इजरायल ने भारत को दिया ऐसा ऑफर, शाहीन, DF-41 जैसी मिसाइलें बन जाएंगी कबाड़ – Sudarshan chakra programme indigenous air defence system Israel offer

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Sudarshan Chakra Programme: अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर अटैक कर तेहरान समेत आधा दर्जन से ज्‍यादा शहरों को धुआं-धुआं कर दिया. ज्‍वाइंट एयर स्ट्राइक में सुप्रीम लीडर अयातुल्‍ला अली खामेनेई भी मारे गए हैं. ईरान ने भी जवाबी अटैक किया है, लेकिन अभी तक वे उतना प्रभावी नहीं रहे हैं. दिलचस्‍प बात यह है कि ईरान ने चीन से HQ-9B एयर डिफेंस सिस्‍टम इंपोर्ट कर उसे तैनात किया था, पर अमेरिकी और इजरायली अटैक के सामने चीनी सिस्‍टम कबाड़ साबित हुए. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी चीनी एयर डिफेंस सिस्‍टम पूरी तरह से नाकाम साबित हुए थे. दूसरी तरफ, भारत ने बड़ी तादाद में पाकिस्‍तानी ड्रोन और मिसाइल्‍स को इंटरसेप्‍ट कर उसे तबाह कर दिया था. इन सभी हालात को देखते हुए भारत अपने एयरस्‍पेस को अभेद्य किला बनाने के लिए स्‍वदेशी वायु रक्षा प्रणाली को डेवलप करने में जुटा है. इसे सुदर्शन चक्र प्रोग्राम का नाम दिया गया है. यह एक मल्‍टीलेयर सिस्‍टम होगा, जो थ्रेट परसेप्‍शन यानी खतरे को भांपते हुए रिएक्‍ट करेगा. इजरायल ने भारत के स्‍वदेशी एयर डिफेंस सिस्‍टम को और मजबूत करने में सहयोग करने की इच्‍छा जताई है. रिपोर्ट्स की मानें तो तेल अवीव ने नई दिल्‍ली को उन्‍नत रडार और सेंसर विजन मुहैया कराने की बात कही है. इसकी मदद से 2500 किलोमीटर दूर तक एक्टिव हुए खतरों को डिटेक्‍ट कर उसके अनुसार रिएक्‍ट करना संभव हो सकेगा. इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्‍तान यदि अपने किसी भी शहर या ठिकाने से भारत के खिलाफ एरियल अटैक करने की कोशिश करेगा तो समय रहते उसका पता लगाया जा सकेगा. लेह-लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक में भी चीनी अटैक को इसके जरिये नाकाम करना संभव हो सकेगा.

इजरायल के ऑफर को स्‍वीकार किया जाता है तो सुदर्शन चक्र एयर डिफेंस सिस्‍टम पाकिस्‍तान की शाहीन और चीन की DF-41 जैसी घातक मिसाइलों को पलभर में कबाड़ बना देगा. जानकारी के अनुसार, भारत ने जैसे ही अपनी मल्‍टीलेयर राष्ट्रीय वायु एवं मिसाइल रक्षा परियोजना ‘सुदर्शन चक्र’ का विजन सार्वजनिक किया, वैसे ही पश्चिम एशिया से तेज प्रतिक्रिया सामने आई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस महत्वाकांक्षी AI कैपेबल और 2035 तक पूर्ण रूप से अस्तित्‍व में आने वाले एयर डिफेंस ग्रिड की रूपरेखा पेश करने के कुछ ही क्षणों बाद इजरायल की तरफ से रिएक्‍शन आया. इजरायल उन पहले देशों में शामिल हो गया, जिसने औपचारिक रूप से सहयोग की इच्छा जताई. यह त्वरित कूटनीतिक सक्रियता इस कार्यक्रम के सामरिक महत्व को बताने के लिए काफी है. ‘सुदर्शन चक्र’ केवल नए इंटरसेप्टर खरीदने की योजना नहीं है, बल्कि एक संप्रभु, यूनीफाइड और मल्‍टीलेयर एयर एंड मिसाइल डिफेंस ऑर्किटेक्‍चर का निर्माण करना है. इस कॉन्‍सेप्‍ट में भारत की मौजूदा बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) फेज-1 और फेज-2 सिस्‍टम्‍स को आगामी लंबी दूरी के M2 इंटरसेप्टर (Project Kusha) के साथ जोड़ा जाएगा. इसके साथ ही शॉर्ट और मीडियम रेंज सिस्टम की लेयर्स तैयार की जाएंगी, ताकि सामरिक प्रतिष्ठानों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे संवेदनशील इलाकों को बहुस्तरीय सुरक्षा कवच मिल सके.

