uttarakhand chocolate mithai 138 years of history know recipe of chocolate mithai | बाल मिठाई और सिंगोड़ी ही नहीं अंग्रेजों को पसंद थी उत्तराखंड की चॉकलेट मिठाई, 138 साल पुराना इतिहास
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देहरादून. जिस तरह हैदराबाद की बिरयानी और लखनऊ के टुंडे कबाब उनकी पहचान बन गए हैं. उसी तरह उत्तराखंड की बाल मिठाई और सिंगोड़ी बहुत मशहूर है लेकिन अंग्रेजों को उत्तराखंड की चॉकलेट मिठाई भाती थी. इससे भी ब्रिटिश काल का इतिहास जुड़ा है.

पौड़ी के लैंसडाउन में लगभग 138 साल पहले जब यहां रोड नहीं हुआ करती थी तब दूध से बनी मिठाइयां ज्यादा समय तक नहीं टिक पाती थी इसीलिए लोगों ने ऐसी मिठाई की खोज की जो लंबे समय तक टिक पाए. तब हलवाइयों ने दूध को धीमी आंच पर पकाना शुरू किया और उसमें घी और चीनी मिलाकर तब तक इस पकाते रहे जब तक यह भूरे रंग की होकर गाढ़ी नहीं हो गई और तब इसे चॉकलेट मिठाई का नाम दिया गया. इसे अंग्रेज बहुत पसंद किया करते थे.

लैंसडाउन के स्थानीय निवासी पी आर ध्यानी ने बताया कि 138 साल पुराना रोचक सफर इस विशेष मिठाई का इतिहास लगभग 138 साल पुराना है. यह वह दौर था जब पौड़ी के लैंसडाउन जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव था. उन दिनों पहाड़ों में सड़कों का जाल नहीं बिछा था, जिससे बाहरी दुनिया से संपर्क और सामान की आवाजाही बेहद कठिन हुआ करती थी. दुर्गम रास्तों और संसाधनों की कमी के बीच ही इस अनूठी मिठाई का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर ब्रिटिश अधिकारियों के बीच अपनी खास जगह बनाई. जरूरत से हुआ नया आविष्कार पुराने समय में दूध से बनी सामान्य मिठाइयां जल्दी खराब हो जाती थीं. पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हलवाइयों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसी मिठाई बनाने की थी, जो लंबे समय तक सुरक्षित रह सके और जिसका स्वाद भी बरकरार रहे. इसी जरूरत ने स्थानीय हलवाइयों को कुछ नया प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया.उन्होंने दूध के साथ प्रयोग करना शुरू किया ताकि एक ऐसी टिकने वाली मिठाई तैयार की जा सके जिसे लोग सफर में भी साथ रख सकें.

धीमी आंच का जादू इस विशेष मिठाई को बनाने की प्रक्रिया काफी धैर्यपूर्ण और मेहनत वाली थी. स्थानीय हलवाइयों ने दूध को लोहे की कड़ाहियों में धीमी आंच पर घंटों पकाना शुरू किया. जैसे-जैसे दूध गाढ़ा होता गया, उसमें शुद्ध देसी घी और चीनी का मिश्रण मिलाया गया. इस मिश्रण को तब तक लगातार चलाया और पकाया जाता था, जब तक कि दूध अपना प्राकृतिक रंग बदलकर गहरा भूरा (डार्क ब्राउन) न हो जाए.
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जब यह मिश्रण पूरी तरह पककर सख्त और गाढ़ा हो जाता था, तो इसका रंग और बनावट काफी हद तक आधुनिक चॉकलेट जैसी दिखने लगती थी. दूध के जलने और चीनी के कैरमलाइज होने से इसमें एक सोंधी सी खुशबू और बेहतरीन स्वाद पैदा हो जाता था. इसी रंगत और स्वाद के कारण इसे ‘चॉकलेट मिठाई’ का नाम दिया गया. यह मिठाई स्वाद में तो बेमिसाल थी ही, साथ ही इसकी शेल्फ-लाइफ भी सामान्य मिठाइयों से कहीं ज्यादा थी.

अंग्रेजों की पहली पसंद जब ब्रिटिश सेना और अधिकारियों ने लैंसडाउन में अपना डेरा डाला, तो वे इस स्थानीय ‘चॉकलेट’ के दीवाने हो गए. उनके लिए यह स्वाद बिल्कुल नया और लुभावना था. अंग्रेज अफसर इसे बड़े चाव से खाते थे और अक्सर अपने साथ उपहार के तौर पर भी ले जाते थे. उनके प्रोत्साहन और पसंद के कारण ही यह मिठाई उस दौर में इतनी लोकप्रिय हुई कि इसे बाकायदा एक पहचान मिल गई.

आज भले ही बाजार में कई तरह की आधुनिक चॉकलेट उपलब्ध हैं, लेकिन इस पारंपरिक चॉकलेट मिठाई का महत्व कम नहीं हुआ है. यह केवल एक मीठा व्यंजन नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पूर्वजों की सूझबूझ और उनकी मेहनत का प्रतीक है. बाल मिठाई और सिंगोड़ी के साथ-साथ यह मिठाई भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक और खान-पान की विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है.

138 सालों का यह सफर हमें याद दिलाता है कि कैसे सीमित संसाधनों में भी हमारे पहाड़ों में बेहतरीन चीजों का निर्माण हुआ. आज आवश्यकता इस बात की है कि इस ऐतिहासिक मिठाई के स्वाद और इसकी शुद्धता को अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाए. लैंसडाउन की वादियों से निकला यह स्वाद आज भी उन दिनों की याद दिलाता है जब अंग्रेजों की चाय की मेज पर उत्तराखंड की यह खास चॉकलेट मिठाई शान से परोसी जाती थी.