जवान बेटे को खोने का गम, जब जगजीत सिंह ने गजल में पिरोया, हर किसी की आंखें हो गई थीं नम
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गजल सम्राट जगजीत सिंह का जीवन-सफर त्रासदी से कम नहीं है जिसे उन्होंने अंत तक जीया. उन्होंने गजल को महलों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया और अपनी पत्नी चित्रा सिंह के साथ संगीत की सबसे सफल जोड़ी बनाई. साल 1990 में इकलौते जवान बेटे की मौत ने उन्हें तोड़ दिया, जिससे उपजी पीड़ा ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’ जैसे गीतों में साफ झलकती है. जगजीत सिंह ने गालिब और मीर की शायरी को मखमली आवाज देकर अमर कर दिया.

जगजीत सिंह ने गजल को जन-जन तक मशहूर बनाया.
नई दिल्ली: गजल सम्राट जगजीत सिंह की आवाज में जो ठहराव और दर्द था, वो महज रियाज से नहीं बल्कि जिंदगी की ठोकरों से आया था. 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह का शुरुआती सफर किसी फिल्मी स्ट्रगल से कम नहीं था. उनके पिता चाहते थे कि बेटा अफसर बने, लेकिन जगजीत जी के सिर पर तो संगीत का भूत सवार था. जालंधर से कुरुक्षेत्र तक की पढ़ाई के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं और फिर किस्मत आजमाने सपनों की नगरी मुंबई पहुंच गए. वहाँ शुरुआत में कोई रेड कार्पेट नहीं बिछा था; उन्होंने पेइंग गेस्ट बनकर दिन काटे, विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाए और छोटे-मोटे फंक्शन में परफॉर्म किया ताकि गुजारा हो सके. इसी दौरान उनकी मुलाकात चित्रा सिंह से हुई, जो पहले उनकी हमसफर बनीं और फिर संगीत की दुनिया की सबसे मशहूर जोड़ी.
जगजीत सिंह ने उस दौर में गजल को आम आदमी तक पहुंचाया जब इसे सिर्फ ऊंचे घरानों की चीज समझा जाता था. 1975 में आए उनके एल्बम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ ने रातों-रात उन्हें स्टार बना दिया. उन्होंने भारी-भरकम शब्दों वाली गजलों को आसान धुनों में पिरोया ताकि वो हर किसी के दिल को छू सकें. 80 के दशक तक जगजीत और चित्रा की आवाज हर घर की पसंद बन चुकी थी. उन्होंने मिर्जा गालिब की शायरी को अपनी आवाज देकर अमर कर दिया. संगीत की दुनिया में उनकी धाक ऐसी थी कि उन्होंने भारत का पहला डिजिटल सीडी एल्बम ‘बियॉन्ड टाइम’ पेश किया. सफलता उनके कदम चूम रही थी, लेकिन तभी कुदरत ने उन्हें वो घाव दिया जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकी.
इकलौते जवान बेटे विवेक का निधन
साल 1990 जगजीत सिंह की जिंदगी का सबसे काला साल साबित हुआ, जब एक कार एक्सीडेंट में उनके इकलौते जवान बेटे विवेक का निधन हो गया. इस हादसे ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था. गम इतना गहरा था कि चित्रा सिंह ने तो हमेशा के लिए गायकी से किनारा कर लिया और जगजीत जी की आवाज भी लंबे समय के लिए खामोश हो गई. लोग कहने लगे थे कि अब शायद गजल का ये सूरज दोबारा नहीं उगेगा. लेकिन कुछ समय बाद जब वो लौटे, तो उनकी गायकी में एक रूहानी दर्द और गहरा हो चुका था. उनके गाए गाने ‘चिट्ठी न कोई संदेश’ को सुनकर आज भी हर आँख नम हो जाती है क्योंकि वो किसी फिल्म का गाना नहीं, बल्कि एक टूटे हुए पिता की अपने बेटे के लिए पुकार थी.
सुकून हैं जगजीत सिंह की आवाज
जगजीत सिंह की आवाज आज भी हमारे बीच है क्योंकि उन्होंने प्यार, तन्हाई और बिछड़ने के हर एहसास को शब्दों में पिरोया. ‘होश वालों को खबर क्या’ से लेकर ‘वो कागज की कश्ती’ तक, उनके हर नगमे में एक कहानी बसी है. उन्होंने ग़ालिब, मीर और फ़िराक जैसे शायरों को आम जनता का यार बना दिया. 10 अक्टूबर 2011 को वो भले ही इस दुनिया को विदा कह गए, लेकिन जब भी कहीं कोई दिल टूटेगा या पुरानी यादें ताजा होंगी, जगजीत जी की मखमली आवाज मरहम बनकर जरूर गूंजेगी. उनकी गजलें महज गाने नहीं, बल्कि वो सुकून हैं जो भागती-दौड़ती दुनिया में हर इंसान ढूंढता फिरता है.
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अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें