Father Son Hindu Rules। पिता के रहते बेटे भूलकर भी न करें 5 काम

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Hindu Rules: सुबह घर से निकलते वक्त कई लोग आदत से पिता के पैर छूते हैं, और ये सिर्फ परंपरा नहीं, एक भाव भी है. हमारे समाज में पिता को छाया, सहारा और अनुशासन का आधार माना गया है. खासकर हिंदू मान्यताओं में पिता को देवता जैसा दर्जा दिया गया है. ज्योतिष की बात करें तो कुंडली में सूर्य को पिता का कारक माना जाता है. यानी पिता से रिश्ता जितना संतुलित, जीवन की दिशा उतनी साफ. पुराने ग्रंथों और लोक परंपराओं में बेटों के लिए कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं, जिनका मकसद पिता का सम्मान बनाए रखना है. माना जाता है कि इन बातों को नजरअंदाज करने से घर के माहौल, किस्मत और आत्मविश्वास तीनों पर असर पड़ सकता है. आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

पिता का स्थान क्यों माना जाता है सबसे ऊंचा घर के बड़े अक्सर कहते हैं कि “बाप जिंदा है तो छत सलामत है.” ये सिर्फ कहावत नहीं, सोच है. परिवार में फैसले लेने, जिम्मेदारी उठाने और दिशा देने का रोल परंपरागत रूप से पिता से जोड़ा गया. ज्योतिष मान्यता जोड़ें तो सूर्य नेतृत्व, मान-सम्मान और सरकारी कामों का कारक है. इसलिए पिता के साथ टकराव को कई लोग जीवन की रुकावटों से जोड़कर देखते हैं.

वो 5 काम जो बेटे को नहीं करने चाहिए 1. तर्पण या पिंडदान खुद से करना मान्यता है कि जब तक पिता जीवित हों, पूर्वजों से जुड़े बड़े कर्मकांड का पहला अधिकार उन्हीं का होता है. बेटा अगर बिना वजह खुद आगे बढ़कर ये कर्म करे, तो इसे परंपरा के खिलाफ माना जाता है. गांवों में आज भी पंडित पहले घर के मुखिया को आगे बुलाते हैं.

2. पिता का रोल अपने हाथ में लेना घर की मुख्य पूजा, बड़ा हवन या कुल पूजा-इनमें पिता को आगे रहने दिया जाता है. कई घरों में देखा जाता है कि जवान बेटे जोश में आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन बुजुर्ग धीरे से रोक देते हैं-“अभी बाप बैठा है.” इसका मकसद अधिकार नहीं, सम्मान का संतुलन है.

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3. पूरी मूंछ साफ कर देना (पुरानी परंपरा) आज के समय में ये नियम हर जगह नहीं माना जाता, लेकिन पहले कई इलाकों में ये धारणा थी कि पिता के रहते बेटा मूंछ पूरी तरह साफ नहीं करता. इसे पुरुष गरिमा और वंश परंपरा से जोड़ा जाता था. बुजुर्ग इसे प्रतीक मानते थे, सख्त नियम नहीं.

4. हर काम में अपना नाम आगे रखना दान, सामाजिक काम या मंच पर नाम लिखवाना-ऐसे मौकों पर पहले पिता का नाम लेना शिष्टाचार माना गया. छोटे शहरों में आज भी शादी के कार्ड पर “फलाँ के पुत्र” लिखने की परंपरा इसी सोच से जुड़ी है. ये अहंकार कम करने की सीख भी है.

5. पिता की बात को सार्वजनिक रूप से काटना ये धार्मिक नियम से ज्यादा व्यवहार की बात है. माना जाता है कि पिता की बात को सबके सामने काटना या उनकी छवि कम करना परिवार की एकता तोड़ता है. मतभेद हो सकते हैं, पर उन्हें निजी बातचीत में सुलझाना बेहतर समझा जाता है.

क्या सच में किस्मत पर असर पड़ता है? आधुनिक नजरिए से देखें तो ये बातें ज्योतिष से ज्यादा मनोविज्ञान से जुड़ी लगती हैं. पिता के साथ अच्छा रिश्ता हो तो आत्मविश्वास मजबूत रहता है. कई लोग बताते हैं कि घर का आशीर्वाद साथ हो तो फैसले लेने में डर कम लगता है. यानी असर ग्रहों से ज्यादा सोच पर पड़ता है.

बदलते समय में इन नियमों को कैसे समझें हर परंपरा का मूल मकसद परिवार में सम्मान और संतुलन बनाए रखना था. आज के दौर में अंधविश्वास की तरह नहीं, बल्कि व्यवहार की समझ के रूप में इन बातों को देखा जा सकता है. अगर नियम के पीछे की भावना-सम्मान, विनम्रता, रिश्तों की कद्र-समझ आ जाए, तो उसका असली फायदा मिलता है. पिता के रहते इन बातों का ध्यान रखना सिर्फ धार्मिक डर नहीं, रिश्तों की गरिमा से जुड़ा पहलू है. सम्मान बना रहे, संवाद बना रहे-यही असली सीख मानी जाती है.

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पिता के रहते बेटों को ये 5 काम नहीं करने चाहिए, शास्त्रों में बताए गए खास नियम

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