krishna ji ki bansuri ka kya naam tha। भगवान कृष्ण की बांसुरी का नाम क्या है

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Krishna Ji Ki Bansuri Ka Kya Naam Tha: भगवान कृष्ण और उनकी बांसुरी की कथा भारतीय संस्कृति में एक खास स्थान रखती है. यह केवल एक संगीत वाद्य नहीं थी, बल्कि प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी मानी जाती थी. कहते हैं, जब कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते थे, तो उसकी धुन सुनकर गोपियां, गायें, पक्षी और पूरी प्रकृति मंत्रमुग्ध हो जाती थी. हर स्वर में करुणा और शांति का अनुभव होता था, और लोगों का मन भगवान की ओर आकर्षित होता था. परंपराओं में कई बांसुरियों का जिक्र मिलता है, लेकिन इनमें से एक थी कृष्ण की सबसे प्रिय मंदाकिनी बांसुरी, जिसकी धुन को सुनना किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं था. इस बांसुरी की कहानी केवल संगीत तक सीमित नहीं है. इसके पीछे पौराणिक कथाएं, देवताओं का मिलन और भगवान शिव की विशेष भेंट जुड़ी हुई है. यह कहानी बताती है कि कैसे एक साधारण वाद्य यंत्र भी प्रेम और दिव्यता की शक्ति को व्यक्त कर सकता है. आइए जानते हैं, कैसे बनी यह बांसुरी और इसे किसने भगवान कृष्ण को भेंट की.

भगवान कृष्ण की बांसुरी के प्रमुख नाम
कथाओं में कई बांसुरियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
-महानंदा: अत्यंत लंबी और दूर तक सुनाई देने वाली बांसुरी.
-सरला: छोटी, कोमल और मधुर स्वर देने वाली बांसुरी.
-भुवनमोहिनी: ऐसी वंशी जिसे सुनकर हर प्राणी मोहित हो जाता.
-मदनझंकृति: छह छिद्रों वाली बांसुरी, रागों को जीवंत करने के लिए प्रसिद्ध.

इन सभी में मंदाकिनी बांसुरी खास मानी गई. इसे भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय और प्रभावी बांसुरी माना गया.

देवताओं का मिलन और शिव का उपहार
द्वापर युग में जब कृष्ण धरती पर अवतरित हुए, सभी देवी-देवता उन्हें देखने के लिए आए. हर देवता चाहता था कि वे ऐसा उपहार दें जो कृष्ण को प्रिय लगे और हमेशा उनके पास रहे. भगवान शिव ने महसूस किया कि कृष्ण को संगीत अत्यंत प्रिय है. इसलिए उन्होंने सोचा, क्यों न कोई दिव्य बांसुरी बनाई जाए, जो केवल धुन के लिए नहीं, बल्कि प्रेम और शक्ति का प्रतीक बने.

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ऋषि दधीचि की हड्डियों से बनी दिव्य वंशी
कथा के अनुसार, ऋषि दधीचि की हड्डियां अपार ऊर्जा और दिव्यता से भरी थीं. इन्हीं हड्डियों से विश्वकर्मा ने महाधनुष और इंद्र के लिए वज्र बनाए थे. शिव ने इन दिव्य हड्डियों का उपयोग कर एक सुंदर, कोमल और तेजस्वी बांसुरी बनाई. यह साधारण वाद्य नहीं थी. इसमें तप, त्याग, शक्ति और पवित्रता का सार था. जब शिव जी ने यह बांसुरी कृष्ण को भेंट की, और पहली धुन निकली, तो पूरे गोकुल में एक अदृश्य शांति फैल गई. इसे सुनते ही सभी जीव-गाय, पक्षी, गोपियां-मंत्रमुग्ध हो उठे. यही कारण है कि इसे सम्मोहिनी वंशी भी कहा गया.

कृष्ण और उनकी बांसुरी का महत्व
कृष्ण की बांसुरी केवल संगीत का माध्यम नहीं थी. यह प्रेम और भक्ति की आवाज थी. कहते हैं, यह बांसुरी बजाते ही मनुष्य के भीतर छिपी सारी चिंता, तनाव और अहंकार गायब हो जाते थे. उसकी धुन इंसान को सीधे आत्मा और ईश्वर से जोड़ देती थी. बांसुरी की यह शक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि कृष्ण की कहानियों में इसे हमेशा उनके प्रेम और करुणा के प्रतीक के रूप में दिखाया गया. मंदाकिनी वंशी ने न केवल गोकुल बल्कि पूरे विश्व में भक्ति का संदेश फैलाया.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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