Punjab Mail Train Accident-घना कोहरा, अंधेरी रात और स्टेशन पर खड़ी ट्रेन, दिल्ली के पास अचानक कैसे बिछ गईं लाशें, 42 साल पुरानी वो कहानी
नई दिल्ली. घने कोहरे के दौरान बहादुरगढ़ रेलवे स्टेशन पर पंजाब मेल खड़ी थी. ट्रेन में आम लोगों के साथ सैनिक भी सवार थे. ठंड और कोहरा की वजह से यात्रियों से विंडो बंद कर रखी थी. चूंकि स्टेशन था, इसलिए प्लेटफार्म पर थोड़ी बहुत चहल-पहल दिख रही थी. तभी अचानक जोर का झटका लगा, सोए हुए कुछ यात्री कोच पर और कुछ बाहर ट्रैक के आसपास गिरे. चारों ओर कोहराम मच गया. हर कोई मदद मांग रहा था. आज से 42 साल पहले कोहरे की वजह से हुए ट्रेन हादसे की पूरी कहानी पढ़ें.
हरियाणा के बहादुरगढ़ रेलवे स्टेशन पर 10 फरवरी 1984 को सुबह पंजाब मेल ट्रेन खड़ी थी, जो फिरोजपुर से मुंबई की ओर जा रही थी. सुबह का करीब 6 बजे का समय था. प्लेटफार्म नंबर तीन पर शायद सिग्नल का मिलने इंतजार कर रही थी. उसी दौरान दिल्ली-रोहतक लोकल ट्रेन पीछे से आयी. चालक को आगे खड़ी पंजाब मेल दिखाई नहीं दी और उसी स्पीड से ट्रेन चलती रही, पंजाब मेल में पीछे से टक्कर मार दी. टक्कर का अंजादा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब मेल के तीन कोच पटरी से उतर गए.
टक्कर लगते ही चारों ओर कोहराम मच गया. चीख पुकार मच गयी. हर कोई मदद मांगता नजर आ रहा था. पटरी से उतरे कोच बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए. हादसे से कई यात्रियों की मौके से मौत हो गयी. सूचना मिलते ही रेलवे और रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची. कोहरा और अंधेरा होने की वजह से बचाव काम में परेशानी आयी. जैसे तैसे बचाव कार्य शुरू किया गय,घायलों को बहादुरगढ़ और दिल्ली के अस्पतालों में पहुंचाया गया.कई घायलों की हालत नाजुक होने से उन्हें रेफर भी किया जा रहा था. हादसे में 42 यात्रियों की मौत हुई और 55 से अधिक लोग घायल हुए.
पंजाब में आर्मी के जवान भी शामिल थे.
हादसे की क्या रही वजह
कोहरे के चलते विजीबिलटी कम होना हादसे का कारण माना जा रहा है. रिपोर्टों के अनुसार शटल ट्रेन ने पंजाब मेल को पीछे से टक्कर मारी क्योंकि कोहरे में सिग्नल स्पष्ट नहीं दिखा. उस समय रेलवे में इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलिंग न के बराबर थी और ज्यादातर मैनुअल सिस्टम पर निर्भरता थी. जिससे कोहरे में ऐसी दुर्घटनाएं होने की आशंका रहती थी. जांच रिपोर्ट में कमीशनर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) जांच की.
संसद में उठे सवाल
मामला संसद तक पहुंच गया. संसद में पूछे गए सवालों (राज्यसभा, मार्च 1984) के अनुसार, हादसे में 43 यात्री मरने और 55 घायल हुए होना बताया गया. जांच में मुख्य रूप से मानवीय गलती (सिग्नल मैन या ड्राइवर की लापरवाही), कोहरे का प्रभाव और सिग्नलिंग सिस्टम की कमजोरी पाई गई. रेल मंत्रालय ने इसे सिग्नल फेलियर या ऑपरेशनल एरर माना. जांच के बाद रेलवे ने कोहरे वाले इलाकों में बेहतर सिग्नलिंग और फॉग सिग्नल उपकरणों पर जोर दिया.
क्यों चर्चा में रहा हादसा
यह हादसा उस समय काफी चर्चित रहा क्योंकि पंजाब मेल एक प्रमुख लंबी दूरी की ट्रेन थी और उसमें सैनिक भी सवार थे. इस घटना ने रेल सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा किया. इसके बाद में ऐसे हादसों से बचने के लिए कई सुधार किए गए, जैसे बेहतर फॉग सिग्नल और ऑटोमैटिक ब्लॉक सिस्टम.
दो तरह के सिग्नलिंग सिस्टम
ट्रेनों के बीच की दूरी तय करने के लिए दो तरह के सिस्टम काम कर रहे हैं. पहला एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम और दूसरा ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम है. भारतीय रेलवे धीरे-धीरे ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम में शिफ्ट हो रहा है. एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम पुराना है. हालांकि अभी भी तमाम जगह चल रहा है.
क्या है एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम
एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम के तहत ट्रेनों के बीच की दूरी स्टेशनों के बीच की दूरी पर निर्भर करती है. उदाहरण के लिए जब एक ट्रेन अगले स्टेशन को पार कर जाती है तो पहले स्टेशन पर खड़ी ट्रेन को सिग्लन मिलता है. इस सिस्टम में स्टेशनों के बीच दूरी चाहे एक किमी. हो, या कई किमी., इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इस तरह दो स्टेशनों के बीच कोई ट्रेन नहीं होती है..
क्या है ऑटोमेटिक सिग्नल सिस्टम
इस सिस्टम के तहत दो स्टेशनों के बीच में भी कई सिग्नल लगे होते हैं. ये सिग्लन ऑटोमैटिक काम करते हैं. इनकी दूरी तय रहती है लेकिन अलग-अलग सेक्शन में जरूरत के अनुसार होती है. जहां पर ट्रेनों का ट्रैफिक अधिक है और किसी तरह की कोई तकनीकी समस्या नहीं है तो कम दूरी के अंतराल में सिग्लन लगे हैं और जहां ऐसी कोई समस्या है तो अधिक दूरी पर सिग्लन लगे हुए हैं. इस हादसे में ऑटोमेटिक सिग्नल सिस्टम खराब हो गया था और एब्सोल्यूट ब्लॉक सिस्टम के तहत मैनुअल चलाया जा रहा था.