ठुमरी और शास्त्रीय संगीत ने तराशा, 8 साल की तपस्या, वो रूहानी आवाज, जो बन गई करोड़ों दिलों की धड़कन

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बेमिसाल आवाज और रूहानी गायकी की मल्लिका रेखा भारद्वाज आज बॉलीवुड का वो नाम हैं, जिनके बिना संगीत अधूरा सा लगता है. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था. 12 साल की उम्र से शास्त्रीय संगीत की तालीम और 8 साल के कड़े रियाज ने उनकी आवाज को वो गहराई दी, जो आज ‘कबीरा’ और ‘घाघरा’ जैसे गानों में साफ झलकती है. आज उनके 62वें जन्मदिन पर जानते हैं कि कैसे एक रेडियो से शुरू हुआ सफर उन्हें सुरों के शिखर तक ले गया.

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शास्त्रीय संगीत ने तराशा, वो रूहानी आवाज, जो बन गई करोड़ों दिलों की धड़कनआज अपना 62वां जन्मदिन मना रही हैं रेखा भारद्वाज.

नई दिल्ली. बॉलीवुड सिंगर रेखा भारद्वाज की आवाज सीधे दिल में उतर जाती है. ओमकारा का रूहानी गीत ‘लक्कड़’ हो या ‘ये जवानी है दीवानी’ का दर्द भरा ‘कबीरा’, उन्होंने हर बार अपनी आवाज के जादू से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई है. जहां उनके गाए ‘नमक इश्क का’ और ‘घाघरा’ जैसे चार्टबस्टर गाने किसी को भी झूमने पर मजबूर कर देते हैं, वहीं उनकी सूफियाना गायकी हर जज्बात को गहराई से बयां करती है. अपनी आवाज से हर इमोशन में जान फूंकने वाली मशहूर प्लेबैक सिंगर रेखा भारद्वाज 24 जनवरी को अपना 62वां जन्मदिन मना रही हैं.

बॉलीवुड में अपनी हाई पिच की आवाज के लिए जानी जाने वाली रेखा भारद्वाज का शुरुआती जीवन ही संगीतमय रहा है. लेकिन उनके माता-पिता ने संगीत को कमतर मानकर सिखाने से मना कर दिया. फिर सिंगर के पिता ने ठान लिया था कि भले ही वह संगीत सीख नहीं पाए, लेकिन अपने बच्चों को जरूर सिखाएंगे. बस फिर क्या, रेखा ने तीन साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया, और इसके पीछे खास वजह थी रेडियो.

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