सुपरस्टार के ताने सुन-सुनकर हीरोइन ने पूरी की फिल्म, नहीं देखते थे एकदूजे की शक्ल! मूवी ने रचा इतिहास – amitabh bachchan naseeb muqaddar ka sikandar rajesh khanna bawarchi 3 bollywood movies never had opening credits all turn superhit interesting story
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Bollywood Movies without Opening Credits : फिल्म की शुरुआत या लास्ट में स्क्रीन पर क्रेडिट दिए जाने का ट्रेंड वर्षों पुराना है. स्क्रीन पर हीरो-हीरोइन-विलेन, गीतकार-संगीतकार के नाम आते ही मन रोमांचित हो जाता है. 70-80 के दशक में कुछ डायरेक्टर ने अपनी पहचान हीरो-हीरोइन से भी बड़ी कर ली. उन्होंने कई बार अपनी फिल्मों में किसी भी कलाकार को क्रेडिट दिए बिना फिल्में रिलीज कीं. इन फिल्मों में सिर्फ डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के बैनर का जिक्र था. कई मूवी में तो लास्ट सीन में फिल्म के बैनर का जिक्र था. 9 साल के अंतराल में ऐसी ही तीन फिल्में सिनेमाघरों में आईं. तीन फिल्मों में दो ब्लॉकबस्टर रहीं. तीसरी फिल्म हिट रही. ये फिल्में कौन सी थीं और वो डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कौन था, आइये जानते हैं……..

हिंदी सिनेमा के बेहतरीन डायरेक्टर में शुमार ऋषिकेश मुखर्जी जीवन की असलियत को पर्दे पर हल्के-फुल्के अंदाज में उतारा करते थे. उन्होंने ‘सत्यकाम’, ‘गुड्डी, ‘आनंद’, ‘मिली’, ‘चुपके-चुपके’, ‘गोलमाल’ जैसी कई बेहतरीन फिल्में बनाईं. अमिताभ बच्चन उन्हें अपना गॉडफादर कहा करते थे. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1957 में आई फिल्म ‘मुसाफिर’ से की थी. ऋषिकेश मुखर्जी को 8 बार फिल्मफेयर मिले. 1999 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. साल 2001 में पद्म विभूषण अवॉर्ड से नवाजा गया. मनमोहन देसाई भी उनके ही समकालीन थे. दोनों ने 70-80 के दशक में एक से बढ़कर एक फिल्में बनाईं. ऋषिकेश मुखर्जी ने एक फिल्म ऐसी भी बनाई जिसमें हीरो-हीरोइन को स्क्रीन पर क्रेडिट नहीं दिया. इसी तरह मनमोहन देसाई ने दो फिल्मों में यह टोटका आजमाया. प्रकाश मेहरा ने भी इसी अंदाज में कई फिल्में बनाईं. मजे की बात यह है कि तीनों ही बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं. ये फिल्में थीं : बावर्ची, नसीब और मुकद्दर का सिकंदर.

सबसे पहले बात करते हैं 7 जुलाई 1972 में रिलीज हुई बावर्ची फिल्म की. यह एक म्यूजिकल कॉमेडी ड्रामा फिल्म थी जिसका डायरेक्शन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था. फिल्म के प्रोड्यूसर ऋषिकेश मुखर्जी-एनसी सिप्पी-रोमू ए. सिप्पी थे. फिल्म में राजेश खन्ना, जया भादुड़ी, असरानी, हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, एके हंगल, दुर्गा खोटे, उषा किरण जैसे सितारे थे. फिल्म में किसी भी एक्टर-एक्ट्रेस को कोई क्रेडिट नहीं दिया गया था. इसके बजाय अमिताभ बच्चन की आवाज में बैकग्राउंड से सभी कैरेक्टर का सिर्फ परिचय दिया गया. सुपरस्टार राजेश खन्ना ने लीड रोल प्ले किया था. मूवी में उनका कोई भी रोमांटिक सीन नहीं था. आनंद (1971) के बाद यह लगातार दूसरी ऐसी फिल्म थी जिसमें राजेश खन्ना के अपोजिट किसी हीरोइन को साइन नहीं किया गया था.

पूरी फिल्म में राजेश खन्ना एक कैप पहने नजर आते हैं. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन बार-बार सेट पर जया भादुड़ी से मिलने आया करते थे. राजेश खन्ना उन्हें अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. कहा जाता है कि एक दिन राजेश खन्ना ने उन्हें ‘मनहूस’ बोल दिया. यह सुनकर जया भादुड़ी गुस्से से लाल हो गईं. उन्होंने कहा था कि एक दिन पूरी दुनिया अमिताभ को सलाम करेगी. हुआ भी ठीक ऐसा ही. 1973 में आई जंजीर फिल्म से अमिताभ बच्चन रातोंरात सुपरस्टार बने. फिर 1975 में आई दीवार, शोले जैसे फिल्मों से बॉलीवुड में उनके नाम की तूती बोलने लगी. राजेश खन्ना का स्टारडम का सूरज 1974 में ही अस्त हो गया. बावर्ची राजेश खन्ना और जया भादुड़ी की एकमात्र साथ में फिल्म है. फिल्म बंगाली मूवी ‘गोलपो होलेओ सोट्टी’ (1966)’ से इंस्पायर्ड थी.
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1981 की फिल्म ‘नसीब’ के साथ भी ऐसा ही अनोखा प्रयोग किया गया था. इस फिल्म में हीरो-हीरोइन को कोई क्रेडिट नहीं दिया गया था. फिल्म में अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, ऋषि कपूर, हेमा मालिनी, रीना रॉय ने काम किया था. इस फिल्म में ओपनिंग क्रेडिट्स नहीं थे. यानी किसी भी स्टार के नाम स्क्रीन पर शुरुआत में नहीं दिखाए गए. सिर्फ बैनर और फिल्म का नाम दिखाया गया था. फिल्म में कई स्टार ने कैमियो किया था. उनके नाम जरूर दिखाए गए थे. म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था. गीतकार आनंद बख्शी थे. फिल्म के दो गाने ‘जिंदगी इम्तिहान लेती है’ और ‘मेरे नसीम में तू है की नहीं’ आज भी पॉप्युलर हैं.

