दिल्ली पहुंचे ट्रंप के करीबी, जयशंकर संग ट्रेड-सिक्योरिटी पर बात, ‘मदर ऑफ ऑल डील’ से पहले कैसा खेल?
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S Jaishankar US Delegation Meeting: आज भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात वैश्विक राजनीति में भारत के बढ़ते कद को दर्शाती है. एक तरफ ट्रंप प्रशासन भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते की आलोचना कर रहा है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका खुद भारत के साथ सुरक्षा और तकनीक पर सहयोग बढ़ाने को मजबूर है. भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था और स्वतंत्र विदेश नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि दबाव की राजनीति अब काम नहीं करेगी.
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस वक्त दिल्ली में है. नई दिल्ली: भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने आज दिल्ली में एक उच्च स्तरीय अमेरिकी संसदीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की. इस दल में बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप के देश के माइक रोजर्स, एडम स्मिथ और जिमी पेट्रोनिस जैसे दिग्गज सांसद शामिल थे. अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की मौजूदगी में हुई यह बैठक बेहद अहम मानी जा रही है. एक ओर ट्रंप प्रशासन के मंत्री भारत-यूरोपीय संघ (EU) के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की आलोचना कर रहे हैं. वे यूरोपीय देशों को भारत के साथ व्यापारिक नजदीकियों के लिए कोस रहे हैं. दूसरी ओर वही अमेरिका खुद भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी और व्यापार बढ़ाने के लिए आतुर दिख रहा है. यह बैठक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे जटिल वैश्विक मुद्दों पर केंद्रित रही. भारत की बढ़ती जीडीपी और मजबूत वैश्विक स्थिति ने वाशिंगटन को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. आज की यह मुलाकात स्पष्ट संदेश देती है कि भारत को नजरअंदाज करना अब नामुमकिन है.
ट्रंप की दोहरी नीति: विरोध और व्यापार साथ-साथ
डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला नया प्रशासन एक अजीब विरोधाभास में फंसा नजर आता है. उनके मंत्री सार्वजनिक मंचों पर भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने की आलोचना कर रहे हैं. उनका दावा है कि इससे यूक्रेन युद्ध को फंडिंग मिल रही है. हालांकि, पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही है. अमेरिका जानता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उभरता हुआ बाजार है.
भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था का दबाव
जियो-पॉलिटिक्स में अब केवल विचारधारा काम नहीं आती बल्कि आर्थिक आंकड़े प्राथमिकता तय करते हैं. भले ही ट्रंप भारत पर जितना मर्जी टैरिफ लगा लें लेकिन भारत की स्ट्रांग इकोनॉमी ने अमेरिका को मेज पर आने के लिए मजबूर किया है. ट्रंप प्रशासन का ईयू को कोसना दरअसल उनकी जलन को दर्शाता है. वे नहीं चाहते कि भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध उनसे बेहतर हों.