एकता के हर प्रयास पर विभाजन की छाया: रामायण से UGC नियमों तक का क्रमिक पैटर्न | – News in Hindi

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1987 में रामानंद सागर की ‘रामायण’ दूरदर्शन पर प्रसारित हुई तो पूरा देश एक अनोखे आध्यात्मिक जादू में डूब गया. रविवार सुबहें राम-नाम से गूंज उठीं, सड़कें सुनसान और दुकानें बंद हो गईं. यह महज धारावाहिक नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक हिंदुओं को एक सूत्र में बांधने वाला सांस्कृतिक जागरण था. राम हर घर, हर जुबान पर छा गए. ठीक उसी दौर में ए.के. रामानुजन का निबंध  ‘Three Hundred Ramayanas: Five Examples and Three Thoughts on Translation’ चर्चा में आया, जो बाद में उनकी किताब ‘Many Ramayanas’ का हिस्सा बना. इसने रामकथा को एक नहीं, बल्कि सैकड़ों विविध रूपों में पेश किया-दक्षिण भारतीय, थाई, कंबोडियाई आदि परंपराओं के भिन्न संस्करणों का जिक्र कर मुख्य वाल्मीकि रामायण से अलग व्याख्याएं सामने रखीं. कुरआन की आयतों पर आई सलमान रश्दी की किताब को प्रतिबंधित कराने वाला समूह पूरी सक्रियता के साथ उन दिनों रामानुजन की किताब रामायानाज का प्रचार प्रसार कर रहा था.

जब एक तरफ राम की एकता का संदेश फैल रहा था, वहीं यह निबंध समाज को बांटने में अपनी भूमिका निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था. हद तो तब हुई जब 2011 में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास पाठ्यक्रम में इसे शामिल कर लिया गया, जागरूक भारतीय समाज द्वारा इसका विरोध होना तय था. अब यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए कि यह सब कोई संयोग नहीं था, बल्कि हिंदू एकता को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास था.

राम जन्मभूमि आंदोलन और मंडल बनाम कमंडल (1990)

1990 का दशक आया तो राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर पहुंच गया. विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के नेतृत्व में राम मंदिर की मांग तेज हुई. लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने ‘कमंडल’ की लहर पैदा की. हर वर्ग, हर जाति के लोग एकजुट होकर मंदिर आंदोलन में शामिल हुए-हिंदू समाज की अभूतपूर्व एकता का यह सुनहरा दौर था.

लेकिन अगस्त 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं-OBC के लिए 27% आरक्षण. देश में भारी आंदोलन छिड़ गया, ऊपरी जातियों के छात्रों ने आत्मदाह तक कर दिए. ‘मंडल बनाम कमंडल’ की छीड़ गई.. कई इतिहासकार इसे संयोग नहीं मानते-जब हिंदू एक हो रहे थे, तब जातिगत आरक्षण की आग भड़काकर समाज को बांटने की कोशिश हुई, जो ‘डिवाइड एंड रूल’ की पुरानी नीति जैसी लगती है.

मोदी युग में एकीकरण और चुनौतियां (2014 से अब तक)

पिछले एक दशक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की दिशा में बढ़ा है. पूर्वोत्तर से दक्षिण तक कनेक्टिविटी, धैर्यपूर्ण निर्णय-सब एकीकरण के प्रमाण हैं. 2021 के किसान आंदोलन में लाल किले पर झंडा फहराने की घटना पर कइयों ने तत्काल सख्ती की मांग की, लेकिन सरकार ने धैर्य दिखाया. बाद में बांग्लादेश-नेपाल में ‘जन आंदोलन’ के नाम पर अराजकता देखकर लगा कि पीछे बड़ी साजिश हो सकती थी. तीन कृषि कानून, जो किसानों के हित में थे, राजनीतिक दबाव में वापस ले लिए गए-आज भी कई किसान मानते हैं कि कानून उनके पक्ष में थे.

वर्तमान विवाद-हिंदू एकता के बीच UGC इक्विटी नियम (2026)

अब देशभर में हिंदू सम्मेलनों की तैयारियां चल रही हैं, समाज एक बार फिर संगठित हो रहा है. ठीक इसी समय जनवरी 2026 में यूजीसी ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 अधिसूचित किए. इनका उद्देश्य उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव रोकना है-इक्विटी कमेटियां, शिकायत निवारण तंत्र, इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर आदि अनिवार्य किए गए.

ब्लॉगर के बारे में

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।

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