Basant Panchami 2026 Shree Baba Baidyanath Jyotirlinga Mandir follows a unique tradition from treta yug On vasant Panchami | Basant Panchami पर बैद्यनाथ मंदिर की अनूठी परंपरा, निभाई जाती है त्रेता युग की खास परंपरा, अनोखा होता है श्रृंगार
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Basant Panchami 2026: एक तरफ देशभर में बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है. वहीं दूसरी तरह झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर अनूठी परंपरा निभाई जाती है. बताया जाता है कि यह अनूठी परंपरा त्रेतायुग से हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन निभाई जाती है. आइए जानते हैं आखिर इस दिन ऐसा क्या होता है…

Basant Panchami 2026 Baba Baidyanath Temple: हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी पर्व मनाया जाता है और इस बार यह शुभ तिथि 23 जनवरी दिन शुक्रवार को है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन माता सरस्वती का प्राकट्य हुआ था इसलिए पूरे देश में बसंत पंचमी पर ज्ञान की देवी मां सरस्वती को पूजने का त्योहार मनाया जाता है. एक तरफ जहां पूरे देश में सभी भक्त मां सरस्वती की वंदना में लीन होंगे, वहीं दूसरी तरफ झारखंड के देवघर में बाबा के तिलकोत्सव का जश्न मनाया जाता है. बताया जाता है कि यह जश्न त्रेता युग से हर साल बसंत पचंमी के दिन मनाया जाता है. बसंत पंचमी के दिन मंदिर में विशेष रूप से महिला भक्त भगवान शिव को बारात का न्योता देती हैं और यह सिलसिला शिवरात्रि तक चलता है. आइए जानते हैं बसंत पंचमी के दिन बैद्यनाथ मंदिर में कौन सी अनूठी परंपरा का आयोजन किया जाता है.
बसंत पंचमी से जुड़ी विशेष परंपरा
12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, बाबा बैद्यनाथ मंदिर अपनी कई विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर में हर साल शिवरात्रि और सावन में विशेष अनुष्ठान होते हैं, लेकिन बसंत पंचमी के दिन बाबा की शादी से जुड़ी विशेष परंपरा को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाया जाता है. बसंत पंचमी के दिन बाबा का तिलकोत्सव होता है. यह बाबा की शादी की पहली रस्म होती है, जिसमें मिथिलांचल के लोग, जो खुद को मां पार्वती के पक्ष का मानते हैं, मिष्ठान से लेकर फूल-माला लेकर बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं.
त्रेतायुग से चली आ रही है परंपरा
पहले बाबा की पूजा शुरू होती है और फिर बेल पत्रों और फूलों से सजाया जाता है. बाबा को तिल और मिष्ठान का भोग लगाकर गर्भगृह में महिलाएं एकत्रित होती हैं. तिलकोत्सव में बाबा पर विशेष रूप से धान की बाली, लड्डू, घी और लाल गुलाल चढ़ाया जाता है. माना जाता है कि ये परंपरा त्रेता युग से चली आई है और आज भी हर साल माघ शुक्ल की पंचमी को इस रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.
भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन स्थल
कहा जाता है कि पहले संत और ऋषि मुनी इस परंपरा का निर्वाह करते थे, लेकिन अब आम जन भी तिलकहरु बनकर बाबा का तिलक करने पहुंचते हैं. 12 ज्योतिर्लिंग में से एक बाबा बैद्यनाथ को मनोकामना शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, यहां मां सती का हृदय गिरा था और यही वजह है कि इस स्थल को मां पार्वती और भगवान शिव का मिलन स्थल भी कहा जाता है. भक्त हर साल लाखों की संख्या में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें