How are Shankaracharya appointed Know controversy surrounding Avimukteshwaranand Saraswati and Jyotir Math Shankaracharya position | कैसे बनते हैं शंकराचार्य? जानें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ज्योतिर्मठ शंकराचार्य को लेकर क्या है विवाद

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प्रयागराज माघ मेला 2026 में मौनी अमावस्या को माघ मेला प्रशासन और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती में शुरू हुआ विवाद बढ़ता जा रहा है. प्रशासन ने तो अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस तक भेज दिया कि आखिर आप अपने नाम के आगे शंकराचार्य कैसे लगा सकते हैं, जबकि आधिकारिक रूप से आपके शंकराचार्य होने पर सुप्रीम कोर्ट से रोक है. लेकिन क्या आप जानते हैं आखिर शंकराचार्य कैसे बनते हैं और हिंदू धर्म में आखिर यह परंपरा कैसे शुरू हुई. आइए जानते हैं आखिर किस तरह शंकराचार्य बनते हैं…

8वीं सदी में की थी स्थापना
भारत की सनातन परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक पद नहीं, बल्कि वेदांत दर्शन की जीवित परंपरा के संवाहक माने जाते हैं. यह परंपरा आज से लगभग 1200 साल पहले, 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी. आज भी शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया उन्हीं नियमों और परंपराओं के अनुसार होती है, जो उस समय तय की गई थीं. हिंदू धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है, जो बौद्ध धर्म में दलाईलामा और ईसाई धर्म में पोप के समान माना जाता है. देश में चार मठों में चार शंकराचार्य होते हैं. चार मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है.

आदि शंकराचार्य शुरू की यह परंपरा
आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी में हुआ माना जाता है. उन्होंने बहुत कम आयु में वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर गहन भाष्य लिखे और अद्वैत वेदांत को सुव्यवस्थित दर्शन के रूप में स्थापित किया. उनका मानना था कि सनातन धर्म को संगठित रूप देने और वेदांत की रक्षा के लिए स्थायी संस्थानों की आवश्यकता है. इसी सोच से मठ परंपरा की नींव पड़ी. इन मठो की स्थापना के बाद शंकराचार्य ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को इन पदों पर आसीन किया. तब से ही इन चारों मठों में शंकराचार्य पद की परंपरा चली आ रही है.

चार मठों की स्थापना
आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठ स्थापित किए, इन मठों का उद्देश्य ना केवल धर्म की रक्षा करना है बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक रूप से एक सूत्र में बांधना भी है.

  • श्रृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक) – दक्षिण भारत
  • ज्योतिर्मठ/ ज्योतिष पीठ, बद्रीनाथ (उत्तराखंड) – उत्तर भारत
  • गोवर्धन पीठ, पुरी (ओडिशा) – पूर्व भारत
  • द्वारका शारदा पीठ, द्वारका (गुजरात) – पश्चिम भारत

शंकराचार्य बनने की योग्यता
इन मठों के प्रमुख को चुनने के लिए शंकराचार्य द्वारा रचित महानुशासनम् ग्रंथ में दिए गए नियमों का पालन किया जाता है. इस प्रमुख पद को प्राप्त करने के लिए कठोर नियम और लंबी साधना आवश्यक मानी गई है. उम्मीदवार का दशनामी संप्रदाय का संन्यासी होना अनिवार्य है. परंपरागत रूप से शंकराचार्य केवल ब्राह्मण समुदाय से ही होते हैं. आजीवन ब्रह्मचर्य और सांसारिक त्याग आवश्यक है. वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, गीता और अद्वैत वेदांत में प्रवीणता जरूरी है. शंकराचार्य का चयन गुरु द्वारा शिष्य के रूप में किया जाता है, चुनाव या मतदान से नहीं.

इन मठों का प्रमुख बनने के लिए अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वर, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति के साथ और काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर भी चाहिए होती है. इसके बाद ही शंकराचार्य की पदवी मिलती है.

  • श्रृंगेरी शारदा पीठ यजुर्वेद को समर्पित है. आदि शकंराचार्य ने सबसे पहले इसी मठ की स्थापना की थी. यहां की अधिष्ठात्री देवी मां शारदा हैं. इस मठ का महावाक्य अहं ब्रह्मासी अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं. श्रृंगेरी मठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती तथा पुरी संप्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है, जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है. इस मठ पर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी (36वें शंकराचार्य) विराजमान हैं.
  • गोवर्धन पीठ की स्थान पुरी यानी ओडिशा में है और यह पीठ ऋग्वेद से जुड़ा हुआ है. इस पठ का संबंध भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है. इस मठ का महावाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म अर्थात ज्ञान ही ब्रह्म है. गोवर्धन पीठ पर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती विराजमान हैं.
  • द्वारका शारदा पीठ का संबंध पश्चिम भारत से है और इसका स्थान भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में है. यह पीठ सामवेद का प्रतिनिधित्व करता है. इस पीठ को कालिका मठ के नाम से भी जाना जाता है. इस मठ का महावाक्य तत्वमसि अर्थात वह ब्रह्म तुम्हीं हो. द्वारका शारदा पीठ पर शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती विराजमान हैं.
  • ज्योतिर्मठ/ ज्योतिष पीठ का संबंध उत्तर भारत से माना जाता है और यह मठ बद्रीनाथ में स्थित है. इस मठ का संबंध अथर्ववेद से है और इस मठ का महावाक्य अयामात्मा ब्रह्म अर्थात यह आत्मा ही ब्रह्म है. ज्योतिर्मठ पीठ पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विराजमान हैं (कुछ विवादों के साथ).

क्या उम्र मायने रखती है?
शास्त्रों में शंकराचार्य बनने के लिए कोई निश्चित आयु तय नहीं है. इतिहास में कई शंकराचार्य बहुत कम उम्र में भी इस पद पर आसीन हुए हैं, बशर्ते वे सभी योग्यताओं पर खरे उतरते हों. शंकराचार्य का कार्य केवल मठ संचालन तक सीमित नहीं होता. वे धर्म की रक्षा, समाज को दिशा, सनातन परंपराओं का संरक्षण, धार्मिक विवादों पर मार्गदर्शन जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं.

कैसे होता है चयन?
शंकराचार्य का चयन किसी चुनाव या सरकारी प्रक्रिया से नहीं होता. यह पूरी तरह से गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित होता है. वर्तमान शंकराचार्य अपने जीवनकाल में ही योग्य शिष्य का चयन कर उसे उत्तराधिकारी घोषित करते हैं, इस प्रक्रिया को उत्तराधिकार दीक्षा कहा जाता है. चयन से पहले शिष्य की वर्षों तक परीक्षा ली जाती है. जब योग्य शिष्य का चयन हो जाता है, तो उसे विधिवत संन्यास दीक्षा दी जाती है. इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चारण, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पीठाभिषेक किया जाता है. तभी वह औपचारिक रूप से शंकराचार्य पद पर आसीन होता है.

दशनामी संप्रदाय का महत्व
आदि शंकराचार्य ने संन्यासियों को दस नामों में विभाजित किया है. इनके नाम गिरी, पुरी, भारती, तीर्थ, वन, अरण्य, पर्वत, आश्रम, सरस्वती और सागर हैं. चारों मठों के शंकराचार्य इन्हीं संप्रदायों से जुड़े होते हैं.

क्या है ज्योतिषपीठ के उत्तराधिकार का विवाद?
ज्योतिष पीठ के मामले में दो शिष्यों ने खुद को उत्तराधिकारी बताया था, जिससे मामला सालों तक कोर्ट में चलता रहा. यह मामला स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्वामी वासुदेवानंद के गुटों के बीच रहा है. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मालीन होने के बाद इस पद को लेकर लंबे समय तक अदालती लड़ाई चली. सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेक (अभिषेक समारोह) पर रोक लगा दी थी, जिससे उनका औपचारिक पट्टाभिषेक संस्कार नहीं हो पाया. शंकराचार्य के पद तक पहुंचने के लिए पट्टाभिषेक संस्कार का होना बेहद आवश्यक माना गया है.

असली बनाम नकली शंकराचार्य
देशभर में कई साधु-संत हैं और कइयों ने खुद को शंकराचार्य घोषित कर लिया जाता है. वर्तमान में चार मठ के अलावा कई अन्य मठों की भी स्थापना हो गई है, जिसके चलते हिंदुओं में असली और नकली शंकराचार्य को लेकर विवाद होता रहता है. आदि शंकराचार्य ने केवल चार मठ पुरी, द्वारक, श्रृंगेरी और बद्रीनाथ स्थापित किए थे और इन चार पीठ के प्रमुखों के अलावा अन्य कोई शंकराचार्य नहीं कह सकता. हालांकि कई अन्य मठ भी आए और उनमें से कांची कामकोटि मठ भी प्राचीनता का दावा करता है.

कांची कामकोटि मठ
कांची मठ कांचीपुरम में स्थापित एक हिंदू मठ है. यह पांच पंचभूतस्थलों में एक है. यहां के मठाधीश्वर को शंकराचार्य कहते हैं. ज ये दक्षिण भारत के महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में एक है. इसके वर्तमान शंकराचार्य विजयेंद्र सरस्वती इस पीठ के 70वें शंकराचार्य हैं. इस मठ की दक्षिण भारत में बहुत मान्यता है.

देश में कई अन्य साधु-संत मौजूद हैं, जो अपने नाम के आगे शंकराचार्य या जगद्गुरु लगा लेते हैं लेकिन शंकराचार्य द्वारा रचित महानुशासनम् (मठों का संविधान) के अनुसार उनको कोई आधिकारिक मान्यता नहीं दी जाती.

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