Saturday Stotra। दशरथकृत शनि स्तोत्र के लाभ और महत्व

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Saturday Stotra : शनिवार आते ही कई लोगों के मन में एक अजीब-सी बेचैनी घिर जाती है. कोई इसे शनि का डर कहता है, तो कोई कर्मों का हिसाब. लेकिन सच यही है कि शनिवार सिर्फ भय का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, धैर्य और समाधान का भी अवसर है. खासकर तब, जब जीवन में काम रुक-रुक कर हो रहे हों, मेहनत के बावजूद परिणाम न मिल रहे हों या मन लगातार भारी महसूस कर रहा हो. ऐसे समय में दशरथकृत शनि स्तोत्र को एक सरल लेकिन प्रभावी उपाय माना जाता है. यह कोई त्वरित चमत्कार नहीं, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और विश्वास का मार्ग है, जो शनिदेव की कृपा तक ले जाता है.

शनिवार और शनिदेव का गहरा संबंध
हिंदू परंपरा में सप्ताह के हर दिन का एक विशेष देवता से संबंध है. शनिवार का दिन शनिदेव को समर्पित माना जाता है. शनि को न्याय का देवता कहा गया है, जो व्यक्ति के कर्मों के अनुसार फल देते हैं. यही कारण है कि शनि का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं, लेकिन धार्मिक जानकारों की मानें तो शनि उतने कठोर नहीं, जितना उन्हें समझ लिया गया है.

क्यों खास है शनि की उपासना?
शनि जीवन में अनुशासन सिखाते हैं. वे देर से फल देते हैं, लेकिन स्थायी और न्यायपूर्ण फल देते हैं. जब कुंडली में शनि की स्थिति अशुभ होती है, तब व्यक्ति को मेहनत के बावजूद रुकावटें झेलनी पड़ती हैं. ऐसे में शनि की उपासना मन को स्थिरता और जीवन को दिशा देती है.

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दशरथकृत शनि स्तोत्र: एक प्राचीन लेकिन प्रासंगिक स्तुति
दशरथकृत शनि स्तोत्र का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है. मान्यता है कि इसे राजा दशरथ ने स्वयं शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए रचा था. यह स्तोत्र शनि के प्रकोप को शांत करने और उनके शुभ प्रभाव को बढ़ाने में सहायक माना जाता है.

स्तोत्र का पाठ कैसे करें?
शनिवार की सुबह या संध्या का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. शनि मंदिर में या घर के पूजा स्थल पर शनिदेव की प्रतिमा या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं. काले तिल, नीले फूल या काले वस्त्र अर्पित करें. इसके बाद शांत मन से दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें. ध्यान रहे, पाठ के दौरान मन में नकारात्मक विचार न आने दें.

जीवन में दिखने वाले छोटे लेकिन अहम बदलाव
कई लोग इसे सिर्फ आस्था का विषय मानते हैं, लेकिन जो नियमित रूप से इसका पालन करते हैं, वे बदलाव महसूस करते हैं. जैसे काम में आ रही अनावश्यक देरी कम होना, मन का बोझ हल्का लगना, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ना. एक नौकरीपेशा व्यक्ति बताते हैं कि लगातार रुक रही प्रमोशन प्रक्रिया, शनि स्तोत्र के नियमित पाठ के बाद धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी.

क्या सच में साढ़ेसाती और ढैय्या का असर कम होता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और महादशा के कष्टकारी प्रभावों को कम करता है. यह स्तोत्र व्यक्ति को मानसिक मजबूती देता है, जिससे वह कठिन समय को बेहतर ढंग से संभाल पाता है.

आस्था, अनुशासन और कर्म का संतुलन
यह समझना जरूरी है कि कोई भी स्तोत्र या पूजा कर्मों का विकल्प नहीं हो सकता. शनि कर्म प्रधान देवता हैं. स्तोत्र का पाठ हमें सही दिशा में चलने की प्रेरणा देता है. जब आस्था और कर्म साथ चलते हैं, तभी वास्तविक परिवर्तन होता है.

शनि स्तोत्र

दशरथ उवाच:
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥
रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् .
सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥
याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं .
एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥
प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा .
पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥
दशरथकृत शनि स्तोत्र:
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च .
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च .
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: .
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: .
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते .
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते .
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च .
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे .
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: .
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे .
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥
दशरथ उवाच:
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् .
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥

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