Ghaziabad Cycle Track | Cycle Track Encroachment | Cycle Track
Ghaziabad News: गाजियाबाद के पॉश इलाके इंदिरापुरम और वसुंधरा में साइकिलिंग को बढ़ावा देने के लिए ‘विकास प्रोजेक्ट’ के तहत लाखों-करोड़ों रुपये बहाए गए, लेकिन आज वही साइकिल ट्रैक आम जनता के लिए जी का जंजाल बन चुके हैं. जिस ट्रैक पर पहिए दौड़ने चाहिए थे, वहां आज गड्ढे, बिजली के खंभे और अतिक्रमण का राज है. हालात इतने बदतर हैं कि 10 सालों से इन ट्रैकों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. जीडीए (GDA) और नगर निगम के बीच फंसी जिम्मेदारी की इस ‘नूराकुश्ती’ में आम नागरिक हादसों का शिकार हो रहे हैं.
लाखों का बजट और दावों की पोल खोलती हकीकत
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2016 में जीडीए की ओर से बड़े उत्साह के साथ इंदिरापुरम् में साइकिल ट्रैक प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई थी. शुरुआती दौर में न्यायखंड से अभयखंड के बीच करीब 500 मीटर का सैंपल ट्रैक बनाया गया, जिसकी लागत 6 लाख रुपये बताई गई थी. इसके बाद इस प्रोजेक्ट का विस्तार सूर्य नगर और वसुंधरा जोन तक किया गया. योजना थी कि इससे प्रदूषण कम होगा और लोगों की सेहत सुधरेगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. आज ये ट्रैक साइकिल चलाने लायक तो क्या, पैदल चलने लायक भी नहीं बचे हैं.
डिजाइन में खामियां और जानलेवा बाधाएं
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी विडंबना इसकी प्लानिंग है. ट्रैक के बीचों-बीच बिजली के पोल खड़े हैं, तो कहीं हाई-टेंशन तारों का जाल नीचे तक झूल रहा है. वसुंधरा जोन में तो हालात और भी खराब हैं, वहां पेड़ों की टहनियां इतनी नीचे आ गई हैं कि साइकिल सवार को चोट लगना तय है. निर्माण के समय जो खामियां सैंपल ट्रैक में दिखी थीं, उन्हें नजरअंदाज कर पूरे शहर में उसी दोषपूर्ण डिजाइन को लागू कर दिया गया.
साइकिल ट्रैक अब साइकिलिंग के लिए नहीं, बल्कि अवैध कब्जे के लिए जाने जाते हैं. यहां रेहड़ी-पटरी वालों का कब्जा है, तो कहीं लोगों ने इसे अपनी गाड़ियों की पार्किंग बना लिया है. सफाई के अभाव में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हैं. स्थानीय निवासी अनमोल बताते हैं कि अगर उन्हें साइकिलिंग करनी होती है, तो वे दिल्ली के ट्रैकों का रुख करते हैं, क्योंकि गाजियाबाद के इन रास्तों पर जान का जोखिम बहुत ज्यादा है.
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते अधिकारी
जब इस बदहाली पर सवाल उठाए जाते हैं, तो विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोप देते हैं. निर्माण विभाग के जेई संजय गंगवार का कहना है कि यह प्रोजेक्ट अभी भी जीडीए के अधीन है और उन्हें हैंडओवर नहीं किया गया है. दूसरी ओर, जीडीए अधिकारियों का दावा है कि इंदिरापुरम् को नगर निगम को हैंडओवर किया जा चुका है. इस ‘हैंडओवर’ के खेल में 10 साल बीत गए, लेकिन ट्रैक की एक बार भी मरम्मत नहीं हुई.
स्थानीय जनता में भारी रोष
इंदिरापुरम् की निवासी आरती सिंह कहती हैं कि शुरुआत में हम सब बहुत खुश थे, लेकिन मेंटेनेंस के अभाव में अब यह ट्रैक जर्जर हो चुके हैं. टूटी हुई सड़कें और अधूरे प्रोजेक्ट्स ने जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी की एक नई मिसाल पेश की है. सवाल यह है कि आखिर इन हादसों का जिम्मेदार कौन होगा?