दरअसल, मनमोहन देसाई अपनी 1979 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘अमर अकबर एंथोनी’ उसी स्टार कास्ट के साथ सीक्वल बनाना चाहते थे. उनकी राइटर्स टीम ने ‘नसीब’ फिल्म की कहानी लिखी. फिल्म के डायलॉग कादर खान ने लिखे थे. स्टोरी प्रयागराज और स्क्रीन केके शुक्ला ने लिखा था. विनोद खन्ना ने इंडस्ट्री छोड़ चुके थे. ऐसे में उनकी जगह शत्रुघ्न सिन्हा को लिया गया. कहा जाता है कि यह पहली ऐसी फिल्म थी जिसका ट्रेलर दूरदर्शन पर दिखाया गया था. फिल्म का बजट करीब 4 करोड़ रुपये था. मूवी ने 7.25 करोड़ का कलेक्शन किया था. कमाई के माअम्ले में यह 1981 की दूसरी सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाली फिल्म थी.

यूपी के बिजनौर में जन्मे बॉलीवुड के मशहूर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर प्रकाश मेहरा ने ऋषिकेश मुखर्जी के पैटर्न को सबसे ज्यादा फॉलो किया. उन्होंने एक दो नहीं, बल्कि चार फिल्में ऐसी बनाई जिसमें ओपनिंग क्रेडिट्स नहीं थे. 1968 में ‘हसीना मान जाएगी’ से अपना फिल्मी करियर शुरू करने वाले अपनी प्रोडक्शन कंपनी पीएमपी (प्रकाश मेहरा प्रोडक्शंस) खोली थी. इसी प्रोडक्शन के बैनर तले उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ कई फिल्में बनाई. प्रकाश मेहरा ने ही 1973 में जंजीर फिल्म बनाई थी. इसी फिल्म से अमिताभ को ‘एंग्रीमैन’ का टैग मिला. प्रकाश मेहरा ने अपने नाम का ब्रांड बनाया. फिल्में उनके नाम से बिकती थीं. इसी कड़ी में उन्होंने राज कपूर की संगम और दिलीप कुमार की देवदास फिल्म को मिक्स करके ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म की कहानी तैयार की.

यह फिल्म 27 अक्टूबर 1978 को रिलीज हुई थी जिसमें अमिताभ बच्चन, रेखा , विनोद खन्ना, राखी, अमजद खान लीड रोल में थे. इस फिल्म में भी ओपनिंग क्रेडिट्स नहीं थे. यानी फिल्म में काम करने वाले किसी भी स्टार को कोई क्रेडिट नहीं दिया गया था. फिल्म की शुरुआत में सिर्फ पीएमपी (प्रकाश मेहरा प्रोडक्शंस) बैनर का नाम लिखा नजर आया. फिल्म के एंड क्रेडिट्स में एक्टर-एक्टर्स की जगह स्टोरी : विजयकांत शर्मा, स्क्रीनप्ले : विजय कौल, डायलॉग : कादर खान का नाम नजर आया. सबसे ऊपर प्रजेंटेंशन में प्रकाश मेहरा का नाम लिखा हुआ था. मुकद्दर का सिकंदर फिल्म का म्यूजिक कल्याणजी – आनंद जी ने दिया था. प्रकाश मेहरा की सबसे बेस्ट फिल्म में शुमार इस फिल्म में रेखा ने जोहरा बाई नाम की तवायफ का रोल निभाया था.

फिल्म ‘सच्चा प्यार नसीब से ही मिलता है’ इस धारणा को पुख्ता करती है. मूवी में अमजद खान रेखा को एकतरफा प्यार करते हैं. रेखा तन-मन से अमिताभ बच्चन को दिल दे बैठती हैं. अमिताभ बचपन फिल्म में बचपन की फ्रेंड राखी से प्यार करते हैं. अपने जज्बात उनके सामने बयां नहीं कर पाते. राखी विनोद खन्ना को चाहती हैं. मूवी का बजट 1 करोड़ था. फिल्म ने 8.5 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह मूवी बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी. 1978 का साल अमिताभ बच्चन का था. इसी साल उनकी डॉन फिल्म रिलीज हुई थी जिसके लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था .