पुलिस न्यायपालिका की भूमिका नहीं निभा सकती.. आरोपियों के पैर में गोली मारने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को लगाई फटकार

Share to your loved once


प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को यूपी पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि अपराधियों को सजा देना न्यायपालिका का काम है, न कि पुलिस का. अदालत ने राज्य में कथित तौर पर बढ़ते एनकाउंटर के मामलों पर गंभीर चिंता जताई, जिनमें पुलिस संदिग्ध अपराधियों को घुटने के नीचे गोली मारकर सोशल मीडिया में चर्चा और समय से पहले प्रमोशन हासिल कर रही है.

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि ऐसे कृत्य कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं हैं, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और आरोपी को सजा देने का काम न्यायपालिका का है.

पुलिस को सजा देने का अधिकार नहीं: हाईकोर्ट

अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वे न्यायपालिका का काम अपने हाथ में लेकर अनावश्यक फायरिंग करें और अपराधियों को गैर-घातक अंगों पर भी गोली मारकर घायल करें. न्यायमूर्ति देशवाल ने यह टिप्पणी डीजीपी राजीव कृष्ण और अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद से ऑनलाइन सुनवाई के दौरान कही.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन

बता दें कि यह दिशा-निर्देश उस मामले से जुड़े हैं, जिसमें राजू उर्फ राजकुमार नामक एक आरोपी को पैर में गोली मारी गई थी. 28 जनवरी को आरोपी को जमानत देते हुए न्यायमूर्ति देशवाल ने कहा कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 के PUCL बनाम महाराष्ट्र फैसले का उल्लंघन किया है.

एनकाउंटर में घायल होने पर एफआईआर अनिवार्य

अदालत के आदेश के अनुसार, अगर किसी सूचना के आधार पर पुलिस मौके पर पहुंचती है और मुठभेड़ में बंदूक का इस्तेमाल होता है, जिससे आरोपी या कोई अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल होता है, तो संबंधित पुलिस टीम के प्रभारी को उसी या नजदीकी थाने में एफआईआर दर्ज करनी होगी.

इस एफआईआर की जांच सीबी-सीआईडी या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम द्वारा की जाएगी, जिसकी निगरानी कम से कम उस पुलिस अधिकारी से वरिष्ठ स्तर का अधिकारी करेगा, जिसने एनकाउंटर टीम का नेतृत्व किया हो.

घायल आरोपी को तुरंत चिकित्सा सहायता जरूरी

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घायल आरोपी को तुरंत चिकित्सा सहायता दी जाए. उसके बाद मजिस्ट्रेट या सक्षम मेडिकल अधिकारी द्वारा फिटनेस प्रमाण पत्र जारी कर उसका बयान दर्ज किया जाए. जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सक्षम अदालत में पेश की जाए, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनाएगी.

एनकाउंटर पर इनाम और प्रमोशन पर भी रोक

अदालत ने पुलिस विभाग में बिना जांच के एनकाउंटर को बढ़ावा देने पर भी सवाल उठाए. आदेश में कहा गया कि किसी पुलिस एनकाउंटर के तुरंत बाद संबंधित अधिकारी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा. यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसे सम्मान तभी दिए जाएं, जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति यह साबित कर दे कि संबंधित अधिकारी की वीरता संदेह से परे है.

पीड़ित परिवार कर सकता है अदालत का रुख

अदालत ने कहा कि यदि पुलिस एनकाउंटर में घायल व्यक्ति या उसके परिजन यह लगता है कि दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया है, तो वे किसी भी सत्र न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं. दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की स्थिति में जिले के पुलिस अधीक्षक और एनकाउंटर टीम का नेतृत्व करने वाला अधिकारी अवमानना और विभागीय कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP