इस्लाम में इन शर्तों के बिना अधूरा माना जाता है निकाह, यहां जानिए क्या है शरई पाबंदियां

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अलीगढ़: निकाह इस्लाम में एक पाक और मज़बूत सामाजिक समझौता है, जिसे शरई उसूलों और तय की गई शर्तों के तहत ही सही और मुकम्मल माना जाता है. लेकिन कुछ बातों के बिना निकाह मुक़म्मल नहीं माना जाता. अक्सर लोगों के ज़हन में यह सवाल रहता है कि आखिर वो कौन-सी शरायत या रस्म हैं, जिनके बिना निकाह पूरा नहीं होता. इसी सिलसिले में लोकल 18 को मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन बताते हैं कि इस्लाम ने निकाह के लिए कुछ बुनियादी पाबंदियां और ज़रूरी शर्तें मुक़र्रर की हैं, जिनका पूरा होना बेहद ज़रूरी है. वरना निकाह अधूरा माना जायेगा.

इस्लाम में निकाह की बुनियादी शर्तें

मौलाना इफराहीम हुसैन ने कहा कि इस्लाम में निकाह को मुकम्मल और सही माने जाने के लिए कुछ बुनियादी शरायत यानी शर्तें तय की गई हैं. अगर इनमें से कोई एक भी शर्त पूरी न हो, तो निकाह अधूरा या नाजायज़ माना जाता है. सबसे पहली और अहम शर्त इजाब और कुबूल है, यानी एक तरफ़ से निकाह का प्रस्ताव रखा जाना और दूसरी तरफ़ से उसे साफ़ तौर पर कुबूल किया जाना. इसके साथ ही लड़की की रज़ामंदी का होना भी बेहद ज़रूरी है. बिना रज़ामंदी के किया गया निकाह इस्लाम में मान्य नहीं होता.

दो गवाहों का मौजूद होना भी जरूरी

मौलाना बताते हैं कि निकाह के दौरान दो गवाहों का मौजूद होना भी जरूरी है, ताकि निकाह सार्वजनिक और साबित शुदा हो. इसके अलावा आम तौर पर वली यानी कि लड़की का सरपरस्त का होना भी शरई तौर पर ज़रूरी माना गया है. हालांकि, अगर लड़की बालिग़ और समझदार है और अपना फैसला खुद ले सकती है, और वली बेवजह निकाह से इंकार कर रहा हो या दबाव बना रहा हो, तो ऐसी सूरत में लड़की को अपना फैसला करने का हक़ इस्लाम देता है.

निकाह में मेहर का तय होना भी जरूरी

मौलाना ने बताया कि निकाह में मेहर का तय होना भी जरूरी शर्त है. मेहर औरत का हक़ है और इसके बिना निकाह मुकम्मल नहीं माना जाता. इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि निकाह हलाल रिश्ते में हो. जिन रिश्तों को इस्लाम ने हराम क़रार दिया है जैसे मां, बहन, दादी या इसी तरह के रिश्ते उनमें निकाह किसी भी हाल में जायज़ नहीं होता. एक और अहम पाबंदी यह है कि इद्दत की हालत में निकाह नहीं हो सकता. चाहे औरत तलाक़ की इद्दत में हो या शौहर के इंतक़ाल के बाद की इद्दत में, उस दौरान किया गया निकाह सही नहीं माना जाएगा.

मौलाना के अनुसार, इस तरह इस्लाम ने निकाह के लिए जो शरायत और पाबंदियां तय की हैं, उन्हीं के दायरे में रहकर किया गया निकाह ही सही, मुकम्मल और जायज़ माना जाता है. अगर इनमें से कोई भी शर्त पूरी न हो, तो निकाह अधूरा समझा जाएगा.

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