जिस मां को पूजा, उसे ही कूड़े के हवाले सौंपा! गाजीपुर के ‘ददरी घाट’ की बदहाली देख चौंक जाएंगे, देखिए स्थिति
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Ground Report Ghazipur Dadri Ghat: गाजीपुर के ऐतिहासिक ददरी घाट पर गंदगी का आलम ऐसा पसरा हुआ है कि अब एरिया डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होता दिख रहा है. ददरी घाट पर कदम रखते ही स्वागत कूड़े के ढेरों से होता है. प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट, फटी हुई चुनरियां और घरेलू कचरा घाट की सीढ़ियों पर पसरा हुआ है.
गाजीपुर: आस्था की जननी कही जाने वाली मां गंगा आज मानवीय लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही है. गाजीपुर के ऐतिहासिक ददरी घाट पर की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग में जो तस्वीरें सामने आईं, वे विचलित करने वाली हैं. नमामि गंगे जैसे बड़े अभियानों के बावजूद, घाट का एक बड़ा हिस्सा अब डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होता दिख रहा है.
ददरी घाट पर कदम रखते ही स्वागत कूड़े के ढेरों से होता है. प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट, फटी हुई चुनरियां और घरेलू कचरा घाट की सीढ़ियों पर पसरा हुआ है. सबसे गंभीर स्थिति वहां बहने वाला नाला पैदा कर रहा है, जो सीधे गंगा के आंचल में गंदगी उगल रहा है. यह नजारा न केवल आस्था को चोट पहुंचाता है, बल्कि जलीय पारिस्थितिकीय के लिए भी बड़ा खतरा है.
20 साल में नहीं दिखे ऐसे हालात
स्थानीय निवासी सिद्धार्थ, जो पिछले दो दशकों से इसी घाट के समीप रह रहे हैं, बताते हैं कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. सिद्धार्थ ने कहा, पहले कचरा होता था तो वह जैविक (फूल-माला) होता था, जो समय के साथ गल जाता था. लेकिन अब प्लास्टिक का बोलबाला है. बीते दो-चार दिनों में तो कचरे की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि पूरा इलाका कूड़ाघर लगने लगा है.
सिविक सेंस की कमी और प्रशासनिक सुस्ती
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान यह बात भी सामने आई कि घाट पर डस्टबिन होने के बावजूद लोग कचरा बाहर फेंकते हैं. सिद्धार्थ के अनुसार, बाहर से आने वाले श्रद्धालु और सैलानी खाने-पीने का सामान जैसे समोसा ,कोल्ड ड्रिंक लाते हैं और इस्तेमाल के बाद कचरा वहीं छोड़ देते हैं. इससे न केवल दुर्गंध बढ़ रही है, बल्कि मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी मोहल्ले पर मंडराने लगा है.
वहीं, घाट पर फूल बेचने वाली एक महिला ने बताया कि नगर पालिका सफाई तो करती है, लेकिन दो दिन बाद फिर उनकी सफाई मिट्टी में मिल जा रही है. लोग आज भी पूजा सामग्री और पॉलिथीन सीधे गंगा में प्रवाहित कर रहे हैं.
गंभीर सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?
ददरी घाट की यह चीखती हकीकत प्रशासन और जनता दोनों पर सवालिया निशान लगाती है. अगर दो-तीन दिनों में कचरे का पहाड़ खड़ा हो रहा है, तो नगर पालिका की मॉनिटरिंग कहां है. क्या डस्टबिन की संख्या और उनकी लोकेशन सही है और सबसे अहम क्या हम नागरिक के तौर पर अपनी जिम्मेदारी भूल चुके हैं? सिर्फ बजट आवंटित करने या नारे लगाने से गंगा साफ नहीं होगी. ददरी घाट को डंपिंग ग्राउंड बनने से बचाने के लिए सख्त निगरानी और जनता की जागरूकता का संगम होना अनिवार्य है.
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आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.