Brahma Chellaney on Moran airstrip: ‘बदल गया एयरपावर डॉक्ट्रीन’, चीन बॉर्डर के पास हाईवे पर उतरा राफेल, ब्रह्म चेलानी ने कहा- ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

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Brahma Chellaney on Moran airstrip: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के मोरान में राष्ट्रीय राजमार्ग पर अपने विमान की हाई-प्रोफाइल लैंडिंग कराकर भारत की एयरपावर डॉक्ट्रिन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है. यह मोरान बाईपास पर उत्तर-पूर्व का पहला इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) है, जो देशभर में बनाए जा रहे 28 ऐसे ही सुविधाओं में से एक है. रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने इसे चीन बॉर्डर के निकट एक रणनीतिक संदेश बताया और कहा कि यह ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख का नतीजा है.

मोरान बाईपास पर 4.2 किलोमीटर लंबी इस मजबूत सड़क को भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ मिलकर तैयार किया गया है. यह सुविधा 74 टन तक के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 40 टन तक के फाइटर जेट्स को हैंडल कर सकती है. प्रधानमंत्री मोदी ने C-130J सुपर हरक्यूलिस एयरक्राफ्ट से यहां लैंडिंग की, जो इस हाईवे-कम-रनवे की क्षमता का सीधा प्रदर्शन था. लैंडिंग के बाद राफेल, सुखोई Su-30MKI और अन्य फाइटर जेट्स ने यहां से टेकऑफ, लैंडिंग और फ्लाई-पास्ट का शानदार एयर शो पेश किया, जिससे इस सुविधा की ऑपरेशनल रेडीनेस साफ झलकी.

ब्रह्म चेलानी आगे लिखते हैं- यह ELF भारत की एयरपावर डॉक्ट्रिन में एक शांत लेकिन गहरा बदलाव दर्शाता है – असली ऑपरेशनल रिडंडेंसी का निर्माण. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर कोई दुश्मन प्रमुख एयरबेस पर हमला करने में सफल हो जाए, तब भी भारतीय वायु सेना लड़ाई जारी रख सके. हवाई युद्ध का बुनियादी सिद्धांत यही है कि युद्ध की शुरुआत दुश्मन की एयर डिफेंस और एयरफील्ड्स को निष्क्रिय करके होती है.

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र

चेलानी ने अपनी टिप्पणी में ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र किया, जहां राजनीतिक निर्देश के तहत वायुसेना को केवल आतंकी कैंपों पर हमला करने की अनुमति थी. इससे एयर डिफेंस और बेस पर हमले नहीं हो सके, जिसके नतीजे में शुरुआती दिनों में भारत को कुछ नुकसान हुआ. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने बाद में इसे ‘टैक्टिकल मिस्टेक’ करार दिया और तीसरे दिन जब सरकार ने दुश्मन के एयर डिफेंस और बेस पर हमले की मंजूरी दी, तब स्थिति सुधरी.

मोरान जैसी ‘रोड-रनवे’ नेटवर्क इसी गलती से सीख लेकर बनाया जा रहा है, ताकि भारत कभी ऐसी स्थिति में न फंसे. ये ELF बॉर्डर, तट और संवेदनशील इलाकों के पास रणनीतिक रूप से स्थित हैं. इनमें मजबूत कंक्रीट है जो फाइटर जेट के आफ्टरबर्नर की गर्मी और भारी विमानों के प्रभाव को झेल सकता है. बेसिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल, पार्किंग एप्रॉन और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर से ये ऑस्टेयर लेकिन पूरी तरह काम करने वाले एयरस्ट्रिप बन जाते हैं. युद्ध में इनका महत्व बहुत अधिक है. ये एयरफोर्स की एसेट्स को विस्तार देने की फ्लेक्सिबिलिटी देते हैं और प्राइमरी बेस क्षतिग्रस्त होने पर भी ऑपरेशंस जारी रखने की क्षमता प्रदान करते हैं.

मोरान स्ट्रिप डायरेक्ट बैकअप

मोरान स्ट्रिप चाबुआ एयर फोर्स स्टेशन और डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट का डायरेक्ट बैकअप बन सकती है. हाईवे स्ट्रिप्स को स्थायी रूप से निष्क्रिय करना मुश्किल है और इन्हें जल्दी रिपेयर भी किया जा सकता है. ये सुविधाएं रैपिड मोबिलाइजेशन में भी मदद करती हैं. C-130J जैसे विमान लैंड कर इन्फैंट्री प्लाटून या लाइट आर्मर्ड व्हीकल उतार सकते हैं और कुछ मिनटों में उड़ान भर सकते हैं, जिससे हाईवे फॉरवर्ड स्टेजिंग ग्राउंड बन जाता है. एक्टिवेशन पर मोबाइल रडार, कम्युनिकेशंस सिस्टम यहां लगाए जा सकते हैं, जो टेम्परेरी कमांड-एंड-कंट्रोल नोड्स के रूप में काम करते हैं और सर्विलांस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को सपोर्ट करते हैं.

इसके अलावा असम जैसे आपदा-प्रवण इलाकों में ELF का महत्व और बढ़ जाता है. जब सामान्य एयरपोर्ट बाढ़ या अन्य कारणों से बंद हो जाते हैं, तब ये सुविधाएं रिलीफ सप्लाई और रेस्क्यू टीम्स की तेज डिलीवरी सुनिश्चित करती हैं. कुल मिलाकर ये 28 इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटीज भारत की वारफाइटिंग पोजिशन में रेजिलिएंस बनाने का हिस्सा हैं.

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