सपा-बसपा गठबंधन| अखिलेश यादव| Akhilesh Yadav| SP-BSP Alliance
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों हवाएं तेजी से बदल रही हैं. होली के गुलाल से पहले लखनऊ के सियासी गलियारों में ‘दोस्ती’ के नए रंग देखने को मिल सकते हैं. दरअसल, समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने रविवार को एक ऐसा बयान दिया है, जिसने प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘सपा-बसपा गठबंधन’ की अटकलों को हवा दे दी है. अखिलेश यादव ने न केवल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ रिश्तों में गहराई आने की बात कही, बल्कि मायावती के कभी सबसे खास रहे नसीरुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल कराकर अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं.
राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘PDA प्रेम प्रसार समारोह’ के दौरान अखिलेश यादव काफी आत्मविश्वास में नजर आए. इस कार्यक्रम में लगभग 15,000 से अधिक लोगों ने विभिन्न दलों को छोड़कर सपा का दामन थामा. जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश ने कहा, ‘समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं और आने वाले समय में ये और भी गहरे होंगे.’
अखिलेश ने अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को राज्य की प्रगति की नींव बताया. उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता ही सकारात्मक राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि है. दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश अब इस जुड़ाव को केवल एक चुनावी समझौते के तौर पर नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक आंदोलन के रूप में पेश कर रहे हैं.
सपा में नसीरुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री के क्या है मायने?
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी सुर्खी पूर्व मंत्री नसीरुद्दीन सिद्दीकी का सपा में शामिल होना रही. सिद्दीकी कभी मायावती के दाहिने हाथ माने जाते थे और बसपा सरकार में चार बार कद्दावर मंत्री रह चुके हैं. 2017 में बसपा से निष्कासित होने के बाद उनका सपा में आना एक बड़े रद्द-ओ-बदल (परिवर्तन या बदलाव) का संकेत है. उनके साथ अपना दल (सोनेलाल) के पूर्व विधायक राजकुमार पाल ने भी साइकिल की सवारी शुरू की है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्दीकी जैसे अनुभवी नेता को साथ लेकर अखिलेश सीधे तौर पर बसपा के कैडर वोट बैंक में सेंध लगाने और मायावती को एक ‘सॉफ्ट सिग्नल’ देने की कोशिश कर रहे हैं.
क्या मिट पाएंगी ये पुरानी दूरियां
सपा और बसपा के रिश्तों का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. अखिलेश यादव ने डॉ. बीआर अंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया के साझा संघर्षों को याद करते हुए कहा कि परिस्थितियों ने उन दिग्गजों को पर्याप्त समय नहीं दिया, लेकिन अब समय आ गया है कि उस संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए.
याद दिला दें कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाकर भाजपा के विजय रथ को रोका था, लेकिन 1995 के कुख्यात ‘गेस्ट हाउस कांड’ ने ऐसी कड़वाहट पैदा की कि दोनों दल दो दशक तक एक-दूसरे के दुश्मन बने रहे. 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘बुआ-बबुआ’ की जोड़ी फिर साथ आई, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक न होने पर मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया था. अब सवाल यही है कि क्या 2027 की बिसात पर ये पुरानी दूरियां मिट पाएंगी?
अतीत में सपा सरकार के दौरान यादव वर्चस्व की शिकायतों के कारण दलित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अखिलेश से छिटका गया था. लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में फैजाबाद (अयोध्या) जैसी सामान्य सीट से दलित नेता अवधेश प्रसाद की जीत ने सपा का हौसला बढ़ाया है. अखिलेश अब खुद पर लगे ‘दलित विरोधी’ टैग को हटाने के लिए आक्रामक हैं.
योगी सरकार पर प्रहार और शंकराचार्य विवाद
अखिलेश यादव ने इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी परोक्ष रूप से हमला बोला. उन्होंने पूज्य शंकराचार्य के अपमान का मुद्दा उठाते हुए कहा, ‘हम शंकराचार्य जी के साथ हैं.’ उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार परंपराओं पर सवाल उठा रही है और दूसरों से ‘सर्टिफिकेट’ मांग रही है. गौरतलब है कि हाल ही में सीएम योगी ने विधानसभा में कहा था कि हर कोई शंकराचार्य की उपाधि का उपयोग नहीं कर सकता, जिस पर अब विपक्ष ने घेराबंदी शुरू कर दी है.
क्या फिर सजेगी गठबंधन की बिसात?
अखिलेश यादव के बदलते सुर और बसपा के पुराने दिग्गजों का सपा में स्वागत यह बताता है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा पक रहा है. यदि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ सफल होती है, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है.