Gaza Peace Board, Trump Invites Modi: ट्रंप साहब, हम आपके जाल में क्यों फंसें? ‘गाजा पीस बोर्ड’ का झुनझुना अपने पास ही रखिए!

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अमेर‍िकी राष्‍ट्रपत‍ि डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने का न्योता भेजा है. इसे एक सम्मान की तरह पेश किया जा रहा है, जैसे अमेरिका ने भारत को कोई ताज पहना दिया हो. लेकिन कूटनीति की चमकदार पैकेजिंग हटाकर देखें, तो अंदर वही पुराना अमेरिकी एजेंडा है- कंधा किसी और का, बंदूक हमारी. भारत की ओर से अभी खामोशी है, और यही समझदारी है. लेकिन इस खामोशी को एक जोरदार ना में बदलने की जरूरत है. सीधा जवाब देने की जरूरत है… हम आपके फेंके हुए जाल में क्यों फंसें?
रिश्ते बराबरी के होते हैं ट्रंप साहब, सुविधानुसार नहीं. आपको याद दिलाना जरूरी है कि जब भारत ने दुनिया के भविष्य के लिए इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) का मंच सजाया, तब आपका रवैया क्या था? आप वहां से कन्नी काट गए. आपको उसमें मुनाफा नहीं दिखा, तो आपने मुंह फेर लिया. आपने पेरिस क्लाइमेट डील को रद्दी की टोकरी में डाल दिया था क्योंकि वह आपके अमेरिका फर्स्ट के अहंकार को चोट पहुंचा रही थी.

आपके ल‍िए हम शांत‍िदूत क्‍यों बनें

जब हम दुनिया को बचाने (पर्यावरण) की बात करते हैं, तो आप साथ नहीं देते. तो आज जब आपने मिडिल ईस्ट में बारूद का पहाड़ खड़ा कर दिया है, तो आप हमें ‘शांतिदूत’ बनाकर वहां क्यों भेजना चाहते हैं? आपकी दोस्ती ‘मौसमी’ है. जब आपको चीन को घेरना होता है, तो भारत नेचुरल अलाय बन जाता है. जब आपको अपनी गंदगी साफ करवानी होती है, तो भारत ग्लोबल लीडर बन जाता है. लेकिन जब भारत को तकनीक या साथ की जरूरत होती है, तो आप प्रतिबंधों और मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाने लगते हैं. ऐसे दोस्तों के लिए हम अपनी जान जोखिम में क्यों डालें?

यह ‘पीस बोर्ड’ नहीं, एक ‘डेथ ट्रैप’ है

गाजा में जो हो रहा है, वह एक मानवीय त्रासदी है, लेकिन यह त्रासदी किसकी बनाई हुई है? यह अमेरिका की दशकों पुरानी गलत नीतियों का नतीजा है. अब जब वहां हालात हाथ से निकल चुके हैं, पूरी दुनिया में अमेरिका की थू-थू हो रही है, तो आपको अपनी इमेज सुधारने के लिए एक साफ-सुथरे चेहरे की तलाश है. और वह चेहरा आपको भारत में दिख रहा है. यह एक जाल है. अगर भारत वहां जाता है और शांति नहीं ला पाता, जो कि अमेरिका की मौजूदगी में असंभव है, तो बदनामी भारत के सिर आएगी. अगर वहां हमारे फैसलों से किसी एक पक्ष को बुरा लगा, तो जिस अरब दुनिया के साथ पीएम मोदी ने पिछले 10 साल में बेहतरीन रिश्ते बनाए हैं, वो एक झटके में खराब हो जाएंगे. अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी ‘गुडविल’ को अमेरिका के पाप धोने के लिए इस्तेमाल करे. हम आपके ‘सफाई कर्मचारी’ नहीं हैं जो आपके फैलाए रायते को समेटने जाएं.

श्रीलंका का जख्म अभी भरा नहीं है

जो लोग ग्लोबल पावर बनने के नशे में इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें इतिहास की किताब खोलकर 1987 का पन्ना पढ़ना चाहिए. हमने यही गलती श्रीलंका में की थी. वहां भी हम ‘शांति’ स्थापित करने गए थे. अपनी सेना (IPKF) भेजी थी. नतीजा क्या हुआ? हम न इधर के रहे, न उधर के. हमारे हजारों जवान शहीद हुए, हमारे प्रधानमंत्री इसकी भेंट चढ़ गए, और श्रीलंका के लोग आज भी हमें शक की निगाह से देखते हैं. श्रीलंका तो फिर भी हमारा पड़ोसी था, हमारा आंगन था. गाजा में हमारा क्या है? वहां हमास, हिजबुल्लाह, इजरायल और ईरान की खिचड़ी पक रही है. उस खौलते तेल में हाथ डालने का मतलब है—आत्महत्या. हम एक बार श्रीलंका जाकर फंस चुके हैं, अब दोबारा किसी और के झगड़े में टांग अड़ाने की बेवकूफी हम नहीं कर सकते.

यूएन पीसकीपिंग के नाम पर हमें मत बहलाइए

तर्क दिया जाता है कि भारत तो यूएन में फौज भेजता ही है. फर्क समझिए. यूएन का मिशन दुनिया का मिशन होता है. ट्रंप का यह ‘बोर्ड’ अमेरिका का प्राइवेट प्रोजेक्ट है. इसमें शामिल होने का मतलब है गाजा में अमेरिका और इजरायल का ‘सब-कॉन्ट्रैक्टर’ बनना. भारतीय सेना का काम भारत की सीमाओं की रक्षा करना है, वाशिंगटन की विदेश नीति को लागू करना नहीं. हमारे सैनिकों की जान इतनी सस्ती नहीं है कि उन्हें किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावी वादे या ‘नोबेल पीस प्राइज’ की महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए दांव पर लगा दिया जाए.

ट्रंप साहब, आप अच्छे बिजनेसमैन हैं, लेकिन हर सौदा भारत को मंजूर नहीं. हम गाजा में मानवीय सहायता भेजेंगे, हम फिलिस्तीन के लिए स्कूल बनाएंगे, हम दवाइयां भेजेंगे. लेकिन हम आपके बनाए किसी ‘बोर्ड’ का हिस्सा बनकर वहां पुलिसगिरी करने नहीं जाएंगे. आपने सोलर अलायंस छोड़ा था, हमने कुछ नहीं कहा. अब आप हमें गाजा बुला रहे हैं, तो हमारा जवाब वही है जो आपने तब दिया था-सॉरी, नॉट इंट्रेस्टेड. भारत को किसी के जाल में फंसने की जरूरत नहीं है.

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