own child kidnapping case father convicted two year old son legal custody saket court significant verdict | कानून के आगे रिश्ते बेबस! दो साल के सगे बेटे को पिता ने रख रखा था अपने पास, अब कोर्ट ने सुनाया यह बड़ा फैसला

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नई दिल्ली. रिश्तों की मर्यादा और कानून की पेचीदगियों के बीच दिल्ली की एक अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो हर उस माता-पिता के लिए एक बड़ा सबक है जो आपसी विवाद में बच्चों को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल करते हैं. अक्सर लोग सोचते हैं कि मेरा बच्चा है, मैं कहीं भी ले जाऊं, लेकिन कानून की नजर में यह धारणा आपको जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है. दिल्ली की साकेत जिला अदालत ने हाल ही में एक पिता को उसके अपने ही दो वर्षीय मासूम बेटे के अपहरण के मामले में दोषी करार दिया है. यह फैसला उन लोगों के लिए आंखें खोलने वाला है जो कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज कर अपनी मर्जी से बच्चे को कब्जे में लेने की कोशिश करते हैं.

साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी भव्य करहैल की अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता (Biological Father) क्यों न हो, लेकिन अगर उसके पास बच्चे की कानूनी कस्टडी (Legal Custody) नहीं है, तो वह उसे उसकी मां या वर्तमान अभिभावक की मर्जी के बिना नहीं रख सकता. कोर्ट ने कहा कि घटना के समय आरोपी के पास बच्चे को अपने पास रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था, इसलिए उसका यह कृत्य सीधे तौर पर अपहरण (Kidnapping) की श्रेणी में आता है.

फ्रूटी और कपड़ों का झांसा

मामले की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब दिल्ली के जामिया नगर इलाके में रहने वाली मुमताज जो बच्चे की नानी ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई. मुमताज ने आरोप लगाया कि उनका दामाद शाहिद, जो अपनी पत्नी से विवाद के कारण अलग रह रहा था, एक दिन अचानक आया. शाहिद ने चालाकी दिखाई और अपने दो साल के बेटे शहजान को फ्रूटी पिलाने और नए कपड़े दिलाने के बहाने बाजार ले जाने की बात कही. नानी को लगा कि पिता का अपने बच्चे के प्रति प्रेम जाग उठा है, इसलिए उन्होंने मासूम को उसके साथ भेज दिया. लेकिन शाहिद वापस नहीं लौटा. वह बच्चे को लेकर अपनी लिव-इन पार्टनर सुनैना शर्मा के साथ रफूचक्कर हो गया.

दो महीने तक चला ‘लुका-छिपी’ का खेल

पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज कर जांच शुरू की. करीब दो महीने से ज्यादा समय तक शाहिद और उसकी पार्टनर पुलिस को छकाते रहे. आखिरकार, तकनीकी सर्विलांस और मुखबिरों की मदद से पुलिस ने उन्हें मंडावली इलाके के एक बस स्टैंड से दबोच लिया. उस वक्त शाहिद और सुनैना बच्चे को लेकर शहर से बाहर भागने की फिराक में थे. पुलिस ने बच्चे को सुरक्षित बरामद कर लिया, लेकिन इस घटना ने रिश्तों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी थी.

अदालत में शाहिद की दलीलें और कोर्ट का प्रहार

सुनवाई के दौरान आरोपी शाहिद ने खुद को निर्दोष बताते हुए कई दलीलें दीं. उसका कहना था कि मैं बच्चे का असली पिता हूं, मैं उसका अपहरण कैसे कर सकता हूं?. उसने आरोप लगाया कि वह मुंबई में काम करने गया था और इसी दौरान उसकी पत्नी ने उसे छोड़कर दूसरी शादी कर ली. उसने यह भी दावा किया कि उसकी लिव-इन पार्टनर सुनैना को जानबूझकर इस मामले में फंसाया गया है.

आम लोगों के लिए इस फैसले के मायने

हालांकि, अदालत ने शाहिद की इन तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने गौर किया कि शाहिद ने खुद यह स्वीकार किया था कि उसकी पत्नी अपने बेटे के साथ मायके में अलग रह रही थी. विवाद के कारण वे दोनों साथ नहीं थे. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जब बच्चा अपनी मां के साथ रह रहा है और पिता धोखे से उसे ले जाता है, तो यह कानून का उल्लंघन है. कोर्ट ने सुनैना को भी इस साजिश में बराबर की भागीदार माना.

यह फैसला समाज को एक कड़ा संदेश देता है कि पारिवारिक विवादों में कानून को अपने हाथ में लेना भारी पड़ सकता है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पति-पत्नी अलग रह रहे हैं, तो बच्चे की कस्टडी के लिए ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट’ के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए. बिना कोर्ट के आदेश के बच्चे को उठा ले जाना, चाहे वह आपका अपना ही क्यों न हो, आपको अपराधी बना सकता है. साकेत कोर्ट का यह निर्णय न केवल मुमताज और उनकी बेटी के लिए न्याय है, बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए एक उम्मीद है जो अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहती हैं.

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