ऋषि कपूर के लिए गाना गाकर खुद को समझने लगा शहंशाह, घमंड में हुआ चूर, चली गई आवाज, फिर ऐसे किया पश्चाताप

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नई दिल्ली. घमंड, अहंकार, अभिमान या गरूर ये वो शब्द हैं, जिससे आदमी बचा रहे तो जीवन स्वर्ग सा है. लेकिन कभी-कभी जरा सी सफलता इंसान को घमंड में चूर कर देती है. कुछ ऐसा ही उस सिंगर के साथ हुआ, जो संगीत की दुनिया में अक्सर मिसाल के तौर पर सुनाया जाता है. वो सिंगर, जिसकी आवाज में भक्ति और जुनून दोनों बसते थे. 1975 में मौका मिला और ऋषि कपूर की ब्लॉकबस्टर फिल्म से डेब्यू किया. गाना ऐसा गाया कि तारीफों की बाढ़ आ गई. चारों तरफ वाहवाही होने लगी और यही सराहना धीरे-धीरे उसके भीतर घमंड का रूप लेने लगी. उसे लगने लगा कि उसकी आवाज कभी साथ नहीं छोड़ेगी, वह अजेय है. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. अचानक उसकी आवाज साथ छोड़ने लगी, सुर टूटने लगे और वही पहचान, जिस पर उसे नाज था, खतरे में पड़ गई. तब समझ आया कि जो किया वो गलत था. गहरा पश्चाताप किया और फिर जो ठाना उससे कभी नहीं मुकरा. जानते हैं ये सिंगर कौन हैं?

‘चलो बुलावा आया है’ और’तूने मुझे बुलाया शेरांवालिये…’ जैसे गीतों को अपनी मधुर आवाज देने वाले ये सिंगर कोई और नहीं बल्कि नरेंद्र चंचल थे. मिड नाइट सिंगर के नाम से मशहूर नरेंद्र चंचल को खासकर देवी जागरणों के लिए जाना जाता था. लेकिन क्या आप जानते हैं. उन्होंने ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की फिल्म ‘बॉबी’ के लिए भी एक गाना गाया था, जिसके बाद घमंड और अहंकार में डूब गए थे.

मुंबई आने का नहीं था सपना

एक इंटरव्यू में नरेंद्र चंचल ने इस किस्से को खुद बयां किया था. उन्होंने बताया था कि फिल्मों में आना उनका सपना नहीं था. पंजाब का एक ग्रुप प्रदेश से बाहर अलग-अलग शहरों में काफियां गाने का प्रोग्राम करता था. जिससे वह जुड़े. उस वक्त एक प्रोग्राम के लिए मुझे 65 रुपए मिलते थे. ग्रुप के टूर की आखिरी लोकेशन मुंबई थी. वहां पंजाब एसोसिएशन का बैसाखी का प्रोग्राम होता था, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी जाते थे.

राज कपूर ने ऐसे बनाया बॉलीवुड में स्टार

70 के दशक में जब वह बैसाखी के प्रोग्राम में गा रहे थे, तब राज कपूर साहब समेत कई बड़े स्टार्स उन्हें सुन रहे थे. बुल्ले शाह की काफियां सुनने के बाद राज साहब ने ग्रीन रूम में मुलाकात की गले लगाकर एक काफी के बारे में पूछा, जो मुझे आती थी. मैंने वह काफी उन्हें गाकर सुना दी तो वे और खुश हो गए. दूसरे दिन उन्होंने मुझे आरके स्टूडियो बुलाया. मुझसे कुछ सुना और ऐलान कर दिया कि मेरी अगली फिल्म ‘बॉबी’ में तुम गाओगे. इसके बाद उन्होंने 1973 की ब्लॉकबस्टर में ‘बेशक मंदिर-मस्जिद तोड़ो’ गीत गाया था. इस गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर के अवॉर्ड से नवाजा गया.

16 अक्टूबर 1940 को अमृतसर में जन्मे नरेंद्र खरबंदा का बचपन बेहद साधारण था. फाइल फोटो. 

