NCERT Book Row: बिना रिव्यू कैसे छप गई विवादित बात? NCERT अधिकारियों ने कबूला- कमेटी में नहीं था कोई कानूनी एक्सपर्ट
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसारयह मामला इसलिए भी संवेदनशील बन गया क्योंकि अध्याय में लोकतंत्र की चुनौतियों के संदर्भ में न्यायपालिका से जुड़ी भ्रष्टाचार की चर्चा की गई थी. सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा कार्रवाई के आश्वासन के बाद अब NCERT की प्रक्रिया पर जांच जैसी स्थिति बन गई है. सवाल यह है कि जब किताबें कई स्तरों की समीक्षा से गुजरती हैं तो फिर यह सामग्री बिना कानूनी परीक्षण के कैसे प्रकाशित हो गई.
- अधिकारियों के मुताबिक विवादित अध्याय 2023 से 2025 के बीच तैयार हुआ और 2026 में नए सिलेबस के तहत लागू किया गया. राइटिंग कमेटी में सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों के साथ एक वकील जरूर शामिल था, लेकिन अंतिम समीक्षा चरण में कानूनी क्षेत्र से किसी विशेषज्ञ को शामिल नहीं किया गया. यही वजह है कि चैप्टर की भाषा और संदर्भों को लेकर बाद में आपत्तियां सामने आईं.
- जानकारों का कहना है कि पहले इस्तेमाल की जा रही क्लास 8 की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं था. नई किताब में लोकतंत्र की चुनौतियों, चुनावी प्रक्रिया, संस्थागत जवाबदेही और नागरिक सतर्कता जैसे विषयों के साथ यह चर्चा जोड़ी गई. NCERT का तर्क है कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत छात्रों को जटिल सामाजिक सवालों पर सोचने और विश्लेषण करने के लिए प्रेरित करना उद्देश्य था.
पिछले कुछ सालों में इतिहास, राजनीति और सामाजिक विषयों को लेकर भी NCERT के कई बड़े विवाद सामने आए हैं.
कैसे तैयार होती है NCERT की किताब
NCERT की कीताबें आमतौर पर बहु-स्तरीय प्रक्रिया से बनती हैं. पहले करिकुलर एरिया ग्रुप (CAG) बनाया जाता है. फिर विशेषज्ञ अध्याय लिखते हैं. उसके बाद शिक्षकों, बाहरी विशेषज्ञों, NCERT फैकल्टी और राष्ट्रीय सिलेबस समिति द्वारा समीक्षा होती है. बावजूद इसके इस मामले में कानूनी समीक्षा का अभाव सामने आना पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है. पूर्व NCERT निदेशक जे.एस. राजपूत ने भी माना कि विवाद से संस्था की छवि को नुकसान पहुंचा है.
विवाद आखिर किस अध्याय को लेकर है?
क्लास 8 की सोशल साइंस किताब के दूसरे भाग में लोकतंत्र की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया था. इसी हिस्से को लेकर आपत्ति जताई गई और इसे न्यायपालिका की छवि से जोड़कर देखा गया.
क्या किताब लिखने वाली कमेटी में वकील शामिल था?
हां, राइटिंग टीम में एक वकील सदस्य था. लेकिन अधिकारियों के अनुसार अंतिम समीक्षा प्रक्रिया में कानूनी क्षेत्र से कोई विशेषज्ञ शामिल नहीं था. यानी कंटेंट का कानूनी परीक्षण औपचारिक रूप से नहीं हुआ इससे विवाद की स्थिति बनी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जरूरत जताई. कोर्ट का मानना है कि शैक्षणिक सामग्री में संवेदनशील संस्थाओं का उल्लेख बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए.
NCERT ने अपनी सफाई में क्या कहा?
NCERT का कहना है कि कंटेंट नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप तैयार किया गया था. इसका उद्देश्य छात्रों को लोकतंत्र की वास्तविक चुनौतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करना था न कि किसी संस्था को निशाना बनाना.
आगे क्या बदलाव संभव हैं?
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अब किताब समीक्षा प्रक्रिया में कानूनी विशेषज्ञों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जा सकता है. साथ ही विवादित हिस्सों में संशोधन या स्पष्टीकरण भी जोड़ा जा सकता है ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न हों.
शिक्षा नीति और पाठ्यपुस्तकों पर बढ़ी निगरानी
इस विवाद ने साफ कर दिया है कि नई शिक्षा नीति के तहत क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा देने और संवेदनशील संस्थाओं के संतुलित दिखाने के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है. अब शिक्षा मंत्रालय और NCERT दोनों ही पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को और मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं ताकि शैक्षणिक स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान दोनों सुरक्षित रह सकें.