Explainer: कैसे 40 देशों से तेल मंगाता है भारत, 75 दिनों का रिजर्व कहां होता है स्टोर

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भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि भारत के पास इतनी तेल स्टोरेज क्षमता है कि इससे 75 दिनों के तेल का काम चल सकता है. भारत की एक दिन की तेल की खपत लगभग 5.5 से 5.6 मिलियन बैरल की है. इसका मतलब ये हुआ कि भारत के पास तेल स्टोरेज की जबरदस्त क्षमता है. कहा जाता है कि भारत दुनिया के उन देशों में भी है, जो तेल स्टोरेज में काफी आगे है. पिछले एक दशक में भारत के तेल खरीदने और स्टोरेज करने की क्षमता में काफी बदलाव हुआ है.

तेल खपत के लिहाज से भारत दुनिया का तीसरे नंबर का देश है. हालांकि वह अपने कुल इस्तेमाल का केवल 12-13 फीसदी ही खुद उत्पादन कर पाता है. बाकि जरूरत का तेल उसको विदेशों से मंगाना पड़ता है. इसी आयात की तस्वीर में बहुत बदलाव पिछले कुछ सालों में हुआ है.

पहले भारत के तीन बड़े तेल निर्यातक इराक, सऊदी अरब और ईरान थे लेकिन इसमें बदलाव हुआ है. कुछ समय पहले तक भारत रूस से अपनी खपत का 30 फीसदी क्रूड आयल आयात करने लगा था लेकिन दिसंबर 2025 के आंकड़े कहते हैं कि इसमें कमी आई है. अब भारत दुनियाभर में नए वो ठिकाने देख रहा है, जहां से तेल खरीद सकता है.

भारत पहले कितने देशों से तेल खरीदता था, अब क्या स्थिति है?

– भारत पहले 27 देशों से तेल खरीदता था लेकिन अब उन देशों की स्थिति बढ़कर 40 पहुंच चुकी है. फरवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की तेल आयात रणनीति में बड़े बदलाव आए हैं. पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा हालांकि हाल के महीनों में अमेरिकी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण इसमें कुछ उतार-चढ़ाव आया. इराक दूसरे नंबर पर है. सऊदी अरब तीसरे स्थान पर है. यूएई चौथे स्थान पर है. भारत ने अमेरिका से भी तेल मंगाना शुरू किया है.

किन नए देशों या ठिकानों से भारत तेल खरीद सकता है?

– वेनेजुएला से भारत भारी कच्चा तेल खरीदना शुरू कर सकता है. वहां से तेल खरीद बढ़ने की पूरी उम्मीद है. गुयाना दुनिया का सबसे तेजी से उभरता हुआ तेल उत्पादक है. गुयाना ने भारतीय कंपनियों को 2026 के अपने ऑफशोर ऑयल ब्लॉक्स की नीलामी में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. भारत यहां केवल तेल खरीदेगा ही नहीं, बल्कि तेल खोज में निवेश कर खुद का तेल भी पैदा कर सकता है. भारत अब नाइजीरिया और अंगोला के अलावा अन्य अफ्रीकी देशों की ओर भी देख रहा है. इसमें सूरीनाम, नामीबिया शामिल हैं.

भारत के पास कुछ कितने तेल का रिजर्व है?

– भारत में स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) के तौर पर भूमिगत क्रूड ऑयल स्टोरेज में लगभग 5.33 मिलियन मैट्रिक टन (MMT) क्षमता है. इसका सीधा मतलब है कि यह पेट्रोल, डीज़ल आदि बनाने के लिए देश की डिमांड का करीब 9.5 दिनों का कच्चा तेल संभाल सकता है जब केवल SPR से निकाला जाए. हालांकि तेल विपणन कंपनियों के पास भी रिफाइनरियों और टर्मिनलों में भंडार हैं जो लगभग 64.5 दिनों तक की पेट्रोल-डीज़ल की आपूर्ति संभाल सकते हैं.
इन दोनों को जोड़कर भारत के पास कुल मिलाकर करीब 74–75 दिनों का तेल स्टॉक मौजूद माना जाता है. मतलब अगर विदेशी तेल आपूर्ति अचानक बंद भी हो जाए, तो लगभग 2.5 महीने से ज़्यादा तक देश खुद का स्टॉक इस्तेमाल कर सकता है.

ये रिजर्व तेल कहां रखा जाता है?

भारतीय स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) की तीन मुख्य भंडारण साइटें विशाखापट्टनम, मंगलूरु और पादुर उडुपी में हैं.
विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश). क्षमता – 1.33 मीलियन मैट्रिक टन
मंगलूरु (कर्नाटक). क्षमता – 1.5 मिलियन मैट्रिक टन.
पादुर उडुपी (कर्नाटक) . क्षमता – 2.5 MMT
ये भंडार आमतौर पर जमीन के नीचे सॉल्ट कैवर्न (salt caverns) में रखे जाते हैं, यह सुरक्षित और लंबे समय तक तेल को बिना खराब हुए स्टोर करने के लिए अच्छे माने जाते हैं. जमीन के नीचे नमक की विशाल चट्टानें या परतें होती हैं. इन्हें भंडार गृह बनाने के लिए ‘सॉल्यूशन माइनिंग’ की प्रक्रिया अपनाई जाती है.
इसके अलावा तेल कंपनियों के रिफ़ाइनरियों और टर्मिनलों में भी बहुत बड़ा भंडार मौजूद रहता है, जो पेट्रोल, डीज़ल, विमान ईंधन आदि तैयार करके स्टोर होता है.

ये रिजर्व स्टॉक इतना ज्यादा क्यों जरूरी है?

– ये स्टॉक इसलिए जरूरी है, क्योंकि वैश्विक सप्लाई डिस्टर्बेंस के समय काम आता है. अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में उछाल के समय काम आता है. भारत अपने पास तेल स्टॉक रखता है ताकि भोजन, यात्रा और उद्योग प्रभावित न हों.

अब आगे क्या योजना है, क्या ये स्टाक और बढ़ाया भी जाएगा?

– भारत इस क्षमता को बढ़ाने का भी प्रयास कर रहा है. जैसे ओडिसा के चांदीखोल में नया रिज़र्व बनाने की योजना है. कई और साइट्स पर विस्तार हो सकता है. ताकि भविष्य में 90 दिनों या उससे अधिक दिन का तेल रिज़र्व बनाए जा सके.

भारत तेल कैसे मंगाता है?

– कच्चा तेल खरीदने का प्रोसेस भारत की सरकारी और प्राइवेट कपनियां करती हैं. जिसमें इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और रिलायंस शामिल हैं. ये वैश्विक तेल उत्पादकों से खरीद समझौते करती हैं. तेल आम तौर पर समुद्री टैंकरों में भेजा जाता है. ये भारतीय बंदरगाहों जैसे मुम्बई, जामनगर, विशाखापट्टनम आदि पर उतरता है.
इनका भुगतान डॉलर या रुपए में होता है. कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार पर आधारित होती हैं. डॉलर/₹ विनिमय और वैश्विक दरों का असर पेट्रोल/डीज़ल की कीमतों पर पड़ता है.

भारत कच्चा तेल मंगाकर खुद रिफाइन करता है?

– हां, बिल्कुल ऐसा ही है. भारत की तेल रिफाइन क्षमता दुनिया के शीर्ष पांच देशों में गिनी जाती है.भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है, जो अमेरिका, चीन और रूस के बाद आता है. भारत में कुल 23 विश्वस्तरीय तेल रिफाइनरियां हैं, जिनमें 19 सार्वजनिक क्षेत्र, 3 निजी क्षेत्र और 1 संयुक्त उद्यम शामिल हैं. सबसे बड़ी जामनगर रिफाइनरी (रिलायंस) दुनिया की नंबर एक है. आयातित तेल को रिफाइनरियों में शुद्ध पेट्रोल, डीज़ल, विमान ईंधन, केरोसीन आदि में बदला जाता है.

किस देश का तेल महंगा – सस्ता पड़ता है?

– अमेरिका और यूरोपीय तेल आम तौर पर महंगा होता है क्योंकि वहां के उत्पादन और शिपिंग लागत अपेक्षाकृत अधिक होती है. जैसे अमेरिका से तेल खरीदते समय भारत को ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं. रूस, इराक, सऊदी अरब जैसे देशों से डिस्काउंटेड रेट पर तेल मिल सकता है. रुपए में भी विनिमय हो सकता है. रूस से भारत को पिछले कुछ वर्षों में सस्ती डील मिली है, इसलिए वह सबसे बड़ा स्रोत रहा है.

क्या तेल की गुणवत्ता भी अलग अलग होती है?

– हां. तेल की गुणवत्ता अलग-अलग होती है. कुछ में सल्फर कम होता है, ये हल्का, उच्च गुणवत्ता का माना जाता है. कुछ में सल्फर अधिक होता है, ये भारी और कम गुणवत्ता वाला होता है. ये क्वालिटी रिफाइनिंग प्रक्रिया और उत्पादन लागत दोनों को प्रभावित करती है.

जिन टैंकर्स से तेल आता है, वो किसके होते हैं?

– आज करीब 95% तेल टैंकर प्राइवेट मालिकों के होते हैं जिन्हें भारत किराए पर लेता है. अधिकांश टैंकर भारत के स्वामित्व में नहीं होते. ये विदेशी कंपनियों या शिपिंग फर्मों के टैंकर होते हैं. भारत के पास अपने कुछ टैंकर बेड़े हैं लेकिन सीमित.

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