Narmada River Story Why Called Kumari River। मां नर्मदा को कुंवारी नदी क्यों कहा जाता है और वह पश्चिम दिशा में क्यों बहती हैं

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Narmada River Story: भारत की पवित्र नदियों का जिक्र होते ही गंगा और यमुना का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन एक नदी ऐसी भी है जिसे लोग सिर्फ जलधारा नहीं, देवी का रूप मानते हैं-मां नर्मदा. कहा जाता है कि नर्मदा के किनारे मिलने वाला हर पत्थर शिवलिंग के समान पूजनीय है. इतना ही नहीं, उन्हें “कुंवारी नदी” भी कहा जाता है. सवाल उठता है, आखिर क्यों? क्या यह सिर्फ आस्था है या इसके पीछे कोई कथा भी छिपी है? दिलचस्प बात यह है कि नर्मदा भारत की उन गिनी-चुनी नदियों में है जो पश्चिम की ओर बहती हैं. आमतौर पर नदियां पूर्व दिशा की तरफ जाती हैं, फिर नर्मदा ने अलग राह क्यों चुनी? इस रहस्य के पीछे एक पौराणिक कहानी है, जो प्रेम, विश्वास और त्याग से जुड़ी है. यह कथा आज भी मध्य भारत के गांवों में उतनी ही श्रद्धा से सुनाई जाती है, जितनी सदियों पहले.

मैकल पर्वत से हुआ अवतरण
पौराणिक मान्यता के मुताबिक, मैकल पर्वत पर भगवान शिव गहन तप में लीन थे. उसी दौरान उनके पसीने की एक बूंद से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई. वह भी शिव के सामने बैठकर तप करने लगी. जब शिव का ध्यान टूटा तो उन्होंने उस कन्या को देखा और प्रसन्न होकर उसका नाम रखा-नर्मदा, यानी सुख देने वाली.

अमरता का वरदान और विशेष महिमा
शिव ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि प्रलय में भी उनका नाश नहीं होगा. उनके तट पर मिलने वाला पत्थर नर्मदेश्वर शिवलिंग कहलाएगा और बिना प्राण प्रतिष्ठा के भी पूजनीय होगा. यही वजह है कि आज भी लाखों लोग नर्मदा परिक्रमा को जीवन का बड़ा आध्यात्मिक अनुभव मानते हैं. गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते हैं-“गंगा में स्नान से जो फल मिलता है, वह नर्मदा के दर्शन से मिल जाता है.”

राजकुमारी नर्मदा और अधूरी शादी
समय बीता और नर्मदा एक राजकुमारी के रूप में जानी जाने लगीं. उनके पिता ने उनके विवाह के लिए शर्त रखी-जो दुर्लभ गुलाब कावली का फूल लाएगा, वही उनका वर होगा. कई राजकुमार आए, पर सफल नहीं हुए. आखिरकार सोनभद्र नाम के राजकुमार ने वह फूल लाकर शर्त पूरी कर दी.राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई. लेकिन कहानी यहीं मोड़ लेती है.

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दासी जोहिला और गलतफहमी
नर्मदा ने विवाह से पहले सोनभद्र को संदेश भेजने के लिए अपनी दासी जोहिला को भेजा. जोहिला ने नर्मदा के वस्त्र और आभूषण पहन लिए. जब वह सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार उसे ही नर्मदा समझ बैठे. जोहिला भी इस भ्रम को तोड़ न सकी. उधर जब नर्मदा खुद वहां पहुंचीं तो उन्होंने दोनों को साथ देखा. यह दृश्य उनके लिए किसी आघात से कम नहीं था. उन्होंने बिना कुछ कहे वहां से मुड़ने का फैसला किया. कहा जाता है कि उसी पल उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लिया.

इसलिए पश्चिम की ओर बहती हैं नर्मदा
जहां ज्यादातर नदियां पूर्व की ओर जाती हैं, वहीं नर्मदा ने पश्चिम का रुख किया. लोककथाओं में इसे उनके मन के दर्द से जोड़ा जाता है. अपमान और विश्वासघात के बाद उन्होंने नई दिशा चुनी. पहाड़ों और जंगलों को चीरते हुए उन्होंने अपना मार्ग खुद बनाया और आखिरकार अरब सागर में जा मिलीं.
आज भी मध्य प्रदेश और गुजरात के कई इलाकों में लोग मानते हैं कि नर्मदा की धारा में एक अलग ही शांति है. परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु बताते हैं कि यह यात्रा सिर्फ पैरों की नहीं, मन की भी होती है.

गंगा और नर्मदा की कथा
एक और कथा प्रचलित है. कहा जाता है कि एक बार गंगा ने शिव से कहा कि पृथ्वी के पापियों के स्नान से उनका जल दूषित हो गया है. तब शिव ने मुस्कुराकर कहा-“नर्मदा में स्नान करो, तुम्हारा कष्ट दूर हो जाएगा.” इसीलिए कुछ विशेष अवसरों पर गंगा के नर्मदा तट पर आने की मान्यता भी है.

आस्था, भूगोल और आज की नर्मदा
अगर भूगोल की नजर से देखें तो नर्मदा मध्य भारत की जीवनरेखा है. अमरकंटक से निकलकर यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से गुजरती हुई अरब सागर में मिलती है. लेकिन आस्था में डूबी नजर से देखें तो यह सिर्फ नदी नहीं, एक भाव है. शायद इसी वजह से नर्मदा को “मां” कहकर पुकारा जाता है.

नर्मदा की कथा हमें याद दिलाती है कि लोककथाएं सिर्फ कहानी नहीं होतीं, वे समाज की भावनाओं और विश्वासों का आईना भी होती हैं.

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