एक से बढ़कर एक दिए फिल्मी गाने

पहली फिल्म में फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड लेने के बाद तो वह रातोंरात स्टार बन गए. गाने फिल्मों में भी हिट हो गए और उधर उनके भक्ति गीत की लिस्ट में भी वह टॉप पर थे. बस वह थोड़े-थोड़े बदलने लगे. नरेंद्र चंचल ने इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने फिल्मी गाने गाने का मन बना लिया था. इन गानों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई’ और ‘मैं बेनाम हो गया’ शामिल है. ये गाने भी हिट हुए और सक्सेस उनके सिर चढ़कर बोल रही थी. लेकिन अचानक उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद वो रास्ते पर आ गए.

घमंड में भजन गाने के लिए बनाया बहाना

एबीपी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने वो किस्सा भी सुनाया, जब उनका अहंकार चूर हुआ. दरअसल, एक म्यूजिक नाइट में वो शामिल होने के लिए आगरा गए. वो अक्सर भजन कीर्तन के लिए आगरा जाया करते थे. जब वो कार्यक्रम में पहुंचे तो एक आदमी ने उन्हें भजन गाने को कहा. लेकिन उन्होंने तबीयत खराब का बहाना बनाया और गाना गाने से इनकार कर दिया. इसके बाद वहां से जैसे ही निकले तो उसी रात को उनकी आवाज अचानक चली गई.

ऐसे किया पश्चाताप

कई महीनों तक बिना आवाज के रहे. उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि माता रानी ने उन्हें गलती और घमंड की सजा दी है. उन्होंने पश्चाताप किया कई महीनों तक इलाज चलने के बाद वो ठीक हुए. जिसके बाद उन्होंने कभी फिल्मी गाने ना गाने का प्रण लिया. चंचल इसे ‘माता रानी’ का चमत्कार मानते थे और यहीं से उनके जीवन का ध्येय बदल गया. चंचल ने ‘जागरण’ की परिभाषा ही बदल दी. उनके लिए जागरण केवल रात भर गाना नहीं था, बल्कि समाज को जगाना था. वे मंच से कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा और माता-पिता के सम्मान जैसे मुद्दों पर बात करते थे.

22 जनवरी 2021 को इस महान गायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया. फाइल फोटो. 

वैष्णो देवी में थी असीम आस्था

वे जब मंच पर आते थे, तो समां बंध जाता था. कटरा और वैष्णो देवी के भवन से चंचल का रिश्ता रूहानी था. हर साल 29 दिसंबर को वे कटरा पहुंचते थे. भीषण सर्दी में भी हजारों की भीड़ उनका इंतजार करती थी. उनके कार्यक्रमों को स्थानीय लोग ‘चंचल मेला’ कहने लगे थे. आज भी वैष्णो देवी की चढ़ाई करते समय हर दूसरे मोड़ पर उनके गाने की आवाज गूंजती सुनाई देती है, जो थके हुए यात्रियों में उत्साह भर देती है.

विदेशों में भी थे चंचल के फैन

चंचल की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं थी. उन्होंने विदेशों में बसे भारतीयों को उनकी जड़ों से जोड़ा. उनके सांस्कृतिक योगदान के लिए अमेरिका के जॉर्जिया राज्य ने उन्हें ‘मानद नागरिकता’ प्रदान की. यह किसी भी भारतीय भजन गायक के लिए एक दुर्लभ सम्मान था. 2020 में कोरोना महामारी के दौरान उनकी आवाज में एक वीडियो ‘कित्थो आया कोरोना’ वायरल हुआ था.

आज ही के दिन दुनिया को कह गए अलविदा

22 जनवरी 2021 को इस महान गायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन, वे हर उस घर में जीवित हैं जहां सुबह की शुरुआत उनके द्वारा गाए गए माता रानी की भजन ‘अंबे तू है जगदंबे काली’ से होती है. उनकी आत्मकथा ‘मिडनाइट सिंगर’ हमें याद दिलाती है कि एक साधारण इंसान अगर अपनी आस्था और कला के प्रति सच्चा हो, तो वह गलियों से उठकर सितारों तक पहुंच सकता है.

इनपुट- आईएएनएस से भी.

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