आदिवासी-ईसाईयों के शव कब्र से बाहर निकालने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, इस वजह से छत्तीसगढ़ सरकार से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को छत्तीसगढ़ सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें आरोप लगाया गया है कि गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकाला गया और फिर से दफनाया गया है.

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सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को छत्तीसगढ़ सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकाला गया और फिर से दफनाया गया. अदालत ने आगे शव निकालने पर रोक भी लगा दी. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.

याचिकाकर्ता की तरफ से किया गया ऐसा दावा
याचिका में दावा किया गया था कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को अपने गांवों के कब्रिस्तान में मृत परिवार के सदस्यों को दफनाने से रोका जा रहा है. ‘छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वैलिटी’ और अन्य द्वारा अधिवक्ता सत्य मित्रा के जरिए दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक की मां के शव को उनकी जानकारी के बिना कब्र से निकालकर कहीं और दफना दिया गया.

अगले चार हफ्ते के लिए स्थगित कर दी सुनवाई
बेंच द्वारा राज्य सरकार को नोटिस जारी करने के बाद, गोंसाल्वेस ने अदालत से कब्रों से शवों को जबरन हटाने की किसी भी कार्रवाई पर रोक लगाने का आग्रह किया. बेंच ने आगे किसी भी शव को कब्र से निकालने पर रोक लगा दी और मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद के लिए स्थगित कर दी.

मृतक को गांव में दफनाने की मांगी अनुमति
याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर यह याचिका आदिवासी ईसाइयों के लिए है, जिन्हें अन्य सभी समुदायों की तरह अपने गांवों की सीमाओं के भीतर कब्रिस्तान में अपने मृतकों को दफनाने से जबरन रोका जा रहा है. याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि सभी व्यक्तियों को, चाहे उनकी जाति, धर्म या एससी/एसटी/ओबीसी स्थिति कुछ भी हो, अपने मृतक को उसी गांव में दफनाने की अनुमति दी जाए जहां वे रहते हैं.

याचिका में राज्य सरकार पर लगाया गया बड़ा आरोप
याचिका में राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि वे हर गांव में सभी समुदायों के लिए दफनाने के लिए अलग क्षेत्र तय करें. याचिका में आरोप लगाया गया है कि मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, सरकार ने सांप्रदायिक तत्वों के गैरकानूनी कामों को अनुमति दी है और उन्हें बढ़ावा भी दिया है, जो धर्म के नाम पर शवों को खोदते हैं, अंतिम संस्कार में बाधा डालते हैं और परिवारों को डराते-धमकाते हैं.

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