भारत स्‍वदेशी एयर डिफेंस सिस्‍टम प्रोग्राम सुदर्शन चक्र पर काम कर रहा है. इजरायल ने इसमें भागीदारी की इच्‍छा जताते हुए कटिंग एज टेक्‍नोलॉजी मुहैया कराने की बात कही है. (फाइल फोटो/PTI)

कैसा होगा अपना सुदर्शन चक्र?

निचली और मध्यम लेयर में प्रस्तावित कैपिटल डोम ढांचा खास तौर पर नई दिल्ली और एनसीआर की सुरक्षा पर केंद्रित होगा. इसमें QRSAM और VL-SRSAM जैसी प्रणालियां डायरेक्‍टेड एनर्जी वेपन्‍स (लेजर सिस्टम) के साथ मिलकर काम करेंगी. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, इसका उद्देश्य रॉकेट, क्रूज मिसाइल, ड्रोन स्वार्म और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे उभरते खतरों से लेकर बैलिस्टिक और संभावित हाइपरसोनिक हथियारों तक के खिलाफ एक सतत और निर्बाध सुरक्षा घेरा तैयार करना है. सूत्रों के अनुसार, भारत इस परियोजना के अधिकांश हार्डवेयर घटकों (इंटरसेप्टर, रडार, कमांड-एंड-कंट्रोल नोड्स और एनर्जी वेपन) का स्वदेशी डिजाइन और निर्माण करना चाहता है. हालांकि, इजरायल का प्रस्ताव इस ढांचे के ‘डिजिटल नर्वस सिस्टम’ पर केंद्रित है. यानी वे एल्गोरिद्म, सेंसर फ्यूजन लॉजिक और बैटल मैनेजमेंट आर्किटेक्चर, जो विभिन्न सिस्‍टम्‍स को इंटीग्रेटेड ग्रिड की तरह ऑपरे करने में कैपेबल बनाते हैं.

सुदर्शन चक्र: उद्देश्‍य और लक्ष्‍य

  1. ‘सुदर्शन चक्र’ नाम और उद्देश्य: ‘सुदर्शन चक्र’ नाम भारतीय पौराणिक संदर्भ से प्रेरित माना जाता है, जो सटीक और घातक प्रहार की क्षमता का प्रतीक है. रक्षा हलकों में इस नाम का उपयोग आमतौर पर उन्नत वायु एवं मिसाइल रक्षा क्षमताओं से जोड़ा जाता है. इसका मकसद दुश्मन के लड़ाकू विमानों, ड्रोन और मिसाइल खतरों का समय रहते पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय करना है. यह कार्यक्रम भारत की बहुस्तरीय हवाई सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है.
  2. डीआरडीओ की भूमिका और तकनीकी विकास: इस तरह की रक्षा परियोजनाओं के विकास में Defence Research and Development Organisation (DRDO) केंद्रीय भूमिका निभाता है. स्वदेशी रडार, ट्रैकिंग सिस्टम और इंटरसेप्टर तकनीक को विकसित कर भारत आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है. उन्नत सेंसर और नेटवर्क आधारित कमांड सिस्टम इसके मुख्य घटक माने जाते हैं. इससे वास्तविक समय में खतरों की पहचान और जवाबी कार्रवाई संभव होती है.
  3. बहुस्तरीय वायु रक्षा ढांचा: भारत पहले ही Indian Air Force और आर्मी के जरिए कई वायु रक्षा प्रणालियां संचालित कर रहा है. ‘सुदर्शन चक्र’ जैसी अवधारणा इन प्रणालियों को एकीकृत कर एक समन्वित सुरक्षा कवच तैयार करने पर केंद्रित है. लंबी, मध्यम और कम दूरी की मिसाइलों को एक नेटवर्क में जोड़कर किसी भी दिशा से आने वाले खतरे का मुकाबला किया जा सकता है. इससे सामरिक ठिकानों, महानगरों और सैन्य अड्डों की सुरक्षा और मजबूत होती है.
  4. सामरिक महत्व और क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य: चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की बढ़ती मिसाइल व ड्रोन क्षमता के बीच भारत अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने पर जोर दे रहा है. आधुनिक युद्ध में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के खतरे को देखते हुए उन्नत रक्षा कवच की आवश्यकता बढ़ी है. ‘सुदर्शन चक्र’ कार्यक्रम को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इसका उद्देश्य किसी भी आकस्मिक हमले की स्थिति में त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना है.
  5. आत्मनिर्भर भारत और भविष्य की दिशा: यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अनुरूप स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में अहम मानी जाती है. रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योग और निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ रही है. आने वाले समय में ऐसी प्रणालियों के निर्यात की संभावनाएं भी बन सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सुदर्शन चक्र’ जैसे कार्यक्रम भारत को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में मजबूत स्थिति दिलाने में सहायक होंगे.

