The indiscriminate use of pesticides in potato cultivation is becoming a threat; farmers need to correct this mistake. – Uttar Pradesh News
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जनपद कन्नौज में आलू की खेती किसानों की आय का एक प्रमुख साधन मानी जाती है. यहां के आलू न केवल प्रदेश बल्कि देश के कई हिस्सों में सप्लाई किए जाते हैं, लेकिन अधिक उत्पादन की होड़ में किसान जिस तरह से फसलों पर जरूरत से ज्यादा कीटनाशकों और रासायनिक दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं, वह अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्र
कन्नौजः जनपद कन्नौज में आलू की खेती किसानों की आय का एक प्रमुख साधन मानी जाती है. यहां के आलू न केवल प्रदेश बल्कि देश के कई हिस्सों में सप्लाई किए जाते हैं, लेकिन अधिक उत्पादन की होड़ में किसान जिस तरह से फसलों पर जरूरत से ज्यादा कीटनाशकों और रासायनिक दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं, वह अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया तो इसका सीधा असर न केवल फसल की गुणवत्ता पर पड़ेगा, बल्कि किसानों और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.
क्या होगी समस्या
खेती में छिड़के जा रहे रसायन आलू की प्राकृतिक गुणवत्ता को नष्ट कर रहे हैं. इससे मिट्टी की उर्वरता लगातार कमजोर हो रही है और फसलों में जहरीले तत्वों की मात्रा बढ़ती जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, आवश्यकता से अधिक कीटनाशक मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवों को खत्म कर देते हैं, जिससे भूमि धीरे-धीरे बंजर होने की ओर बढ़ने लगती है. इसका दीर्घकालिक असर यह होता है कि किसानों को हर साल पहले से अधिक खाद और दवाइयों पर निर्भर होना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ती है और मुनाफा घटता चला जाता है. जब यही आलू बाजार के जरिए आम लोगों की थाली तक पहुंचता है, तो इसके दुष्प्रभाव और भी गंभीर हो जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि रसायनों से युक्त आलू के सेवन से त्वचा रोग, पेट से जुड़ी समस्याएं, एलर्जी और लंबे समय में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर इसका असर और भी तेजी से पड़ता है.
क्या बोले डिप्टी डायरेक्टर कृषि
कन्नौज के डिप्टी डायरेक्टर कृषि संतोष कुमार ने बताया कि किसान जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाएं और संतुलित मात्रा में ही कीटनाशकों का प्रयोग करें. कीट नियंत्रण के लिए नीम आधारित दवाएं, ट्रैप क्रॉप, फसल चक्र और जैविक घोल जैसे उपाय अपनाकर रासायनिक दवाओं पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इससे न केवल फसल सुरक्षित रहेगी, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सरकार और कृषि विभाग को किसानों को जागरूक करने के लिए प्रशिक्षण शिविर और कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए, ताकि वे सही मात्रा और सही समय पर दवाओं का प्रयोग करना सीख सकें, यदि किसान समय रहते अपनी इस गलती को सुधार लें, तो फसल के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य की भी रक्षा की जा सकती है और कन्नौज का आलू अपनी गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों बनाए रख सकेगा.
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प्रशान्त राय मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं. प्रशांत राय पत्रकारिता में पिछले 8 साल से एक्टिव हैं. अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए प्रशांत राय फिलहाल न्यूज18 हिंदी के साथ पिछले तीन …और पढ़ें