Imran Khan Delhi Jalandhar Connection: दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा है, दिल्ली की वो शाम, जब उन्होंने कहा, आज मैंने हिन्दुस्तान को जाना

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विवेक शुक्ला, नई दिल्ली: उस दिन तारीख थी 4 नवंबर 2004. दो दिन के बाद ईद थी. फिजाओं में ईद की खुशियों को महसूस किया जा सकता था. माह-ए-रमजान खत्म हो रहा था. उस दिन मगरिब की नमाज पढ़ने के लिए बुलंद जामा मस्जिद में पाकिस्तान के सुपर स्टार इमरान खान भी पहुंचे थे. नमाज खत्म होते ही जब वहां पर मौजूद सैकड़ों लोगों को पता चला कि उनके बीच में इमरान खान आए हुए हैं, तो सब बड़े-छोटे उनकी तरफ खजूर, फल वगैरह देने के लिए बढ़ें. इमरान खान कुछ देर वहां सबके में बीच में रहे.

इमरान खान ने जामा मस्जिद से एक छोटी सी तकरीर भी की. वे कुछ पलों तक जामा मस्जिद में एक साथ बैठे सैकड़ों रोजेदारों को देखते रहे थे. वहां पर इस तरह का मंजर रमजान के दौरान रोज देखा जा सकता है. कुछ देर अपने चाहने वालों के साथ गुजारने के बाद वे जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी के पास जाते हुए इस खाकसार से कह रहे थे- ‘आज मैंने इस बुलंद मस्जिद में आकर हिन्दुस्तान को जाना.’ इमरान खान पूछने लगे- ‘जामा मस्जिद की मेंटेनेंस कौन देखता है?’ हमने बताया कि आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया. ‘बहुत अच्छी तरह से मेंटेन है.’ उन्होंने कहा.

इमरान खान का दिल्ली दौरा

अब रमजान का महीना आज से शुरू हो रहा है. 22 साल हो गए हैं, जब इमरान खान जामा मस्जिद में आए थे. वे तब साउथ एशिया के सबसे बड़े सुपर स्टार थे. वे उन दिनों हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में भाग लेने के लिए आए हुए थे, उनके साथ मोहम्मद इकबाल के पौत्र इकबाल भी थे.

और अब इमरान जेल की चारदीवारी में कैद हैं और सबसे दर्दनाक खबर उनकी दाहिनी आंख की रोशनी है, जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. 85 फीसद तक विजन खो चुकी है, ये सुनकर दिल कांप जाता है. वो इंसान जो कभी स्टेडियम में तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता था, आज अंधेरे में संघर्ष कर रहा है. ये सिर्फ एक आंख की बात नहीं, ये एक पूरे युग के सपनों पर चोट है.

आज याद आ रहा जब 4 नवंबर, 2004 को इमरान खान ने इस खाकसार से कहा कि मगरिब की नमाज जामा मस्जिद में पढ़ने का मन है. हम उस सम्मेलन के दौरान उनके साथ अटैच थे. इमरान खान के जामा मस्जिद जाने की इच्छा व्यक्त करते ही हमने तुरंत जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी से बात हुई. उन्होंने कहा:

इमरान खान जामा मस्जिद में आएं. हम उनका इंतजार करेंगे, स्वागत करेंगे.

हम उनको लेकर जामा मस्जिद पहुंचे. हमारे साथ में लेखक और मौलाना आजाद के पौत्र फिरोज बख्त अहमद भी थे. ये खाकसार और फिरोज बख्त अहमद मौर्या शेरटन होटल से इमरान खान को लेकर कंटेसा कार पर जामा मस्जिद के लिए निकले. कार अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही थी और वे दिल्ली को निहार रहे थे.

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मस्जिदें बहुत हैं दिल्ली में…
जामा मस्जिद जाते हुए इमरान खान को रास्ते में कई जगहों पर मस्जिदें दिखाईं दे रही थीं. जब हमारी कार ने कनॉट प्लेस से मिन्टो रोड की तरफ का रुख किया तो वो कहने लगे, ‘यार, दिल्ली में मस्जिदें बहुत हैं.’ हमने जवाब दिया- ‘इस्लामाबाद से तो ज्यादा ही होंगी.’ फिर वो पंजाबी में बोले, ‘मुझे इधर पंजाबी बोलने वाले बहुत मिल रहे हैं. लाहौर और दिल्ली का फर्क नजर ही नहीं आ रहा.’ हमने जवाब दिया, ‘दिल्ली में लाहौर से ज्यादा लाहौरिये हैं.’ उन्होंने पूछा, ‘कैसे?’. जवाब मिला कि विभाजन के बाद लाहौर के हजारों हिन्दू-सिख परिवार यहां पर आकर बस गए थे इसलिए दिल्ली पर लाहौरियो का असर तो है. ये जानकारी मिलने पर वे हैरान जरूर हुए थे. अभी बातचीत जारी ही थी कि हम लाल किले को पीछे छोड़ते हुए जामा मस्जिद में पहुंच गए थे.