रियल टाइम डिसिजन मेकिंग

मल्‍टीलेयर डिफेंस सिस्‍टम में सबसे बड़ी चुनौती रीयल टाइम निर्णय क्षमता होती है. किसी तीव्र मिसाइल हमले की स्थिति में प्रणाली को मिलीसेकंड के भीतर तय करना होता है कि किस खतरे के लिए कौन सा लेयर एक्टिव किया जाए. कम लागत वाले ड्रोन को गिराने के लिए महंगे लंबी दूरी के इंटरसेप्टर का उपयोग रणनीतिक रूप से अव्यावहारिक होगा, जबकि बैलिस्टिक मिसाइल जैसे गंभीर खतरे पर देरी विनाशकारी साबित हो सकती है. इजरायली प्रस्ताव में उन्नत बैटल मैनेजमेंट एल्गोरिद्म शामिल बताए जा रहे हैं, जो खतरे की प्रकृति, दूरी और लागत के आधार पर सबसे उपयुक्त प्रतिक्रिया का स्वतः चयन कर सकें. सेंसर क्षमता और लक्ष्य की सटीक पहचान इस पूरी प्रणाली का फोकल प्‍वाइंट है. बैलिस्टिक मिसाइल डेटरेंस के दौरान असली वारहेड और डिकॉय के बीच अंतर करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. इजरायल ने वर्षों से मिसाइल डिफेंस इकोसिस्‍टम में सीकर तकनीक और उन्नत सेंसर सूट विकसित किए हैं, जो वास्तविक लक्ष्य और डेकॉय के बीच फर्क करने में सक्षम हैं. ऐसी तकनीकें झूठे अलार्म और अनावश्यक इंटरसेप्शन को कम कर इंटरसेप्टर भंडार की बचत कर सकती हैं.

2500 किलामीटर तक डिटेक्‍शन कैपेसिटी

एक और महत्वपूर्ण पहलू है – अर्ली डिटेक्शन. जानकारी के अनुसार, इजरायल ऐसी तकनीकों की पेशकश कर सकता है जो रडार और सेंसर विजन को राष्ट्रीय सीमाओं से काफी आगे तक विस्तारित कर दें. इस टेक्‍नोलॉजी की मदद से संभवतः 2500 किलोमीटर तक थ्रेट एक्टिवेशन का पता लगाना संभव हो सकेगा. यदि लॉन्च का पता शुरुआती चरण में ही चल जाए, तो ऊपरी परत के इंटरसेप्टर ऊंचाई और दूरी पर ही खतरे को निष्क्रिय कर सकते हैं, जिससे लोअर लेयर को अतिरिक्त प्रतिक्रिया समय मिलता है. रणनीतिक रूप से देखें तो ‘सुदर्शन चक्र’ का मूल फोकस इंटीग्रेशन है. भारत पहले से ही विभिन्न एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म तैनात कर चुका है या विकसित कर रहा है. असली जटिलता इन सभी प्रणालियों के बीच निर्बाध संचार, डेटा साझा करने की गति और एकीकृत कमांड स्ट्रक्चर के तहत समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करने में है. इज़रायल का प्रस्ताव इसी सॉफ्टवेयर और बैटल लॉजिक के जरिए भारत के स्वदेशी हार्डवेयर को एक समेकित, सिंक्रोनाइज़्ड ढाल में बदलने पर केंद्रित दिखता है. अपग्रेडेड एल्गोरिद्मिक फ्रेमवर्क और सेंसर इंटीग्रेशन विशेषज्ञता का लाभ उठाकर वह इस विशाल परियोजना की समयसीमा को कम कर सकता है और जोखिम घटा सकता है. 2035 तक पूर्ण ऑपरेशनल कैपेबिलिटी के लक्ष्य के साथ ‘सुदर्शन चक्र’ केवल एक रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी और सामरिक क्षमता का प्रतीक बनकर उभर सकता है.

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