Chanakya Niti these six ways people try to manipulate you without you noticing | इन 6 तरीकों से लोग आपको टिशू की तरह कर लेते हैं यूज और आपको इस बारे म

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इन 6 तरीकों से लोग आपको टिशू की तरह कर लेते हैं यूज और आपको पता भी नहीं चलता

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Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य भारत के पहले दार्शनिक थे, जिन्होंने अपने गहन अध्ययन, तेज दिमाग और समझ से कई नीतियां बनाई हैं. इन नीतियों के माध्यम से आप जीवन की किसी भी परिस्थितियों में फंसे हुए हैं, वह आपको निकालने का काम करती हैं. इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि किस तरह लोग आपको मैन्यूपुलेट कर देते हैं और आपको पता भी नहीं चलता.

Chanakya Niti: मैनिपुलेशन यानी किसी को अपने हिसाब से चलाना, जब हो रहा होता है तो वह मैनिपुलेशन जैसा नहीं लगता. वह सलाह जैसा लगता है. ऐसा लगता है कि जैसे यह व्यक्ति है, जिसे मेरी चिंता है और किसी को नहीं. जब तक आपको असहजता महसूस होती है, तब तक असर आपके सोचने के तरीके में घर कर चुका होता है. सदियों पहले, आचार्य चाणक्य ने चेतावनी दी थी कि सबसे खतरनाक मैनिपुलेशन दुश्मनों द्वारा नहीं बल्कि उन लोगों द्वारा किया जाता है जो इंसानी कमजोरियों को हमसे बेहतर समझते हैं. चाणक्य ने राज सभाओं में राजाओं, मंत्रियों, परिवारों, दोस्ती और गठबंधनों का अध्ययन किया. उन्होंने निष्कर्ष निकाला था, लोग इसलिए ताकत नहीं खोते क्योंकि वे कमजोर हैं, बल्कि इसलिए खोते हैं क्योंकि वे यह नहीं समझ पाते कि कब किसी का प्रभाव उनकी अपनी पसंद की जगह ले लेता है.

सोचने-समझने की शक्ति हो जाती है खत्म – आचार्य चाणक्य के अनुसार, यह आमतौर पर तब शुरू होता है जब कोई आपकी जरूरत से ज्यादा चिंता करता है. वे बार-बार आपको चेतावनी देते हैं, आपके फैसलों पर सवाल उठाते हैं या आप कोशिश भी करें उसमें सही गलत बताने लगते हैं. शुरुआत में यह सपोर्ट जैसा लगता है, वे मेरी भलाई चाहते हैं. लेकिन धीरे-धीरे आप महसूस करते हैं कि आप ज्यादा हिचकिचाने लगे हैं. आप खुद के फैसलों पर शक करने लगते हैं. आप फैसले लेने से पहले उनसे पूछने लगते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि आपको मदद चाहिए, बल्कि इसलिए कि आपको अपनी सोच पर भरोसा नहीं रहा.<br />चाणक्य बताते हैं कि यह सबसे शांत मैनिपुलेशन है. असली चिंता आपकी सोचने की ताकत बढ़ाती है. मैनिपुलेटिव चिंता उसे कमजोर कर देती है. जिस पल किसी की चिंता आपको ज्यादा सक्षम बनाने की बजाय कम आत्मविश्वासी बना दे, समझिए असर शुरू हो चुका है.

आप कब यूज हो गए पता भी नहीं चलेगा – मैनिपुलेशन में नंबर दो पर आता है चापलूसी. चापलूसी सभी को अच्छी लगती है, इसी वजह से यह सबसे ज्यादा असरदार है. मैनिपुलेटर इस तरह आपकी तारीफ करते हैं कि आपकी अहमियत उनकी मंजूरी से जुड़ जाती है. जब आप सहमत होते हैं तो आप समझदार हैं. जब नहीं होते तो परेशानी बन जाते हैं. धीरे-धीरे आप ईमानदारी की जगह तालमेल को चुनने लगते हैं. आप चुप रहते हैं, क्योंकि आप उनकी बनाई छवि को बिगाड़ना नहीं चाहते.<br />इस तरह चाणक्य ने चेताया था कि अहंकार सबसे आसान पकड़ है. इस तरह आपकी आजादी धीरे धीरे खत्म होने लगती है और आप कब दूसरों के हिसाब से चलने लगते हैं, आपको ही इसकी जानकारी नहीं हो पाती. इस स्थिति में आपको आदेश देने की जरूरत नहीं पड़ती, आप खुद ही को बदल लेते हैं.

