Holika Dahan 2026 in phalain gaon mathura panda ran burning holika 5200 year old tradition | ब्रज के इस गांव में होलिका दहन की धधकती आग से चलकर निकलता है पुजारी, 5200 साल पुरानी परंपरा के बारे में जानें

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मथुरा के इस गांव में होलिका दहन की अनोखी परंपरा, जलती आग पर चलते हैं पुजारी

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Holika Dahan 2026: मथुरा की होली विश्व प्रसिद्ध है और यहां की होली को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं. लेकिन ब्रज के एक गांव में होलिका दहन की रात ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जिससे लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता. जी हां, यहां होलिका होलिका दहन की धधकती आग से एक पुजारी निकलता है और यह परंपरा 5200 साल पुरानी बताया जाता है.

Holika Dahan 2026: रंगों के पर्व होली की शुरुआत ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज के साथ हो चुकी है. फूलों की होली, लठमार या लड्डू की होली, सभी मन मोहते हैं. इस बार मथुरा-वृंदावन समेत पूरे ब्रज में 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा, 3 मार्च को चंद्र ग्रहण और 4 मार्च को रंगों वाली होली खेली जाएगी. वहीं, कृष्ण नगरी मथुरा के फालैन गांव में अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां के निवासी सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन भक्ति और विश्वास के साथ करते हैं. इस परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं और सभी इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते हैं. आइए जानते हैं होलिका दहन के दिन निभाई जाने वाली इस परंपरा के बारे में…

मथुरा जिले के फालैन गांव में 5200 साल पुरानी होलिका दहन की परंपरा आज भी जीवंत है, जो भक्त प्रह्लाद की आस्था और अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है. यह गांव ‘प्रह्लाद की नगरी’ के नाम से जाना जाता है और यहां होलिका दहन केवल अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, तपस्या और साहस का उदाहरण है.

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, फालैन गांव का होलिका दहन आस्था का अद्भुत उत्सव है. होलिका दहन से लगभग 45 दिन पहले गांव का पुजारी कठोर व्रत, तप, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि-शयन और विशेष अनुष्ठान शुरू करता है. प्रह्लाद मंदिर में रहकर वह दिन में एक बार भोजन करता है और सात्विक जीवन जीता है.

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इसके बाद होलिका दहन की रात, शुभ मुहूर्त के समय पंडा पहले प्रह्लाद कुंड में स्नान और पूजा करते हैं. इसके बाद विशाल होलिका प्रज्वलित की जाती है. जब आग प्रचंड रूप ले लेती है और अंगारे दहकने लगते हैं, तब पुजारी मोनू पंडा नंगे पैर, निडर होकर जलती हुई होलिका के बीच से गुजरता है या दौड़ लगाता है. यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है. उस समय पूरा गांव होलिका मैया और भक्त प्रहलाद के जयकारे गूंजने लगते हैं.

यह परंपरा सतयुग से चली आ रही मानी जाती है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी है. होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की आस्था से वह खुद जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे. फालैन में पुजारी इसी घटना का जीवंत रूप निभाते हैं. ग्रामीणों का दावा है कि सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ.

ऐसा नहीं है कि कोई एक व्यक्ति ही इस परंपरा को निभाता है. अगर कोई व्यक्ति इस परंपरा को निभाने में असमर्थता जताता है तो वह पूजा की माला को मंदिर में रख देता है. दरअसल जो व्यक्ति पूजा का माला अपने पास रखता है, वही होलिका दहन की आग के बीच में से निकलता है. पूजा की इस माला को भक्त प्रह्लाद की माला कहते हैं.

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