Shivling Jal Chadhane Ki Sahi Disha Kya Hai। शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय सही दिशा क्या होनी चाहिए

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Jal Chadhane Ke Rule: सुबह का समय, मंदिर की घंटियां, और हाथ में तांबे का लोटा. कई लोग रोज़ या खास दिनों में भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जल चढ़ाते वक्त हम किस दिशा में बैठते हैं, यह कितना मायने रखता है? अक्सर लोग शिवलिंग के आसपास कहीं भी बैठकर पूजा कर लेते हैं. कामना पूरी हो जाए, बस यही भाव रहता है. पर शास्त्रों और परंपरा में दिशा का अपना महत्व बताया गया है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

दिशा का खेल: उत्तर और दक्षिण क्यों अहम? आम तौर पर शिवलिंग के आसपास कहीं भी बैठकर पूजा की जा सकती है. बस एक जगह से बचने की सलाह दी जाती है-जहां से शिवलिंग का जल बहकर बाहर आता है, यानी जलाधारी का निकास स्थान. उस स्थान को पार करना या उसके सामने बैठना उचित नहीं माना जाता.

विशेष कामना हो तो क्या करें? अगर मन में कोई खास मनोकामना हो-जैसे नौकरी, विवाह, संतान या किसी बीमारी से मुक्ति-तो पूजा की दिशा पर खास ध्यान देने की सलाह दी जाती है. परंपरा कहती है कि जल चढ़ाते समय भक्त को दक्षिण दिशा में बैठना चाहिए और मुख उत्तर की ओर होना चाहिए. यहां समझने वाली बात है कि शिवलिंग की जलाधारी अक्सर उत्तर की ओर रहती है. यानी जो जल चढ़ाया जाता है, वह उत्तर दिशा की ओर बहता है. ऐसे में भक्त दक्षिण में बैठकर उत्तर की ओर मुख करके जल अर्पित करें, तो यह शुभ माना जाता है. कई लोग बताते हैं कि जब बार-बार कोशिश के बाद भी काम नहीं बनता, तब इस विधि से पूजा करने पर रास्ते खुलने लगते हैं. यह आस्था का विषय है, लेकिन सदियों से चली आ रही मान्यता यूं ही नहीं बनी.

घर में शिवलिंग हो तो कैसे रखें दिशा? छोटे शिवलिंग की सही दिशा आजकल कई घरों में छोटा सा शिवलिंग रखा जाता है. कुछ लोग उसे थाली में रखकर स्नान कराते हैं. ऐसे में भी दिशा का ध्यान जरूरी बताया गया है. भले आपका घर का मंदिर पश्चिम दिशा में बना हो और आप पूर्व-पश्चिम की ओर बैठकर पूजा करते हों, लेकिन शिवलिंग की जलाधारी उत्तर की ओर होनी चाहिए. यानी अगर आप थाली में शिवलिंग रख रहे हैं, तो उसे इस तरह रखें कि उसका जल उत्तर दिशा की ओर बहे. यह व्यवस्था छोटी लगे, पर परंपरा में इसे खास माना गया है.

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स्नान का जल कहां विसर्जित करें? शिवलिंग को स्नान कराने के बाद जो जल बचता है, उसे लोग पेड़-पौधों में डालते हैं. यह बहुत अच्छा माना जाता है. लेकिन यहां भी एक छोटी सी बात ध्यान रखने की कही जाती है-जब आप वह जल वृक्ष में डालें, तो आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो. भले पेड़ कहीं भी हो, अगर आप उत्तर की ओर देखकर जल विसर्जन करते हैं, तो इसे शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे जीवन की अटकी राहें खुलती हैं और मनोकामनाएं पूरी होने का रास्ता बनता है.

क्यों मानी जाती है उत्तर दिशा शुभ? भारतीय परंपरा में उत्तर दिशा को देवताओं की दिशा कहा गया है. कई लोग घर या दुकान लेते समय भी दिशा का खास ध्यान रखते हैं. वास्तु की बात हो या मंदिर की रचना, उत्तर और पूर्व दिशा को अक्सर शुभ माना जाता है. भगवान शिव का जल उत्तर की ओर बहना भी इसी मान्यता से जुड़ा है. दक्षिण दिशा में बैठकर उत्तर की ओर मुख करना, यानी ऊर्जा के प्रवाह की ओर खुद को जोड़ना-इसे आध्यात्मिक नजरिए से देखा जाता है. हालांकि, यह भी सच है कि पूजा में सबसे बड़ी चीज भाव है. अगर भाव सच्चा है, तो भगवान कहीं भी सुने जाते हैं. लेकिन जब परंपरा कोई खास तरीका बताती है, तो उसे समझकर अपनाने में हर्ज नहीं.

क्या हर बार यही नियम जरूरी है? नहीं. रोजमर्रा की साधारण पूजा में आप शिवलिंग के आसपास कहीं भी बैठ सकते हैं, बस जल निकास स्थान से बचें. लेकिन अगर आप खास संकल्प लेकर पूजा कर रहे हैं, या लंबे समय से किसी परेशानी से जूझ रहे हैं, तो दिशा का यह नियम अपनाया जा सकता है. कई बुजुर्ग बताते हैं कि जब उन्होंने विधि से, सही दिशा में बैठकर जल चढ़ाया, तो मन को अलग ही शांति मिली. कभी-कभी बदलाव बाहर नहीं, अंदर से शुरू होता है.

भगवान शिव को जल चढ़ाना सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि विश्वास और अनुशासन का मेल है. दिशा का ध्यान रखना कोई जटिल नियम नहीं, बस एक छोटी सी सजगता है. अगर आप अगली बार जल चढ़ाने जाएं, तो एक बार यह जरूर देख लें-आपका मुख किस दिशा में है. शायद यही छोटी सी बात आपके जीवन में बड़ा फर्क ला दे.

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