रवि टंडन: आगरा से मुंबई तक हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्देशक का सफर
नई दिल्ली. मुंबई की चमचमाती फिल्मी दुनिया ने हमेशा सपनों को पंख दिए हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ऊंचाइयों पर पहुंचकर भी अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं. हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्देशक रवि टंडन ऐसे ही व्यक्ति थे. उन्हें मायानगरी ने पहचान, दौलत और शोहरत दी, लेकिन उनका दिल हमेशा अपने जन्मस्थान आगरा में ही बसता रहा.
17 फरवरी 1935 को आगरा में जन्में रवि टंडन के पिता अमरनाथ टंडन जिला जज थे. परिवार पढ़ा-लिखा और अनुशासनप्रिय था, इसलिए घर वालों की इच्छा थी कि वह डॉक्टर बनें. उन्होंने आगरा कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी भी की, लेकिन उनके भीतर का कलाकार कुछ और ही चाहता था.
फिल्मों की खातिर छोड़ दी थी पढ़ाई
उन्हें बचपन से ही फिल्मों और कहानी कहने की दुनिया आकर्षित करती थी. जब वह प्री-मेडिकल टेस्ट में सफल नहीं हो पाए, तो उन्होंने इसे अपनी किस्मत का संकेत माना और 1958 में सपनों को सच करने के लिए मुंबई का रुख कर लिया. मुंबई पहुंचने के बाद उनका संघर्ष शुरू हुआ. शुरुआती दिनों में उन्हें छोटे-छोटे रोल मिले और कभी-कभी जूनियर आर्टिस्ट के रूप में भी काम करना पड़ा.
रवि टंडन को मिलते थे 2 रुपए
उन दिनों मेहनताना इतना कम था कि कई बार दिनभर की मेहनत के बदले केवल दो रुपए मिलते थे. 1960 की फिल्म लव इन शिमला में सहायक और जूनियर कलाकार के रूप में काम करते हुए उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियां करीब से समझीं. यही अनुभव आगे चलकर उनके निर्देशन करियर की मजबूत नींव बना.
मनोज कुमार ने बदली किस्मत
उनकी लगन और मेहनत को पहचान मिली अभिनेता-निर्देशक मनोज कुमार की फिल्म बलिदान (1971) के दौरान, जहां उन्हें निर्देशन का अवसर मिला. इस मौके ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. इसके बाद उन्होंने कई सफल फिल्मों का निर्देशन किया और धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा के भरोसेमंद निर्देशकों में गिने जाने लगे.
रवि टंडन की सबसे बड़ी खासियत उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी. उन्होंने एक ही शैली तक खुद को सीमित नहीं रखा. थ्रिलर, रोमांस, म्यूजिकल और पारिवारिक ड्रामा हर तरह की फिल्मों में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी. अनहोनी, मजबूर, जवाब, खुद्दार और नजराना जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान मजबूत की. खास तौर पर ‘खेल खेल में’ का युवा रोमांस, आर.डी. बर्मन के संगीत और उस दौर की नई ऊर्जा को दर्शकों तक पहुंचाकर इसे यादगार बना दिया.
उनके योगदान को कई मंचों पर सम्मानित किया गया. 2015 में आगरा में उन्हें “प्राइड ऑफ आगरा” अवॉर्ड मिला. अपने शहर में सम्मान पाकर वह भावुक हो गए थे और कहा था कि मुंबई ने उन्हें पहचान दी, लेकिन उनके सपनों की जड़ें हमेशा आगरा में ही रहीं.
11 फरवरी 2022 को 86 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया. उनके जाने से हिंदी सिनेमा ने एक संवेदनशील निर्देशक और सादगी से भरे इंसान को खो दिया. हालांकि, उनकी फिल्में आज भी उनकी रचनात्मकता और संघर्ष भरे सफर की जीवित यादें बनकर दर्शकों के दिलों में बसती हैं.
रवि टंडन ने अपनी ही तरह अपनी बेटी रवीना टंडन को फिल्मों की दुनिया में एंट्री दिलाई और रवीना को 90 के दशक की टॉप एक्ट्रेस बनाया. फिल्ममेकर की बेटी रवीना टंडन आज भी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं.