कानपुर के बिठूर में 33 साल से रोशनी बांट रहा ज्योति मूक-बधिर विद्यालय, 170 बच्चों की बदल रही जिंदगी

Share to your loved once


Last Updated:

Kanpur News: साल 1991 में रमेश चंद्र दीक्षित ने अपने बड़े भाई डॉ. सूर्य नारायण दीक्षित की प्रेरणा से काकादेव स्थित अपने घर से स्कूल शुरू किया था. उस समय निर्णय लिया गया था कि मूक-बधिर बच्चों से कोई फीस नहीं ली जाएगी. 1994 में बिठूर में छह बीघा जमीन खरीदकर स्कूल को वहां शिफ्ट कर दिया गया. आज शांत और हरियाली भरे माहौल में यह स्कूल पूरी सुविधा के साथ चल रहा है. यहां प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई होती है.

कानपुरः समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी जिंदगी दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं. ऐसे ही एक व्यक्ति है रमेश चंद्र दीक्षित. उन्होंने 33 साल पहले मात्र दो मूक-बधिर बच्चों के साथ एक स्कूल की शुरुआत की थी. आज वही स्कूल 170 बच्चों की जिंदगी बदल रहा है. बिठूर में स्थित ज्योति मूक बधिर विद्यालय आज उन बच्चों के लिए उम्मीद का घर बन चुका है, जो न बोल सकते हैं और न सुन सकते हैं. यहां आकर वे पढ़ते हैं, सीखते हैं और अपने पैरों पर खड़े होने का सपना पूरा करते हैं.

साल 1991 में रमेश चंद्र दीक्षित ने अपने बड़े भाई डॉ. सूर्य नारायण दीक्षित की प्रेरणा से काकादेव स्थित अपने घर से स्कूल शुरू किया था. उस समय निर्णय लिया गया था कि मूक-बधिर बच्चों से कोई फीस नहीं ली जाएगी. 1994 में बिठूर में छह बीघा जमीन खरीदकर स्कूल को वहां शिफ्ट कर दिया गया. आज शांत और हरियाली भरे माहौल में यह स्कूल पूरी सुविधा के साथ चल रहा है. यहां प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई होती है. 10वीं तक की पढ़ाई यूपी बोर्ड के नियमों से और 11वीं-12वीं की पढ़ाई एनआईओएस बोर्ड से कराई जाती है. बच्चों को लाने-ले जाने के लिए बस की सुविधा भी है और सभी बच्चों को स्पेशल एजुकेटर पढ़ाते हैं, जो इशारों की भाषा से हर विषय समझाते हैं.

78 साल के रमेश चंद्र दीक्षित आज भी रोज स्कूल पहुंचते है. स्कूल का पूरा खर्च दान से चलता है. उन्होंने 27 साल तक निजी कंपनी में नौकरी की और अपनी बचत से अपना खर्च चलाया. घर से मिलने वाला 20 से 25 हजार रुपये किराया भी उनके काम आता है. उनका कहना है कि जब उनके पढ़ाए बच्चे नौकरी करते दिखते है. खासकर जब किसी की सरकारी नौकरी लगती है, तो उससे बड़ी खुशी कोई नहीं होती.

इस स्कूल में सिर्फ किताबों की पढ़ाई नहीं होती. यहां स्मार्ट क्लास की सुविधा है और खास इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से बच्चों को पढ़ाया जाता है. करीब 50 बच्चों के लिए छात्रावास की सुविधा है. बड़ा खेल मैदान भी है, जहां बच्चे खेलते हैं और खुद को मजबूत बनाते है.

बच्चों को रोजगार से जुड़ी चीजें भी सिखाई जाती है. वे चमड़े के उत्पाद बनाना सीखते हैं. कंप्यूटर की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है और साथ ही फ्रीज और एसी रिपेयरिंग जैसे काम भी सिखाए जाते है. मकसद साफ है, पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चे किसी पर निर्भर न रहें. आज यह स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उन बच्चों के सपनों का घर है, जो खामोशी में भी अपनी मेहनत से कामयाबी की नई कहानी लिख रहे है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP