Lunar New Year 2026 Buddhist Countries Festival Guide। लूनर न्यू ईयर क्या है, कब मनाया जाता है और किन बौद्ध देशों में इसका खास महत्व है

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Lunar New Year 2026 : सड़कों पर लाल रंग की लाइटें टंगी हैं, घरों के दरवाज़ों पर नए सजावटी पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं और बाज़ारों में मीठे पकवानों की खुशबू फैलने लगी है. एशिया के कई बौद्ध देशों में यह माहौल किसी एक शहर या देश तक सीमित नहीं है. यह संकेत है लूनर न्यू ईयर की तैयारियों का. नया साल, लेकिन हमारे कैलेंडर से थोड़ा अलग. चंद्रमा की चाल के हिसाब से शुरू होने वाला यह साल सिर्फ तारीख़ बदलने का नाम नहीं, बल्कि बीते समय को विदा करने और आगे के लिए नई उम्मीदें बांधने का मौका है. परिवार के साथ बैठकर खाना, बुज़ुर्गों का आशीर्वाद, मंदिरों में घंटियों की आवाज़ और आतिशबाज़ी इन सबके बीच लूनर न्यू ईयर एक सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है. बौद्ध देशों में इसका महत्व धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक तीनों स्तरों पर दिखता है. लेकिन यह त्योहार असल में है क्या, कब मनाया जाता है और किन-किन देशों में इसकी रौनक दिखाई देती है?

लूनर न्यू ईयर क्या होता है?
लूनर न्यू ईयर उस नए साल को कहा जाता है जो चंद्र कैलेंडर के आधार पर शुरू होता है. यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के 1 जनवरी से अलग होता है और आमतौर पर जनवरी के अंत से फरवरी के मध्य आता है. बौद्ध परंपराओं में चंद्रमा का खास महत्व रहा है, इसलिए कई देशों में धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव इसी कैलेंडर से जुड़े हैं.

यह त्योहार सिर्फ एक दिन का नहीं होता. कई जगहों पर यह एक हफ्ते से लेकर 15 दिनों तक चलता है. लोग पुराने साल की नकारात्मकता को पीछे छोड़कर नए साल में सौभाग्य, स्वास्थ्य और शांति की कामना करते हैं. घरों की सफाई, पुराने कर्ज़ चुकाना और रिश्तों में आई कड़वाहट को खत्म करना ये सब इसकी तैयारी का हिस्सा होते हैं.

कब मनाया जाता है लूनर न्यू ईयर?
लूनर न्यू ईयर की तारीख हर साल बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा के नए चक्र पर निर्भर करती है. आम तौर पर यह अमावस्या के दिन शुरू होता है. उदाहरण के तौर पर, कभी यह जनवरी के आख़िरी हफ्ते में आता है, तो कभी फरवरी की शुरुआत में.

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तारीख़ क्यों बदलती रहती है?
चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का. इसी अंतर की वजह से हर साल लूनर न्यू ईयर की तारीख आगे-पीछे होती रहती है. यही कारण है कि इसकी तैयारी हर बार अलग समय पर शुरू होती है, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं आती.

किन-किन बौद्ध देशों में मनाया जाता है?
लूनर न्यू ईयर को अक्सर लोग “चाइनीज़ न्यू ईयर” समझ लेते हैं, लेकिन हकीकत में यह कई बौद्ध देशों में अपने-अपने रंग में मनाया जाता है.

चीन और ताइवान
चीन में इसे स्प्रिंग फेस्टिवल कहा जाता है. ड्रैगन डांस, लाल लिफ़ाफ़ों में पैसे देना और बड़े पारिवारिक भोज इसकी पहचान हैं. बौद्ध मंदिरों में लोग धूप जलाकर शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं.

थाईलैंड
थाईलैंड में लूनर न्यू ईयर को बड़े शहरों में खास तौर पर चीनी-थाई समुदाय मनाता है. बैंकॉक की चाइनाटाउन सड़कों पर लाल-पीले रंग की सजावट, पारंपरिक संगीत और स्ट्रीट फूड का नज़ारा देखने लायक होता है. बौद्ध परंपरा के अनुसार लोग भिक्षुओं को दान भी देते हैं.

श्रीलंका
श्रीलंका में यह त्योहार सिंहली और तमिल समुदाय के नए साल से जुड़ा हुआ है, जो अप्रैल में आता है, लेकिन चंद्र कैलेंडर आधारित उत्सवों की परंपरा यहां भी गहरी है. मंदिरों में पूजा और घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं.

म्यांमार
म्यांमार में लूनर कैलेंडर धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा है. यहां नया साल पानी के त्योहार ‘थिंगयान’ से जुड़ा है. लोग एक-दूसरे पर पानी डालकर पुराने पाप धोने का प्रतीकात्मक संदेश देते हैं.

वियतनाम
वियतनाम में इसे ‘टेट’ कहा जाता है. यह साल का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है. लोग अपने पैतृक घर लौटते हैं, कब्रों पर जाकर पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं और बच्चों को लाल लिफ़ाफ़े दिए जाते हैं.

धार्मिक और सामाजिक महत्व
लूनर न्यू ईयर बौद्ध दर्शन में आत्मचिंतन का समय माना जाता है. लोग ध्यान, दान और करुणा के अभ्यास पर ध्यान देते हैं. कई जगहों पर मंदिरों में विशेष प्रवचन होते हैं, जहां जीवन की अनित्यता और संतुलन की बात की जाती है. सामाजिक स्तर पर यह त्योहार रिश्तों को फिर से जोड़ने का काम करता है. शहरों में काम करने वाले लोग गांव लौटते हैं. साथ बैठकर खाना, हंसी-मज़ाक और पुरानी यादों की बातें ये सब इस त्योहार की आत्मा हैं.

बदलते समय में लूनर न्यू ईयर
आज के डिजिटल दौर में भी लूनर न्यू ईयर की अहमियत कम नहीं हुई है. वीडियो कॉल पर शुभकामनाएं, ऑनलाइन गिफ्ट्स और सोशल मीडिया पर त्योहार की झलकियां सब कुछ बदल गया है, लेकिन भाव वही हैं. कई युवा इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का मौका मानते हैं. शहरों में पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है. आतिशबाज़ी कम करने और इको-फ्रेंडली सजावट अपनाने की कोशिशें दिखने लगी हैं. परंपरा और आधुनिकता का यह मेल लूनर न्यू ईयर को और भी प्रासंगिक बनाता है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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