मेंथा की खेती से बढ़ती है खेत की उर्वरता, किसान के लिए फायदे का सौदा, कम पूंजी, सिंचाई से तैयार होती है फसल
शाहजहांपुर: प्रदेश में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अब किसान नकदी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. औषधीय गुणों से भरपूर मेंथा की खेती जनवरी से मार्च के बीच किसानों के लिए सुनहरा मौका लेकर आती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सही समय पर रोपाई और उर्वरकों का संतुलित प्रयोग किया जाए, तो किसान प्रति हेक्टेयर 150 से 250 किलो तक तेल का उत्पादन कर सकते हैं. कम कीट हमलों और उच्च बाजार मांग के कारण, मेंथा न केवल मिट्टी की उर्वरता बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रही है.
खेती का करें वैज्ञानिक प्रबंधन
जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि मेंथा की खेती में सफलता के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है. किसान खेत की तैयारी के समय 10-12 टन गोबर की खाद के साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक साथ न देकर, उसे हिस्सों में डालें. रोपाई के समय पौधों के बीच 45 से 60 सेमी की दूरी रखें. क्योंकि मेंथा की फसल को ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसलिए पर्याप्त सिंचाई व्यवस्था होने पर ही इसकी खेती करें, ताकि तेल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों पर्याप्त मात्रा में मिल सकें.
सही समय और बुवाई का महत्व
मेंथा की खेती के लिए समय का चुनाव सबसे जरूरी है. जनवरी से मार्च के बीच का समय रोपाई के लिए सर्वोत्तम होता है. इस दौरान वातावरण का तापमान जड़ों के विकास और पौधों की बढ़वार के लिए अनुकूल रहता है. अगर किसान जनवरी या फरवरी में बुवाई करते हैं, तो मानसून आने से पहले फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, जिससे तेल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में बढ़ोतरी देखी जाती है.
एक सफल फसल के लिए खेत की गहरी जुताई जरूरी है. मेंथा के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो. खेत तैयार करते समय 10 से 12 टन सड़ी हुई गोबर की खाद डालने से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है. यह जैविक खाद न केवल पोषक तत्व प्रदान करती है, बल्कि मिट्टी की नमी सोखने की क्षमता को भी बढ़ाती है, जो मेंथा की ग्रोथ के लिए जरूरी है.
प्रति हेक्टेयर डालें इतनी खाद
पोषक तत्वों का प्रबंधन फसल की उपज निर्धारित करता है. प्रति हेक्टेयर 150 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस और 50 किलो पोटाश की सिफारिश की जाती है. ध्यान देने वाली बात यह है कि फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही दी जानी चाहिए, जबकि नाइट्रोजन को किश्तों में देना चाहिए. इससे पौधों को उनकी ग्रोथ के विभिन्न चरणों में निरंतर पोषण मिलता रहता है और तेल का उत्पादन बढ़ता है.
रोपाई के दौरान पौधों के बीच की दूरी उत्पादकता को सीधे प्रभावित करती है. मेंथा की जड़ों या पौधों को 45 से 60 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए. उचित दूरी होने से पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और प्रत्येक पौधे को समान रूप से धूप और हवा प्राप्त होती है. यह विधि न केवल खरपतवार नियंत्रण में मदद करती है बल्कि फसल की कटाई को भी आसान बनाती है.
मेंथा के तेल की बाजार में खूब डिमांड
मेंथा एक ऐसी फसल है जिसे नियमित अंतराल पर पानी की आवश्यकता होती है. मानसून से पहले की गर्मी में फसल को सूखने से बचाने के लिए 6 से 8 बार सिंचाई करनी पड़ती है. अगर वर्षा कम हो, तो यह संख्या 15 से 16 तक भी जा सकती है. इसलिए, किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मेंथा की खेती वहीं करें जहां सिंचाई के पर्याप्त और विश्वसनीय साधन उपलब्ध हों.
मेंथा की खेती का मुख्य उत्पाद इसका तेल है. अनुकूल परिस्थितियों और बेहतर प्रबंधन के साथ, प्रति हेक्टेयर 150 से 250 किलोग्राम तक तेल उत्पादन लिया जा सकता है. वैश्विक बाजार में मेंथा ऑयल की भारी मांग के कारण किसानों को इसके अच्छे दाम मिलते हैं. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों की आय को दोगुना करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.