61 साल पहले बना अनोखा रिकॉर्ड, फिरकी गेंदबाज ने किया 11 बल्लेबाजों को आउट, 19 साल की उम्र में किया ये कारनामा

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नई दिल्ली.  भारत के महान ऑफ स्पिनर श्रीनिवास वेंकटराघवन क्रिकेट जगत की उन विरल विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने खेल के हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी. एक घातक गेंदबाज, एक चतुर कप्तान और बाद में दुनिया के सबसे सम्मानित अंपायरों में से एक वेंकटराघवन का सफर अनुशासन और उत्कृष्टता की मिसाल है.  1965 में न्यूजीलैंड के खिलाफ एक टेस्ट मैच में विपक्षी टीम के सभी 11 बल्लेबाजों को (पूरी पारी और मैच मिलाकर) अपनी फिरकी पर नचाने वाले वेंकटराघवन ने मात्र 19 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था.
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में जब ‘स्पिन चौकड़ी’ (बिशन सिंह बेदी, ई. प्रसन्ना, बी.एस. चंद्रशेखर और वेंकटराघवन) का जिक्र होता है, तो वेंकटराघवन को उस चौकड़ी का सबसे अनुशासित और सटीक गेंदबाज माना जाता है. 21 अप्रैल 1945 को मद्रास (अब चेन्नई) में जन्मे वेंकटराघवन ने अपनी ऑफ-स्पिन से न केवल बल्लेबाजों को छकाया, बल्कि क्रिकेट के मैदान पर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का लोहा भी मनवाया.

19 साल की उम्र में शानदार आगाज

वेंकटराघवन का अंतरराष्ट्रीय पदार्पण 1965 में न्यूजीलैंड के खिलाफ हुआ था.  महज 19 साल की उम्र में उन्होंने अपनी स्पिन का ऐसा जादू बिखेरा कि कीवी बल्लेबाज असहाय नजर आए.  उसी डेब्यू सीरीज में उन्होंने 21 विकेट लेकर सनसनी मचा दी थी. दिल्ली टेस्ट में उन्होंने एक ऐसा कारनामा किया जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. वेंकटराघवन उस मैच में न्यूजीलैंड के सभी 11 खिलाड़ियों को आउट करने (पूरा मैच मिलाकर) में भूमिका निभाई. उनकी सटीकता ऐसी थी कि दुनिया के महानतम बल्लेबाज भी उनके खिलाफ रन बनाने के लिए संघर्ष करते थे. वेंकटराघवन ने पहली पारी में कीवी टीम के 8 बल्लेबाज ग्राहम डाउलिंग, टैरी जार्विस, रॉस मोर्गन, बीवन कॉंगडोन, बेर्ट सटक्लिफ, विक पोलार्ड, जॉन बार्ड और फ्रेंक कैमरॉन को आउट किया था. इसके बाद दूसरी पारी में 4 कीवी बल्लेबाज जिनमें जॉन रीड, ब्रूस टेलर और रिचर्ड कॉलिंगे के विकेट भी शामिल थे.

रणनीति के उस्ताद और कप्तान

वेंकटराघवन केवल एक गेंदबाज नहीं थे, बल्कि खेल के बेहतरीन रणनीतिकार भी थे. उन्होंने 1975 और 1979 के पहले दो विश्व कप में भारतीय टीम की कप्तानी की.  हालांकि, उस समय भारत एक मजबूत वनडे टीम नहीं था, लेकिन वेंकटराघवन के नेतृत्व ने टीम को एक ढांचा प्रदान किया.  घरेलू क्रिकेट में उन्होंने तमिलनाडु की टीम को अपनी कप्तानी में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया.

मैदान के ‘सुपरमैन’ फील्डर

आज के दौर में हम चुस्त फील्डिंग की बात करते हैं, लेकिन वेंकटराघवन अपने समय के बेहतरीन क्लोज-इन फील्डरों में से एक थे. ‘गली’ और ‘शॉर्ट लेग’ पर खड़े होकर उन्होंने जो कैच लपके, वे स्पिन गेंदबाजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं थे. वे एक उपयोगी निचले क्रम के बल्लेबाज भी थे, जिन्होंने कई मौकों पर महत्वपूर्ण रन बनाए.

अंपायरिंग का दूसरा शानदार अध्याय

1983 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद, वेंकटराघवन ने हार नहीं मानी और खेल के प्रति अपने जुनून को एक नए रूप में ढाला.  उन्होंने अंपायरिंग को अपना करियर बनाया. उनकी निष्पक्षता, नियमों की गहरी समझ और शांत स्वभाव ने उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ अंपायर बना दिया.  वह ‘आईसीसी एलीट पैनल’ के शुरुआती सदस्यों में से एक थे. उन्होंने 73 टेस्ट और 52 वनडे मैचों में अंपायरिंग की, जिसमें कई विश्व कप मैच शामिल थे.

श्रीनिवास वेंकटराघवन भारतीय क्रिकेट के एक सच्चे ‘ऑलराउंडर’ रहे फिर वो  चाहे वह गेंद से 1965 की सीरीज में 21 विकेट चटकाना हो या अंपायर के रूप में कठिन फैसले लेना, उन्होंने हर भूमिका को पूरी ईमानदारी से निभाया. आज भी जब ऑफ-स्पिन की बारीकियों की बात होती है, तो वेंकटराघवन का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है.

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