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सवाल पूछने भर से हो जाते हैं आप गलत – मैनिपुलेटर यह बताने की बजाय कि वे क्या चाहते हैं, आपको सवाल पूछने पर ही बुरा महसूस करवा देते हैं. यहां तक कि वे आपके द्वारा की गई बातों में सही गलत निकालते हैं. वे बार-बार आपको अहसान गिनाने लग जाते हैं और अपने आपको महान बताते हैं. फिर अचानक मुद्दा यह नहीं रहता कि क्या सही है बल्कि यह हो जाता है कि आप इतने अनग्रेटफुल क्यों हैं. फिर आप भारी मन से वहां से जाते हैं, जबकि असल में कोई तर्क नहीं हुआ.<br />चाणक्य इसे गहराई से समझते है, वे बताते हैं कि अपराधबोध सोचने की ताकत को अधिकार से भी जल्दी खत्म कर देता है. आप अपराधबोध में आ जाते हैं और फिर सभी तर्क फेल हो जाते हैं. आप यह सभी चीजों को सहन कर लेते हैं. आप इसलिए नहीं मानते कि आप सहमत हैं, बल्कि इसलिए कि विरोध करना भावनात्मक रूप से भारी लगता है.

जहां मूल्य आ जाएं, वहां से तुरंत भाग लो – यह अक्सर परिवारों, संस्कृतियों और ऑफिस में देखने को मिलता है. जैसे ही आप किसी बात पर सवाल उठाते हैं, आपको कहा जाता है कि यह परंपरा है, संस्कृति है या यहां ऐसे ही होता है. और आपके द्वारा उठाया गया प्वाइंट वहीं खत्म हो जाता है, फिर चाहें आप कितने भी सही क्यों ना हों. अब आप तर्क नहीं कर रहे बल्कि अपने चरित्र का बचाव कर रहे हैं.<br />चाणक्य परंपरा का सम्मान करते थे, लेकिन अंधी आज्ञाकारिता से नफरत करते थे. उनका मानना था कि मूल्य सोचने की दिशा दिखाएं, उसकी जगह ना लें. जब कोई सवालों का जवाब देने की बजाय मूल्यों का सहारा लेकर आपको चुप कराए, तो वह ज्ञान नहीं बल्कि अपने फायदे की रक्षा करता है.

जब आपको पूरी जानकारी नहीं मिलती – मैनिपुलेटर सीधे झूठ नहीं बोलते. उन्हें इसकी जरूरत नहीं होती क्योंकि वो आपके बारे में सबकुछ जान लेते हैं. वे बस सब कुछ नहीं बताते. वे जानकारी चुनकर साझा करते हैं, जो उनके काम आए, जब उनके काम आए. आप सोचते हैं कि आपने आजादी से फैसला लिया, लेकिन असल में पहले से ही आपके लिए सीमित विकल्प कर दिए गए थे. यह मैनिपुलेशन का सबसे खतरनाक रूप है क्योंकि आप नतीजों के लिए खुद को दोषी मानते हैं, जबकि वे कभी पूरी तरह आपके थे ही नहीं. चाणक्य कहते हैं कि जानकारी पर नियंत्रण, विकल्प पर नियंत्रण है.

विक्टिम बनकर जिम्मेदारी से बचने का तरीका – हर बार जब आप कोई चिंता जताते हैं, सामने वाला आहत, भावुक या असहाय बन जाता है. फोकस उनके व्यवहार से हटकर आपके लहजे पर आ जाता है. आप बहुत सख्त होने के लिए माफी मांगने लगते हैं, जबकि आपकी चिंता जायज थी. धीरे-धीरे आप मुद्दे उठाना ही छोड़ देते हैं और अपने मुद्दों पर ही सवाल उठाने लगते हैं कि क्या मैने सच में सही मुद्दा उठाया था.<br />चाणक्य ने चेताया था कि कमजोर दिखना भी एक ताकतवर रणनीति हो सकती है. जब कोई जिम्मेदारी से बचने के लिए अपनी कमजोरी का इस्तेमाल करता है, तो ताकत चुपचाप शिफ्ट हो जाती है. आप उनकी भावनाओं के केयरटेकर बन जाते हैं और वे अछूते हो जाते हैं.

दूसरों के विचार अपने बन जाना – यह सबसे गहरा मैनिपुलेशन है. कोई बार-बार आपके सामने शंकाएं, डर या विश्वास दोहराता है. समय के साथ वे विचार जाने-पहचाने लगने लगते हैं. जो जाना-पहचाना है, वह सुरक्षित लगता है. जो सुरक्षित है, वह सच लगता है. एक दिन आप पाते हैं कि आप उस विचार का बचाव कर रहे हैं, जिसे आपने कभी खुद चुना ही नहीं था. वह विचार दूसरे का था और उस चक्कर में आप खुद फंस जाते हैं.<br />चाणक्य ने सदियों पहले ही समझ लिया था कि दिमाग दबाव से नहीं बल्कि दोहराव से जीते जाते हैं. एक बार कोई विचार अपना सा लगने लगे, तो विरोध पूरी तरह खत्म हो जाता है.

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