स्पीकर के खिलाफ कब-कब आया अविश्वास प्रस्ताव, क्या है प्रक्रिया, कहां हुई विपक्ष से गलती? जानें सब

Share to your loved once


नई दिल्ली: लोकसभा के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत एक बड़े संवैधानिक और संसदीय विवाद के साथ हो रही है. विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है. संसद की कार्यवाही में यह मुद्दा आज चर्चा का केंद्र बना हुआ है. यह प्रस्ताव इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आजादी के बाद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम बहुत कम बार उठाया गया है. राजनीतिक गलियारों में इस बात पर भी बहस हो रही है कि क्या यह प्रस्ताव वास्तव में स्पीकर को हटाने की दिशा में गंभीर कोशिश है या फिर विपक्ष का प्रतीकात्मक विरोध. अब देखना ये होगा कि आखिर विपक्ष के इस प्रस्ताव में कितना दम है. लेकिन तमाम सवालों के बीच इस अविश्वास प्रस्ताव के कारण कई सवाल और भी उपजें है जिनके बारे में जानना बहुत जरूर हो गया है. सवाल है कि क्या इससे पहेल स्पीकर के खिलाफ कभी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है. अगर लाया गया है तो कब और किसके खिलाफ लाया गया है. इसकी प्रक्रिया क्या है. और सबसे जरूरी बात क्या इस अविश्वास प्रस्ताव को लाने के दौरान विपक्ष से कोई गलती हुई है. अगर हुई है तो वह क्या है. तो आइए जानते हैं इन तमाम सवालों के जवाब को.

दिलचस्प बात यह है कि इस प्रस्ताव के साथ एक और विवाद जुड़ गया है. बताया जा रहा है कि विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस में कुछ तकनीकी और प्रक्रियागत गलतियां भी सामने आई हैं. दस्तावेज में जहां 2026 लिखा होना चाहिए था, वहां कई जगह 2025 लिखा गया था. संसदीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण प्रस्ताव में ऐसी गलती विपक्ष की रणनीति और तैयारी पर सवाल खड़े करती है.
स्पीकर को हटाने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती. (फाइल फोटो PTI)

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव क्या होता है?

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ जो प्रस्ताव लाया जाता है, उसे सामान्य भाषा में अविश्वास प्रस्ताव कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह ‘हटाने का प्रस्ताव’ होता है. यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लाया जाता है. इसका मतलब यह है कि यदि लोकसभा के सदस्य मानते हैं कि स्पीकर अपने पद की जिम्मेदारियों को निष्पक्षता से नहीं निभा रहे हैं, तो वे उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव ला सकते हैं. यह प्रक्रिया सरकार के खिलाफ लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव से पूरी तरह अलग होती है.

संविधान का अनुच्छेद 94 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94 लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद से हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है. इसके अनुसार लोकसभा स्पीकर को तीन परिस्थितियों में पद छोड़ना पड़ सकता है. पहला यदि वह लोकसभा के सदस्य नहीं रहते हैं. दूसरा यदि वे स्वयं इस्तीफा दे दें. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण यदि लोकसभा के वर्तमान सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा उन्हें पद से हटा दिया जाए. यही वह संवैधानिक प्रावधान है जिसके आधार पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाया जाता है.

स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव कैसे लाया जाता है?

स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया तय है. सबसे पहले कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होता है. इस नोटिस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. नोटिस मिलने के बाद जब सदन में इस प्रस्ताव को पेश किया जाता है तो चेयर पूछता है कि कितने सदस्य इसके समर्थन में हैं. यदि उस समय कम से कम 50 सांसद खड़े हो जाते हैं, तो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है और उस पर चर्चा शुरू होती है. इसके बाद मतदान की प्रक्रिया होती है.

स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पास होने के लिए कितने वोट चाहिए?

स्पीकर को हटाने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है. यानी उस समय सदन में जितने सांसद मौजूद हों और मतदान कर रहे हों, उनमें से आधे से एक अधिक सांसदों का समर्थन मिलना जरूरी है. उदाहरण के तौर पर यदि उस समय 500 सांसद मौजूद हैं और मतदान कर रहे हैं, तो प्रस्ताव पास होने के लिए कम से कम 251 सांसदों का समर्थन चाहिए.

नोटिस के बाद सदन की कार्यवाही कौन चलाता है?

जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होनी होती है, तब स्पीकर खुद सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते. उस दिन सदन की कार्यवाही डिप्टी स्पीकर या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा संचालित की जाती है. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके और स्पीकर स्वयं उस प्रक्रिया का हिस्सा न बनें जिसमें उनके पद पर सवाल उठाए जा रहे हों.

आजादी के बाद कितनी बार स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव आया?

1947 में आजादी मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव बहुत कम बार लाया गया है. अब तक तीन स्पीकर जीवी मावलंकर, सरदार हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ के खिलाफ विपक्ष ने प्रस्ताव पेश किया था. हालांकि हर बार विपक्ष को सफलता नहीं मिली और प्रस्ताव गिर गया. मौजूदा प्रस्ताव को मिलाकर यह चौथा मौका है जब स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया है.

इस बार विपक्ष क्यों ला रहा है प्रस्ताव?

विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा स्पीकर ने सदन में विपक्ष के नेताओं को खासकर लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया और कुछ मामलों में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया. कांग्रेस के सांसद मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि ने इस प्रस्ताव का नोटिस दिया है. विपक्ष का कहना है कि संसद में निष्पक्षता बनाए रखना स्पीकर की जिम्मेदारी है और यदि उस पर सवाल उठते हैं तो सदन को इस पर चर्चा करनी चाहिए.

इस प्रस्ताव के पास होने की संभावना कितनी है?

राजनीतिक गणित को देखते हुए इस प्रस्ताव के पास होने की संभावना काफी कम मानी जा रही है. केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है. इसलिए यदि मतदान होता है तो विपक्ष के लिए प्रस्ताव पास कराना मुश्किल होगा. ऐसे में कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अधिकतर प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर देखा जा सकता है.

विपक्ष की सबसे बड़ी गलती क्या मानी जा रही है?

संसदीय हलकों में चर्चा है कि विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस में तकनीकी त्रुटियां सामने आई हैं. दस्तावेज में कई जगह साल 2026 की जगह 2025 लिखा हुआ पाया गया. संसदीय प्रक्रिया में ऐसे दस्तावेजों का पूरी तरह सटीक होना जरूरी होता है. नियमों के अनुसार यदि नोटिस में कोई तकनीकी गलती होती है तो लोकसभा सचिवालय उसे स्वीकार करने से इनकार भी कर सकता है. ऐसे में इस गलती को विपक्ष की रणनीतिक चूक के रूप में देखा जा रहा है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP