26 जनवरी: 20 साल पहले, आमिर खान के 2 फैसले से ब्लॉकबस्टर बनी फिल्म, 2006 में बॉक्स ऑफिस पर खूब मचाया था तहलका
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फिल्मों की दुनिया में कुछ फैसले फिल्मों की किस्मत और दर्शकों की सोच, दोनों बदल देते हैं. आज से ठीक 20 साल पहले, 26 जनवरी 2006 को रिलीज हुई ‘रंग दे बसंती’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. आमिर खान के दो क्रांतिकारी फैसलों-‘भगत सिंह’ के बजाय ‘डीजे’ का किरदार चुनना और फिल्म के क्लाइमैक्स में ‘शहादत’ का सुझाव देना, ने इस फिल्म को एक साधारण कहानी से ऊपर उठाकर देश का सबसे बड़ा ‘सिनेमाई आंदोलन’ बना दिया. 28 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने न केवल 97 करोड़ की कमाई की, बल्कि भारतीय युवाओं की नब्ज पकड़कर बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया.

नई दिल्ली. आज से ठीक 20 साल पहले यानी 26 जनवरी 2006 के आस-पास, जब राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ रिलीज हुई, तो देश का माहौल पूरी तरह बदल गया, लेकिन इस फिल्म की ऐतिहासिक सफलता के पीछे सुपरस्टार आमिर खान का एक फैसला था, जिसने न सिर्फ फिल्म की कहानी में नई जान फूंकी, बल्कि इसे एक ‘कल्ट क्लासिक’ ब्लॉकबस्टर भी बना दिया.

फिल्म के प्रोडक्शन के दौरान, एक समय ऐसा आया जब डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा चाहते थे कि आमिर खान ‘शहीद भगत सिंह’ का लीड रोल करें. उस समय आमिर खान से बड़ा कोई स्टार नहीं था, और मेकर्स को लगा कि भगत सिंह जैसे गंभीर और दमदार किरदार के लिए आमिर का चेहरा सबसे सही रहेगा.

हालांकि, ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ के नाम से मशहूर आमिर खान ने स्क्रिप्ट की गहराई को समझा. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आमिर ने दो ऐसे फैसले लिए जिसने डायरेक्टर को भी हैरान कर दिया. आमिर ने कहा, ‘मैं भगत सिंह का रोल नहीं करूंगा, बल्कि ‘डीजे’ (चंद्रशेखर आजाद) का किरदार निभाऊंगा, और भगत सिंह का रोल ऐसे एक्टर को मिलना चाहिए जिसकी उम्र और चेहरे की मासूमियत किरदार से मेल खाए.’ आमिर का तर्क था कि ‘डीजे’ का किरदार आज के बेफिक्र युवाओं और ‘चंद्रशेखर आजाद’ जैसे ऐतिहासिक किरदार के बीच एक पुल का काम करता है. आमिर की सलाह पर ही सिद्धार्थ को भगत सिंह का रोल मिला. आमिर के इस निस्वार्थ फैसले ने फिल्म में किरदारों का ऐसा संतुलन बनाया कि दर्शक हर किरदार से जुड़ पाए.
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वहीं, फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का वह रोंगटे खड़े कर देने वाला क्लाइमैक्स, जहां सभी मुख्य किरदार रेडियो स्टेशन पर शहीद हो जाते हैं, हमेशा से ऐसा नहीं था. शुरुआत में फिल्म का अंत थोड़ा अलग और कम प्रभावशाली होने की संभावना थी, लेकिन आमिर खान ने कहानी की गहराई को समझते हुए इसके क्लाइमैक्स में भी एक बड़ा बदलाव डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा को सुझाया.

आमिर का मानना था कि फिल्म का अंत खुशनुमा होने के बजाय ‘शहादत’ वाला होना चाहिए, ताकि दर्शकों के जहन में व्यवस्था के खिलाफ एक गहरी चोट पहुंचे. उनके सुझाव पर ही किरदारों की मौत को फिल्म का अंतिम हिस्सा बनाया गया, जिसने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया. इसी साहसी फैसले ने ‘रंग दे बसंती’ को एक साधारण फिल्म से ऊपर उठाकर एक ‘ऐतिहासिक आंदोलन’ में तब्दील कर दिया.

जब यह फिल्म 2006 में रिलीज हुई, तो इसने बॉक्स ऑफिस की सारी उम्मीदों को तोड़ दिया. तब तक देशभक्ति फिल्में सिर्फ बॉर्डर पर होने वाली लड़ाइयों को दिखाती थीं, लेकिन इस फिल्म ने ‘सिस्टम’ और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ी. बॉक्स ऑफिस इंडिया के मुताबिक इस फिल्म का बजट लगभग 28 करोड़ रुपये था.

बिना किसी पारंपरिक मसाला-एक्शन या विलेन के, एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म ने अपनी लागत से तीन गुना ज्यादा कमाई की. फिल्म का वर्ल्डवाइड टोटल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 97 करोड़ रुपये था. यह उस साल की सातवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्म बनकर उभरी थी. यह आमिर खान की स्टारडम और बेहतरीन कंटेंट का ही असर था कि फिल्म ने दुनिया भर में जबरदस्त सफलता हासिल की थी.

फिल्म का असर सिर्फ बॉक्स ऑफिस तक ही सीमित नहीं था. ‘रंग दे बसंती’ की रिलीज के बाद भारत में ‘कैंडल मार्च’ और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का चलन शुरू हुआ. चाहे वह जेसिका लाल हत्याकांड हो या आरुषि हत्याकांड, इस फिल्म से प्रेरित होकर युवाओं ने इंडिया गेट पर प्रदर्शन किए. फिल्म का मशहूर डायलॉग ‘कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता, उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है’ आज भी हर भारतीय को जोश से भर देता है.

आमिर खान के फैसले ने बाकी 5 किरदारों- सिद्धार्थ, शर्मन जोशी, कुणाल कपूर, अतुल कुलकर्णी और सोहा अली खान को चमकने का भरपूर मौका दिया. एआर रहमान के संगीत ने फिल्म को अमर बना दिया. ‘पाठशाला’ से लेकर ‘रूबरू’ और ‘खलबली’ तक हर गाना आज भी युवाओं की प्लेलिस्ट का हिस्सा है. फिल्म ने दिखाया कि इतिहास के पन्नों से क्रांतिकारी आज के युवाओं में कैसे जिंदा हो सकते हैं.

आज, 26 जनवरी 2026 को जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें एहसास होता है कि आमिर खान का फैसला सिर्फ एक रोल चुनने के बारे में नहीं था, बल्कि एक विजन था. एक बड़ा स्टार होने के बावजूद, उन्होंने खुद को फिल्म की कहानी से कमतर रखा. इसने साबित किया कि जब सिनेमा ईमानदारी से बनाया जाता है, तो वह न सिर्फ पैसे कमाता है बल्कि इतिहास भी रचता है.