‘लोग एक स्टाइल से बोर हो जाते हैं’, सिनेमा में बदलाव पर बोले सुभाष घई- हर तरह की कहानी बताने का मिल रहा मौका

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नई दिल्ली. मशहूर फिल्ममेकर सुभाष घई अपनी फिल्मों में ग्लैमर, दमदार ड्रामा और एक गहरे संदेश के अनोखे मेल के लिए पहचाने जाते हैं. हाल ही में उन्होंने सिनेमा की बदलती दुनिया, बॉक्स ऑफिस ट्रेंड्स और शिक्षा के महत्व पर खुलकर चर्चा की. घई ने साझा किया कि किस तरह फिल्म निर्माण और टीचिंग का मेल एक-दूसरे को और भी प्रभावशाली बनाता है. बातचीत के दौरान उन्होंने आजकल के एक्शन फिल्मों के बढ़ते क्रेज और गानों के रीमेक बनाने के चलन पर भी अपनी बेबाक राय रखी. उनके अनुसार, सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के लिए एक खास नजरिया पेश करने का भी सशक्त माध्यम है.

सुभाष घई ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि उनके पास सिनेमा में 50 साल और शिक्षा के क्षेत्र में 25 साल का अनुभव है. उन्होंने कहा, ’55 साल पहले मैं पुणे के एफटीआईआई में स्टूडेंट था. वहां एक्टिंग कोर्स किया और विश्व सिनेमा को गहराई से समझा. फिर, वहां से निकलकर तीन साल एक्टर के तौर पर काम किया, और बाद में राइटर, डायरेक्टर, और फिर प्रोड्यूसर बन गए.’

सुभाष घई ने व्हिसलेवुड खोलने की वजह बताई

उन्होंने कुल 18-19 फिल्में बनाईं. इनमें से 14-15 हिट रहीं और 4-5 फ्लॉप हुईं. बाद में वे अपनी कंपनी को आईपीओ में ले गए, डिस्ट्रीब्यूटर बने, एग्जिबिटर (थिएटर ओनर) बने और फिर व्हिसलेवुड नाम का फिल्म स्कूल शुरू किया. व्हिसलेवुड खोलने की वजह बताते हुए घई ने कहा, ‘बॉम्बे आने के बाद कई स्टूडेंट भटक जाते हैं. उन्हें पता ही नहीं होता है कि स्टूडियो कहां हैं, किससे मिलना है, और टैलेंट कैसे दिखाना है. इसलिए हमने यह स्कूल बनाया. बच्चे यहां 2-3 साल रहें, एक्सपर्ट्स से जुड़ें, प्रैक्टिस करें, और फिर इंडस्ट्री में एंट्री लें.’

क्लासिक गानों और पुरानी फिल्मों के री-क्रिएशन का ट्रेंड

आजकल क्लासिक गानों और पुरानी फिल्मों के री-क्रिएशन का ट्रेंड चल रहा है. इस पर घई ने कहा कि हर क्रिएटिव काम अपने समय के हिसाब से अच्छा होता है. मोजार्ट-बीथोवेन से लेकर फाल्के, विशाल भारद्वाज, केएल सैगल, महबूब खान, गुरु दत्त, बिमल रॉय, विजय आनंद, मनोज कुमार और प्रकाश मेहरा तक हर दौर में नए क्रिएटर्स आए. हर 30 साल बाद नए डायरेक्टर और राइटर आते हैं.

80-90 के दशक का नैरेटिव आज का नहीं रहा

उन्होंने कहा, ‘सिनेमा समाज का आईना है. लोग बदलते हैं, समय बदलता है, मुद्दे बदलते हैं, तो ड्रामा, एक्सप्रेशन और कहानी का तरीका भी बदलेगा. 80-90 के दशक का नैरेटिव आज का नहीं रहा. डिजिटल युग में ओटीटी, वेब सीरीज और टीवी जैसे कई प्लेटफॉर्म आ गए हैं. अब क्रिएटर्स को छोटी-बड़ी हर तरह की कहानियां बताने का मौका मिल रहा है.’

हर 20-30 साल बाद बदल जाता है ट्रेंड

सुभाष घई ने एक्शन फिल्मों पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, ‘देखिए हर 20-30 साल बाद ट्रेंड बदल जाता है. 70 के दशक में अमिताभ बच्चन के साथ एक्शन का बड़ा दौर आया. 60 के दशक में पारिवारिक और सामाजिक फिल्में ज्यादा थीं. 90 के दशक में रोमांटिक प्रेम कहानियां छाईं. लोग एक स्टाइल से बोर हो जाते हैं और नया कुछ देखना चाहते हैं, इसलिए एक्शन का यह दौर भी समय के साथ आया है.’

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