दावा किया जा रहा है कि इमरान खान को जेल में अमानवीय स्थितियों में रखा जा रहा है (AI)

जालंधर और इमरान खान की मां
इमरान खान उस दौरान तीन-चार दिनों तक दिल्ली में ही थे. उनसे हम लगातार बातचीत कर रहे थे. दो नवंबर, 2004 को मौर्या शेरटन के शानदार कमरे में बैठकर गुफ्तुगू हो रही थी. हमने उनसे कहा कि आप से क्रिकेट और सियासत की बातें नहीं करेंगे. वो कुछ हैरान होकर पूछने लगे- ‘फिर क्या बात करनी है?” हमने जवाब दिया- ‘हम आपसे आपकी मां शौकत खानम के शहर जालंधर, वहां के पठान और आपके बस्ती नौ की हवेली की बातें करेंगे. ये सब सुनकर उनके चेहरे के भाव बदलने लगे. वे अपने कमरे से दिल्ली के ट्रैफिक पर नजर डालते हुए पंजाबी में कहने लगे- ‘तैन्नू किंज इल्म होया इन गलां दा (तुम्हें इन सब बातों का कब पता चला?). तूझे मेरे बारे में इतना सब कैसे पता चला ?हमने जवाब दिया कि ‘हम तो जानते थे.’ अब वे बताने लगे- ‘जालंधर में मेरे नाना अहमद हसन खान साहब ने इस्लामिया कॉलेज खोला था. मेरे नाना के वालिद का नाम अहमद हसन खान था. वो भी जालंधर की असरदार हस्ती थे. वहां पर ही मेरी मां शौकत खानम की पैदाइश हुई. वहां ही वो 1947 तक रहीं. उनकी वहां बहुत सी सहेलियां थीं, जिनका वो बाद में जिक्र करती थी. हमारी बस्ती नौ में बड़ी सी हवेली थी. उसी में मेरी मां रही. मेरी मां का खानदान गुजरे 500 सालों से जालंधर के आसपास ही रहता था. मैं 1983 में भारत के दौरे पर आया तो अपने ननिहाल बस्ती गया था.’

हिकारत भरा भाव जिया के लिए
इमरान खान ने अपना उत्तर पूरा किया तो हमने बातों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कहा,’सर, जिया उल हक और नुसरत फतेह अली खान भी तो जालंधर के ही थे.’ इमरान खान ने जिया उल खान का नाम सुनते ही कहा- ‘जिया हौरी अंरई सी (जिया अरंईं परिवार से थे). पंजाब में सब्जी के धंधे से जुड़े लोगों को अरंई कहा जाता है. उन्होंने जिया का नाम बड़े ही हिकारत के भाव से लिया था. हमारी बातचीत के मानो केन्द्र में जालंधर आ चुका था. वे कह रहे थे, ‘जालंधर के बिना पाकिस्तान अधूरा है. वहां पर जालंधर से आकर बसे लोग असरदार हैं.’

माता-पिता के साथ युवा इमरान खान (AI)

और दिल में बसता जालंधर
इमरान खान से बातचीत करते हुए हमें हैरानी हो रही थी कि उन्हें अपने ननिहाल जालंधर के इतनी जानकारी है. वे हमें बता रहे थे. ‘जालंधर, पंजाब का तारीखी शहर है. जालंधर के विभिन्न हिस्सों में कई बस्तियां हैं, जिनमें से ‘बस्ती नौ’ है. बस्ती नौ का नाम संभवतः स्थानीय संख्यात्मक नामकरण प्रथा से लिया गया है, जो जालंधर की कई बस्तियों में देखने को मिलता है, जैसे बस्ती शेख, बस्ती गुजां, बस्ती दानिशमंदां आदि. ‘नौ’ शब्द का अर्थ हिंदी, उर्दू और पंजाबी में ‘नौवां’ होता है. इमरान खान आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री के स्टुडेंट थे इसलिए हिस्ट्री में उनकी दिलचस्पी स्वाभाविक है. वे बताने लगे- ‘जालंधर का इतिहास 7,000 साल से भी पुराना माना जाता है, जो सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से सिद्ध होता है. बस्ती नौ का विकास संभवतः मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल में हुआ, जब जालंधर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र बन गया था. मुगल काल में यह शहर सतलुज और व्यास नदियों के बीच एक प्रमुख नगर था, और महमूद गजनवी जैसे आक्रमणकारियों ने इसे लूटा था.’ इमरान खान ने बताया था कि उनके अधिकतर संबंधी बस्ती नौ और बस्ती दानिशमंदा में रहा करता था. विभाजन के बाद यह परिवार पाकिस्तान चला गया और लाहौर में बस गया. इमरान खान ने अपनी आत्मकथा “Pakistan: A Personal History” में अपने परिवार के जालंधर कनेक्शन का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने बताया कि उनके पुरखों की जड़ें पंजाब के जालंधर शहर से जुड़ी थीं.

हमवतन दूर-दूर
उस समिट में पाकिस्तान में उर्दू भाषियों के हकों के लिए लड़ने वली मुताहिदा कौमी मुवमेंट (एमक्यूएम) के फाउंडर और प्रखर नेता अल्ताफ हुसैन भी आए हुए थे. हालांकि दोनों हम वतन एक दूसरे से दूर-दूर थे. इमरान खान ने हम से कहा था कि अल्ताफ हुसैन कातिल है. ये कराची में सिंधियों और मुहाजिरों को लड़ाता है. खैर, अल्ताफ हुसैन ने समिट में दिए अपने ओजस्वी वक्तव्य में कहा था कि पाकिस्तान बनने से किसी को भी लाभ नहीं हुआ. वे पाकिस्तान में यूपी और बिहारी मुसलमानों की हालत पर खुलकर बोले थे, इससे इमरान खान कुछ झेंप से गए थे. इमरान खान कहने लगे- ‘मुताहिदा कौमी मुवमेंट (एमक्यूएम) वाले बड़े जालिम हैं, इन्होंने कराची को तबाह कर दिया है. ये शरीफ लोगों का कत्ल करते रहते हैं.

इस बीच, दिल्ली-6 के सोशल वर्कर मोहम्मद तकी उस दिन जामा मस्जिद में ही थे, जब वहां पर इमरान खान आए थे. वे भी इमरान खान की सेहत को लेकर आ रही खबरों से उदास हैं. कहने लगे- मैं उनके लिए दुआ करूंगा. वो तो बहुत प्यारा दुश्मन है.

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