क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का भी होगा वही टेस्ट जो बाबा राम रहीम और आसाराम बापू का हो चुका है पहले?
वाराणसी: दो नाबालिग बटुकों के साथ यौन शोषण के आरोपों से घिरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही हैं, यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि क्या अविमुक्तेश्वरानंद अपनी गिरफ्तारी और सजा से बच जाएंगे? फिलहाल इलहााबाद हाईकोर्ट में उन्होंने अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की है. इधर, यूपी पुलिस ने कहा है कि बच्चों की मेडिकल रिपोर्ट में कुकर्म किए जाने की पुष्टि हो गई है. यूपी पुलिस तू डाल-डाल तो मैं पात-पात वाली कहावत पर चल रही है. ऐसे में अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कोर्ट में ‘नपुंसकता’ (Impotency) का सहारा लेंगे तो फिर यूपी पुलिस कोर्ट में क्या सबूत पेश करेगी. यदि स्वामी कोर्ट में यह दलील देते हैं कि वह शारीरिक रूप से यौन संबंध बनाने में सक्षम नहीं हैं, तो पुलिस के पास उन्हें बेनकाब करने के लिए क्या पुख्ता इंतजाम हैं? क्या अविमुक्तेश्वरानंद का भी पोटेंसी टेस्ट होगा, जो आसाराम बापू और राम रहीम जैसे बाबाओं का पहले हो चुका है?
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच की बारीकियों को समझने के लिए न्यूज 18 हिंदी ने दिल्ली पुलिस के पूर्व ज्वाइंट सीपी एसबीएस त्यागी से बात की, त्यागी कहते हैं, ‘नए बीएनएस कानून , एआई और आधुनिक मेडिकल साइंस के दौर में पोटेंसी टेस्ट जैसा दांव पुराना हो चुका है. अब पुलिस फॉरेंसिक एविडेंस से सबूत जुटा सकती है. यौन शोषण के मामलों में जब भी कोई आरोपी खुद को नपुंसक बताकर अपराध से पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है, तो पुलिस तुरंत धारा 53ए के तहत उसका Potency Test कराने की मांग अदालत से करती है. पुलिस केवल आरोपी के बयान पर भरोसा नहीं करती, बल्कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ही अंतिम सत्य मानी जाती है. अगर अविमुक्तेश्वरानंद ऐसा कोई दावा करते हैं, तो सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों का एक पैनल उनकी शारीरिक क्षमता की जांच करेगा, जिसमें हार्मोनल लेवल से लेकर फिजिकल रिस्पॉन्स तक सब कुछ रिकॉर्ड किया जाता है.’
अविमुक्तेश्वरानंद कौन-कौन दांव चल सकते हैं?
दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के वकील रविशंकर कुमार कहते हैं, ‘इस मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी पक्ष के पास बचाव के कई विकल्प मौजूद हैं. कोर्ट में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पुराने मेडिकल रिकॉर्ड पेश किए जा सकते हैं कि वे ब्रह्मचर्य या बीमारी के कारण शारीरिक रूप से अक्षम हैं. क्योंकि मामला नाबालिग बच्चों से जुड़ा है तो ऐसे में पॉस्को एक्ट अविमुक्तेश्वानंद को परेशानी में डाल सकता है. बचाव पक्ष इसे एक धार्मिक या राजनीतिक साजिश बताकर मामले को भटकाने की कोशिश कर सकती है या दलील दे सकती है. स्वास्थ्य का हवाला देकर गिरफ्तारी से बचने का प्रयास भी किया जा सकता है.’
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मामला आसाराम बापू वाले मामले से कितना अलग है?
यूपी पुलिस कोर्ट को क्या बताएगी?
यूपी पुलिस के एक अधिकारी की मानें तो यूपी पुलिस अविमुक्तेश्वरानंद के संभावित चालों की काट पहले ही तैयार कर ली है. यदि स्वामी खुद को नपुंसक बताते हैं, तो पुलिस अदालत में तर्क देगी कि ‘नपुंसकता’ का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति यौन हमला नहीं कर सकता. कानून के अनुसार, यौन शोषण के लिए पूर्ण संभोग अनिवार्य नहीं है, ‘डिजिटल पेनिट्रेशन’ या अन्य कृत्य भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं. अगर पीड़ित या पीड़िता के कपड़ों या शरीर पर किसी भी प्रकार के जैविक साक्ष्य मिलते हैं, तो पोटेंसी टेस्ट की अहमियत कम हो जाती है और डीएनए सबसे बड़ा गवाह बन जाता है.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण
इसके साथ ही पुलिस आरोपी का पॉलीग्राफ या नार्को टेस्ट कराने की अनुमति भी मांग सकती है ताकि यह पता चले कि क्या वे जांच को गुमराह कर रहे हैं.
क्या होता है पोटेंसी टेस्ट?
पोटेंसी टेस्ट में यह जांचा जाता है कि क्या आरोपी के भीतर संभोग करने की शारीरिक क्षमता है. इसमें रक्त परीक्षण, मूत्र परीक्षण और कई बार विशेष इंजेक्शन के जरिए शारीरिक प्रतिक्रिया देखी जाती है. यदि रिपोर्ट में यह पाया जाता है कि आरोपी सक्षम है, तो उसका नपुंसकता का दावा न केवल खारिज हो जाता है, बल्कि यह अदालत में उसकी ‘झूठ बोलने की प्रवृत्ति’ को भी साबित कर देता है, जिससे उसकी जमानत मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है.
हाल के वर्षों में आसाराम बापू से लेकर राम रहीम मामलों में अदालतें ऐसे संवेदनशील मामलों में बेहद सख्त रुख अपना रही हैं. यदि पुलिस यह साबित कर देती है कि आरोपी प्रभावशाली व्यक्ति है और जांच को प्रभावित कर सकता है, तो नपुंसकता के दावों के बावजूद हिरासत में पूछताछ की अनुमति मिलना तय है. पुलिस अब साक्ष्यों को जुटाने में लगी है ताकि चार्जशीट फाइल होते समय कोई भी कानूनी लूपहोल न बचे.