारी’

प्रख्यात लेखक हिंडोल सेनगुप्ता ने ल‍िखा, मिशेल डैनिनो ईमानदार, निष्ठावान, समर्पित और भारत के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं. वह एक ऐसे विद्वान हैं जितने समर्पित विद्वान का होना संभव है. वह भारत के बारे में अधिकांश भारतीयों से कहीं अधिक जानते हैं. विवा करमानी ने ल‍िखा, न्यायपालिका का यह हास्यास्पद फैसला कई बातों को साबित करता है. मिशेल डैनिनो न केवल एक उत्कृष्ट इतिहासकार हैं बल्कि एक अनुकरणीय इंसान भी हैं. यूजर चैतन्य चिंता ने ल‍िखा, मिशेल डैनिनो के खिलाफ भारतीय न्यायपालिका का यह प्रतिशोधात्मक रुख असहिष्णुता की बू देता है… माईलॉर्ड्स उन विद्वानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो उनकी गलतियों को उजागर करते हैं..!

कौन हैं मिशेल डैनिनो?
इस पूरे विवाद के केंद्र में मौजूद मिशेल डैनिनो कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं. मूल रूप से फ्रांस में जन्मे डैनिनो ने दशकों पहले भारत को अपना घर बना लिया था. वे भारतीय इतिहास, संस्कृति और विशेषकर सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर अपने गहन शोध के लिए जाने जाते हैं. शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2017 में प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया था. वे शिक्षा मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय की कई महत्वपूर्ण समितियों का हिस्सा रहे हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रबल समर्थक रहे हैं. यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ इतना सख्त रुख अपनाया और उन्हें भविष्य के प्रोजेक्ट्स से बाहर करने का आदेश दिया, तो अकादमिक जगत और आम लोगों को यह एक ईमानदार विद्वान का अपमान लगा.

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