महेरी.. खिचड़ी का स्वादिष्ट ऑप्शन, चावल-मट्ठा का कॉम्बिनेशन, तड़का लगने के बाद मुंह में आएगा पानी – Madhya Pradesh News

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Maheri Dish: मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र की संस्कृति की पहचान पूरे देश में अपनी अलग छाप छोड़ती है. घने जंगलों, पहाड़ियों और आदिवासी अंचल से जुड़े इस क्षेत्र का खान-पान भी उतना ही सादा, पौष्टिक और देसी है. यहां के भोजन में चावल का विशेष स्थान है और इसी चावल से बनने वाली एक पारंपरिक डिश महेरी है. ये डिश आज भी विंध्य की रसोई की पहचान मानी जाती है. महेरी उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो हल्का, जल्दी बनने वाला भोजन पसंद करते हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसे बनाने में न ज्यादा सामग्री लगती है और न ही ज्यादा मेहनत.

कच्चे चावल, खट्टी छाछ, थोड़ा सा नमक और हल्दी से बनने वाली यह डिश स्वाद में बेहद लाजवाब होती है. ऊपर से देसी घी, जीरा और सूखी लाल मिर्च का तड़का मिल जाए, तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है. पेट ठीक न लग रहा हो या जल्दी कुछ देसी और टेस्टी खाने का मन हो, तो महेरी एकदम परफेक्ट विकल्प है. लोकल 18 को जानकारी देते हुए रसोइया प्रियंका सिंह ने बताया, महेरी विंध्य क्षेत्र रीवा, सतना, सीधी, शहडोल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों की बेहद पारंपरिक डिश है. मट्ठे (छाछ) और चावल से बनने वाली इस खिचड़ी को कई जगहों पर मटखोर या मट्ठा महेरी के नाम से जाना जाता है.

आगे बताया, इसमें चावल को मट्ठा या दही के पानी के साथ पकाया जाता है. स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें हरी मिर्च, कड़ी पत्ता और राई का तड़का लगाया जाता है. कई घरों में इसे बेसन या दही के साथ और भी ज्यादा स्वादिष्ट बनाया जाता है. इस डिश का क्षेत्रीय महत्व भी खास है. विंध्य क्षेत्र के लोगों के लिए यह एक आरामदायक और रोजमर्रा का भोजन रहा है. मकर संक्रांति पर जहां आमतौर पर दाल-चावल की खिचड़ी बनाई जाती है, वहीं विंध्य के कुछ इलाकों में दही-चूरा या मट्ठा-भात की परंपरा भी देखने को मिलती है.

2-3 सीटी में तैयार
महेरी बनाने के लिए पहले चावल को धोकर भिगोया जाता है. कुकर में घी गरम कर मेथी दाना, जीरा, राई, हींग और कड़ी पत्ता का तड़का लगाया जाता है. इसके बाद चावल डालकर हल्का भूनते हैं और फिर छाछ, हल्दी व नमक मिलाकर पकाया जाता है. 2-3 सीटी में तैयार महेरी को ऊपर से देसी घी और हरी धनिया से सजाकर परोसा जाता है. हालांकि, समय के साथ यह पारंपरिक डिश अब धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब होती जा रही है. अगर हम इसे फिर से अपनी रसोई में जगह दें, तो विंध्य की यह देसी और पौष्टिक पहचान दोबारा जिंदा हो सकती है.

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