सिर्फ पेशे के नाम से पुकारने पर SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं.. इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ पेशे के नाम से पुकारने पर आपराधिक मामला नहीं बनता. कोर्ट ने कहा कि जब तक यह सिद्ध नहीं होता कि ऐसे शब्द जान बूझकर उसे अपमानित करने के लिए कहा गया हो.

सिर्फ पेशे के नाम से पुकारने पर SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं: हाईकोर्ट Zoom

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC-ST एक्ट को लेकर दिया अहम फैसला

प्रयागराज. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे के आधार पर पुकारने मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता. कोर्ट ने कहा कि जब तक यह सिद्ध न हो कि ऐसे शब्द जानबूझकर उस समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की मंशा से कहे गए थे. जस्टिस अनिल कुमार की सिंगल बेंच में हुई सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की गई.

याचिका में गौतम बुद्ध नगर में एससी-एसटी के विशेष जज द्वारा अगस्त 2024 में पारित समन आदेश को आपराधिक अपील में चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की. अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 504 और 506 के साथ-साथ एससी-एसटी की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के तहत तलब किया गया था. शिकायतकर्ता का आरोप है कि वह अपीलकर्ता के कपड़े धोती थी. एक दिन जब उसने अपनी मजदूरी मांगी तो उसके साथ रास्ते में दुर्व्यवहार किया गया और कथित रूप से जातिसूचक शब्द कहे गए.

हाईकोर्ट ने पाया कि सिर्फ धोबिन कहा गया था

हाइकोर्ट ने पाया कि विवाद मजदूरी मांगने के बाद उत्पन्न हुआ और शिकायत में केवल इतना उल्लेख है कि जातिसूचक शब्द और धोबिन कहा गया. अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच संविदात्मक संबंध है, जिसमें शिकायतकर्ता कपड़े धोने का काम करती है. पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे से संबोधित करना अपने आप में अधिनियम के प्रावधानों को आकर्षित नहीं करेगा, जब तक यह स्थापित न हो कि शब्दों का प्रयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की नीयत से किया गया.

कोर्ट ने यह भी कहा

कोर्ट ने अपीलकर्ता की इस दलील पर भी विचार किया कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को स्पष्ट रूप से स्वीकार या अस्वीकार किए बिना ही प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में बदल दिया जो अवैध है. हाइकोर्ट ने कहा कि आदेश में पुलिस रिपोर्ट से असहमति का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य नहीं है. यदि ट्रायल कोर्ट प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में परिवर्तित करता है, तो इसका स्वाभाविक अर्थ है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(2) के तहत प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया. इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश दिया. एससी-एसटी की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) से संबंधित समन आदेश और कार्यवाही को निरस्त किया. हालांकि, कोर्ट ने आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत शेष कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रखने का निर्देश दिया.

About the Author

Amit Tiwariवरिष्ठ संवाददाता

अमित तिवारी, News18 Hindi के डिजिटल विंग में प्रिंसिपल कॉरेस्पॉन्डेंट हैं. वर्तमान में अमित उत्तर प्रदेश की राजनीति, सामाजिक मुद्दों, ब्यूरोक्रेसी, क्राइम, ब्रेकिंग न्यूज और रिसर्च बेस्ड कवरेज कर रहे हैं. अख़बार…और पढ़ें

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